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केवल परीक्षा सुधार नहीं, युवाओं के लिए ज्यादा रोजगार और कौशल विकास भी जरूरी

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देश के युवाओं के लिए बेहतर परीक्षा व्यवस्था जरूरी है लेकिन इसके साथ ही अधिक कौशल और रोजगार के अवसर तैयार करना भी आवश्यक है। बता रहे हैं ए के भट्टाचार्य

Last Updated- July 30, 2026 | 10:01 PM IST
Exam
जुलाई 2024 के बजट में 4.1 करोड़ युवाओं के लिए करीब ₹2 लाख करोड़ का रोजगार और कौशल पैकेज घोषित किया गया।

नई दिल्ली में जंतर मंतर पर पिछले हफ्ते हुई घटनाओं पर सरकार की नीतिगत प्रतिक्रिया क्या वांछित परिणाम दे पाने में सफल होगी? क्या इससे भविष्य में युवाओं के ऐसे ही विरोध प्रदर्शनों को टाला जा सकेगा? विरोध प्रदर्शन पर सरकार की तात्कालिक प्रतिक्रिया गलत थी। उसने आंदोलन करने वालों समेत प्रभावित पक्षों से किसी भी तरह की बातचीत करने के बजाय युवा प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के जरिये बल प्रयोग करने का रास्ता चुना।

सरकार ने प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें तब स्वीकार कीं, जब आंदोलन जगह-जगह फैलने लगा। इन मांगों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी शामिल था। उसके बाद ही सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा संचालित परीक्षा प्रणाली में सुधारों की और परीक्षा के पेपर लीक करने वाले दोषियों के विरुद्ध कड़े कानूनी प्रावधान लाने की घोषणा भी की।

संभव है कि जब सरकार देश के युवाओं के असंतोष का आकलन करेगी तो हमें शिक्षा व्यवस्था में और अधिक सुधार देखने को मिलेंगे। युवाओं के लिए वेतन वाले रोजगार की मांग को पूरा करने के लिए भी और कदम उठाए जा सकते हैं। याद रहे कि चुनावी झटकों ने ही सरकार को रोजगार के लिए कुछ योजनाएं लाने पर विवश किया था।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 2024 के लोक सभा चुनावों में इतनी सीटें नहीं मिलीं कि वह अपने दम पर सरकार बना सके। इसलिए लगातार तीसरी बार सत्ता में बने रहने के लिए उसे गठबंधन साझेदारों पर आश्रित रहना पड़ा था।

इसलिए जुलाई 2024 में पेश हुए सरकार के पहले बजट में जब 4.1 करोड़ युवाओं के लिए रोजगार, कौशल विकास और अन्य अवसर आसानी से उपलब्ध कराने हेतु लगभग 2 लाख करोड़ रुपये की योजनाओं का महत्त्वाकांक्षी पैकेज घोषित किया गया तो किसी को हैरत नहीं हुई। इसमें एक इंटर्नशिप योजना भी शामिल थी, जिसके तहत शीर्ष 500 कंपनियां स्वेच्छा से पांच वर्षों में 1 करोड़ युवाओं को एक साल की इंटर्नशिप दे सकती थीं। 

योजना प्रारंभ में दो वर्ष तक चलनी थी, जिसमें सरकार द्वारा प्रति माह लगभग 5,000 रुपये इंटर्नशिप भत्ता और 6,000 रुपये की एकबारगी सहायता दी जानी थी। प्रशिक्षण का खर्च कंपनियों द्वारा वहन किए जाने की अपेक्षा की गई थी, जिसमे से 10 प्रतिशत खर्च उनकी कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व निधि से पूरा किया जा सकता था। एक वर्ष बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इन योजनाओं को मंजूरी दे दी।

जमीनी स्तर पर इन योजनाओं के प्रदर्शन के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है किंतु वरिष्ठ पत्रकार इंदुलेखा अरविंद ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन किया, जिसके उत्तर में उन्होंने पाया कि इंटर्नशिप योजना का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। 30 अप्रैल तक कंपनियों ने इंटर्नशिप के केवल 2.97 लाख अवसर निकाले थे, जो दो साल के लक्ष्य के मात्र 10 प्रतिशत थे। इनमें भी इंटर्नशिप के वास्तविक ऑफर केवल 1.73 लाख रहे।

जिन लोगों को ऑफर मिले उनमें भी केवल 18,000 काम पर पहुंचे और केवल 5,200 ने अपनी इंटर्नशिप पूरी की। शुरू में पांच वर्षों के लिए जा राशि आवंटित की गई थी, उसका 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा मार्च 2026 तक खर्च हो पाया। जो खर्च हुआ उसमें भी लगभग आधा योजना के प्रचार और प्रसार पर गया।

माना जा सकता है कि रोजगार की ये योजनाएं 2024 में इसलिए घोषित की गईं क्योंकि सरकार को चिंता थी कि पर्याप्त नौकरियों और रोजगार अवसरों की कमी पर जन असंतोष बढ़ने दिया गया तो उसे चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन बाद के वर्षों में भाजपा ने चुनाव जीतने शुरू कर दिए और तब उसके नेताओं के लिए यह चिंता उतनी गंभीर नहीं रह गई।

अक्टूबर और नवंबर 2024 में विधानसभा चुनावों के परिणामों ने निश्चित रूप से उस नुकसान की भरपाई करने में मदद की जो उसी वर्ष मई में हुए आम चुनावों में पार्टी को हुआ था। भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने महाराष्ट्र और हरियाणा में सत्ताविरोधी लहर को पार कर लिया और दोनों राज्यों में उसकी सरकारें बनी रहीं।

2025 में बिहार विधानसभा चुनावों में अपने प्रदर्शन के बल पर भाजका एक बार फिर मजबूत राजनीतिक आधार पर खड़ी होती दिखी। 2026 में उसने न केवल असम में दोबारा जीत हासिल की बल्कि पश्चिम बंगाल भी जीत लिया।

इन चुनावी सफलताओं के बाद दिल्ली में भाजपानीत सरकार रोजगार पर उतनी चिंतित नहीं दिखी, जितनी वह 2024 के आम चुनावों के फौरन बाद थी। लेकिन लीक हुए पेपर पर जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ वह विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए परीक्षाएं आयोजित करने की त्रुटिपूर्ण प्रणाली के खिलाफ ही नहीं था। यह विरोध रोजगार के घटते अवसरों और तकनीक तथा आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से पहले ही जूझ रहे बाजार में वेतनभोगी नौकरियों की कमी के बारे में भी था। इसलिए केवल युवाओं के भीतर का आक्रोश दूर करने के लिए केवल परीक्षा प्रणाली सुधारना पर्याप्त नहीं होगा।

इससे भी बड़ी चुनौती पर्याप्त संख्या में नौकरियां तैयार करने की है। ऐसी अर्थव्यवस्था में यह और भी बड़ी चुनौती है, जहां 29 प्रतिशत से अधिक आबादी 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग में है। यह मानना गलत होगा कि जंतर मंतर पर हुए विरोध में केवल युवा छात्र थे। इन युवा छात्रों को 18 से 29 वर्ष की उम्र वाली बड़ी आबादी ने मदद और समर्थन दिया। मतदाताओं के तौर पर यह आबादी इतनी बड़ी है कि आने वाले कुछ वर्षों में चुनाव परिणामों पर असर डाल सकती है।

रोजगार सृजन करने जैसी पेचीदा और कठिन चुनौती को पहचानना तो आसान है मगर इस चुनौती का सामना करने के लिए अधिक दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। सरकार ने 2024 में जो प्रयास किया था उस पर शायद नए नजरिये से गौर करना सही रहेगा। दो साल पहले घोषित इंटर्नशिप योजनाओं में विशेषज्ञों ने कई खामियां निकाल दी थीं।

अब इन खामियों को और देर किए बिना दूर कर देना चाहिए। उदाहरण के लिए इंटर्नशिप योजनाएं बनाते समय अलग-अलग शहरों और कस्बों की खास जरूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। किसी दक्षिणी राज्य में नौकरी तलाश रहे किसी युवा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह उत्तर के किसी राज्य में जाकर किसी कंपनी में इंटर्नशिप करे। इसी तरह उत्तर भारत के किसी युवा से भी इंटर्नशिप के लिए दक्षिण भारत जाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

इसी प्रकार कौशल विकास के अवसर उत्पन्न करने वाली ज्यादा योजनाओं की आवश्यकता को अधिक संकल्प के साथ स्वीकार करना चाहिए और चुनावी चिंता समाप्त होने के बाद उनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। यदि सरकार चाहती है कि हाल के हफ्तों में जिस तरह का विरोध जंतर मंतर पर हुआ, वैसा आंदोलन फिर नहीं हो तो उसे अपनी ऊर्जा केवल परीक्षा प्रणाली पर नहीं बल्कि नौकरियों पर लगानी होगी। 

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First Published - July 30, 2026 | 9:56 PM IST

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