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2025 ने वैश्विक व्यापार को नियमों से ज्यादा सहनशक्ति की परीक्षा कैसे बना दिया?

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इस साल यानी 2025 में अमेरिका ने वैश्विक व्यापार नीति के परिदृश्य को नए ढंग से परिभाषित किया है। साल में हुए पूरे बदलाव का अवलोकन कर रही हैं अमिता बत्रा

Last Updated- December 29, 2025 | 10:34 PM IST
Global Trade
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

एक ऐसे साल पर नजर डालते हुए जो व्यापार नीति उपायों के मनमाने और भेदभावपूर्ण इस्तेमाल से भरा रहा, निम्नलिखित रुझान उभरते हैं। जवाबी शुल्क लागू हुआ और बरकरार रहा: अपने चुनावी वादे को सही ठहराते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पद संभालने के करीब दो महीने बाद ‘लिबरेशन डे’ के दिन जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की। कुछ संशोधनों, अपवादों और रियायतों के अलावा जवाबी शुल्क अगस्त में लागू कर दिए गए। राष्ट्रपति की जवाबी शुल्क लगाने की शक्ति को अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष भी चुनौती दी गई लेकिन व्यापार समझौतों में जिस तरह के संरक्षणवादी प्रावधान हैं उन्हें देखते हुए लगता है कि अमेरिका की गैर बराबरी वाली यह व्यापार नीति बरकरार रहने वाली है।

अन्य देशों द्वारा व्यापक विरोध के आसार थे लेकिन वह अब तक स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिया है। मेक्सिको ने इस महीने की शुरुआत में घोषणा की कि वह अपने गैर-मुक्त व्यापार समझौता साझेदारों (एशिया में, व्यावहारिक रूप से गैर-सीपीटीपीपी साझेदार जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, भारत और चीन) से आयात की एक विस्तृत श्रृंखला पर 50 फीसदी तक शुल्क लगाएगा। यह कदम प्रभावित देशों से एकतरफा, प्रतिशोधात्मक व्यापार नीति कार्रवाई की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकता है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ), जिसका प्राथमिक उद्देश्य अधिक स्वतंत्र और न्यायसंगत व्यापार को बढ़ावा देना है, अब तक मूकदर्शक बना हुआ है।

अमेरिकी व्यापार समझौते हुए, टूटे और फिर हुए: अमेरिका अपने व्यापार समझौतों के साथ व्यापारिक परिदृश्य को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। कार्यकारी आदेशों के तहत इस वर्ष अमेरिका द्वारा किए गए द्विपक्षीय व्यापार समझौते अधिकांशतः गैर जवाबी प्रकृति के रहे हैं। अमेरिका द्वारा जवाबी शुल्कों में कटौती व्यापार से इतर क्षेत्रों में साझेदार देशों की प्रतिबद्धताओं और रियायती बाजार पहुंच प्रावधानों के आधार पर सशर्त की गई है। चूंकि ये व्यापार समझौते कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, इन्हें अमेरिका द्वारा बार-बार निरस्त भी किया जा रहा है।

मिसाल के तौर पर अमेरिका-चीन व्यापार समझौते में शुरुआत में कई बार अड़चन आई। पहले मई में जेनेवा में और उसके बाद जून में लंदन में। आखिरकार कई महीनों की बातचीत के बाद अक्टूबर में एक फ्रेमवर्क समझौते को अंतिम रूप दिया जा सका। इस फ्रेमवर्क समझौते में, अन्य बातों के साथ-साथ, जवाबी शुल्कों और तथाकथित फेंटानिल शुल्कों में कटौती शामिल है, बदले में चीन द्वारा दुर्लभ खनिजों (आरईई) पर निर्यात नियंत्रण को खत्म करने और सोयाबीन की सुनिश्चित खरीद की बात शामिल है। हालांकि, ये रियायतें केवल एक वर्ष के लिए बढ़ाई गई हैं, जो एक संभावित अल्पकालिक अमेरिका-चीन व्यापार युद्धविराम को दर्शाती हैं, जिसमें अनिश्चितता बनी हुई है।

अमेरिका-जापान व्यापार समझौता जुलाई में घोषित किया गया था, लेकिन यह तरजीही देशों पर लगने वाले शुल्कों और जवाबी शुल्कों के संयोजन से संबंधित क्रियान्वयन की अस्पष्टताओं के कारण विफल हो गया। जापान से अमेरिका के आयात पर 15 फीसदी शुल्क की अधिकतम सीमा से संबंधित प्रावधान केवल सितंबर में लागू हुआ, हालांकि इसे पूर्व प्रभाव के साथ लागू किया गया। अमेरिका-यूरोपीय संघ समझौता, जो जुलाई में संपन्न हुआ था, लगातार विफल होने के खतरे में रहा है, क्योंकि अमेरिका ने खुले तौर पर उन विनियमों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं जिन्हें वह अमेरिकी तकनीकी कंपनियों पर प्रभाव डालने वाले ‘भेदभावपूर्ण’ नियम मानता है।

मूल्य श्रृंखला में विविधता के लिए नया गठजोड़: वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) में विविधता की प्रक्रिया जो लंबे समय से चल रही थी उसका महत्त्व इस साल नए रूप में सामने आया जब चीन ने दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। उसने ऐसा ट्रंप के शुल्क थोपने की प्रतिक्रिया में किया। यह प्रतिबंध दो चरणों में अप्रैल और अक्टूबर में लगाया गया। इन धातुओं पर चीन के एकाधिकार को देखते हुए निर्यात नियंत्रण ने अमेरिका की रक्षा, ऊर्जा और वाहन कंपनियों को बुरी तरह प्रभावित किया।

महत्त्वपूर्ण खनिज खदानों से लेकर सेमीकंडक्टर और अग्रणी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस मॉडलों तक के लिए आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने के प्रयास में अमेरिका ने ‘पैक्स सिलिका’ की शुरुआत की है। यह जापान, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और ऑस्ट्रेलिया जैसे अपने विश्वसनीय सहयोगियों के साथ किया गया गठबंधन है। इस नए गठबंधन का उद्देश्य चीन द्वारा व्यापार को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश को निष्प्रभावी करना है, क्योंकि दुर्लभ खनिजों पर उसका स्पष्ट नियंत्रण है। बाइडन-युग का इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फोरम (आईपीईएफ) का महत्त्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं में लचीलेपन का समझौता अब हाशिये पर चला गया प्रतीत होता है।

चीन का शीर्ष वैश्विक निर्यातक का कद बरकरार: वर्ष 2025 के पहले 11 महीनों के आंकड़े दिखाते हैं कि अमेरिकी शुल्क वृद्धि, तकनीकी दिक्कतों और घरेलू बाजार की सीमाओं के बावजूद चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बना हुआ है। उसके निर्यात में उच्च प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और सततता-आधारित उत्पादों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। आसियान चीन का सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है, उसके बाद अमेरिका है, हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में उसकी हिस्सेदारी कम हुई है।

उत्पादन मूल देश के नियमों की स्पष्ट परिभाषा की कमी ने भी उन वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा घोषित उच्च शुल्कों को अप्रभावी बना दिया है जो चीन के रास्ते दोबारा भेजी गई थीं(उदाहरण के लिए, वियतनाम के साथ व्यापार समझौते में 40 फीसदी शुल्क)। दूसरी तरफ, मेक्सिको द्वारा एशियाई देशों से आयात पर घोषित नए 50 प्रतिशत शुल्क अगले वर्ष की शुरुआत से कुछ आसियान सदस्यों (थाईलैंड और इंडोनेशिया) के लिए ट्रांस-शिपमेंट चैनल को अवरुद्ध कर देंगे, यह उन देशों के लिए खुला रहेगा जो सीपीटीपीपी सदस्य हैं, जैसे वियतनाम।

बहुप्रतीक्षित बड़ा क्षेत्रीय व्यापार समझौता: वर्तमान स्वरूप में विश्व व्यापार संगठन की घटती प्रासंगिकता के साथ, सीपीटीपीपी नियम-आधारित व्यापार के लिए एक वैकल्पिक मंच के रूप में उभरता दिख रहा है। प्रशांत पार साझेदारी लिए व्यापक और प्रगतिशील समझौता यानी सीपीटीपीपी की सदस्यता विस्तार के मार्ग पर बनी हुई है। नवंबर की मंत्री स्तरीय बैठक में, सीपीटीपीपी सदस्यों ने नए सदस्यों के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया।

इस वर्ष उरुग्वे, और 2026 में इंडोनेशिया, फिलीपींस तथा संयुक्त अरब अमीरात इसके सदस्य बन सकते हैं। इस बैठक में आसियान और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार और निवेश संवाद भी शुरू किए गए। दोनों समूहों यूरोपीय संघ और सीपीटीपीपी की साझा उच्च मानक व्यापार और निवेश प्रतिबद्धताएं निकट भविष्य में वैश्विक व्यापार के लिए एक उपयुक्त नियम-पुस्तिका बनाने की संभावना प्रदान कर सकती हैं।

आखिर में चूंकि अमेरिका अपनी व्यापार नीति से पीछे हटता नहीं दिख रहा है इसलिए शेष विश्व के लिए यह महत्त्वपूर्ण होगा कि वे पीछे नहीं हटते हुए एक वैकल्पिक सहयोगात्मक व्यवस्था के लिए आगे आएं और एक टिकाऊ वैश्विक व्यापार, निवेश और नियामकीय परिदृश्य तैयार करें।


(ले​खिका जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनैशनल स्टडीज में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - December 29, 2025 | 10:34 PM IST

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