संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की पांच एजेंसियों, खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ), विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी), अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (आईएफएडी), यूनिसेफ और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने 21 जुलाई को अपनी प्रमुख वार्षिक रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी ऐंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2026’ जारी की। इस रिपोर्ट में विभिन्न देशों में भूख, कुपोषण तथा स्वस्थ आहार लेने की क्षमता से जुड़े नए आंकड़े पेश किए गए हैं। इस वर्ष की रिपोर्ट का मुख्य विषय है पौष्टिक आहार की अधिक लागत को समझना। इसमें यह अनुमान लगाया गया है कि कितने लोग स्वस्थ भोजन का खर्च नहीं उठा सकते और 2017 के बाद से स्थिति कितनी बदली है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए), 2013 की उपलब्धियों को आंकने के लिहाज से विशेष महत्त्व रखते हैं। यह रिपोर्ट इस बात पर पुनर्विचार का अवसर भी देती है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किस प्रकार बदलाव किया जाए ताकि वह भुखमरी का अंत करने के सतत विकास के लक्ष्य में प्रभावी योगदान कर सके और भारत के विराट खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम के पोषण संबंधी नतीजे बेहतर कर सके।
भारत 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू कर भोजन के अधिकार को कानूनी मान्यता देने वाला विश्व का पहला देश बना। इस अधिनियम के तहत वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों की 75 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रों की 50 प्रतिशत आबादी को हर महीने बेहद रियायती दर पर प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। इसमें चावल 3 रुपये प्रति किलो, गेहूं 2 रुपये किलो और मोटा अनाज 1 रुपये किलो के भाव मिलता है।
अंत्योदय परिवारों को हर महीने 35 किलोग्राम खाद्यान्न का अधिकार दिया गया था। इस योजना को 2020 से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना में मिला दिया गया, जिसके अंतर्गत सभी पात्र लाभार्थियों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न पूरी तरह निःशुल्क दिया जा रहा है। आज लगभग 80 करोड़ लोगों को हर वर्ष लगभग 5.5 करोड़ टन खाद्यान्न निःशुल्क मिल रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में खाद्य सब्सिडी पर 2.28 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो 2019-20 की तुलना में दोगुने से भी अधिक हैं। इसका मुख्य कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि तथा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खाद्यान्न की खरीद, भंडारण और वितरण का बढ़ता खर्च है।
खाद्य सब्सिडी आज केंद्र सरकार के कुल बजट व्यय की 4 प्रतिशत से ज्यादा हो चुकी है और सार्वजनिक व्यय के लिहाज से यह देश की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना बन गई है। इतना अधिक राजकोषीय व्यय देखते हुए यह देखना आवश्यक है कि बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में लगभग दो-तिहाई आबादी को इस योजना में बनाए रखना ठीक है या नहीं।
ऐसा आकलन वस्तुनिष्ठ प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए। इसके लिए कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं कि क्या परिवारों की क्रय शक्ति बढ़ी है? आज कितने प्रतिशत आबादी पौष्टिक आहार का खर्च वहन नहीं कर सकती? गरीबी में कितनी कमी आई है? वर्तमान में कुपोषण और अल्पपोषण की स्थिति क्या है? पोषण से जुड़े स्वास्थ्य संकेतकों में कितना सुधार हुआ है? सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लोगों को और बेहतर पोषण देने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किस प्रकार सुधार किया जाए?
2013-14 और 2025-26 के बीच भारत की वास्तविक प्रति व्यक्ति आय (2011-12 की स्थिर कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय आय) लगभग 78 प्रतिशत बढ़ गई और 68,572 रुपये से लगभग 1.22 लाख रुपये पर पहुंच गई। हालांकि विभिन्न वर्गों के लोगों की आय में वृद्धि की रफ्तार अलग-अलग रही किंतु लोगों की क्रय शक्ति में कुल मिलाकर उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण गरीबी में आई तेज गिरावट है। जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू किया गया था तब देश की लगभग 22 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रही थी। अब सरकारी आंकड़ों तथा स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार 2022-23 तक गरीबी घटकर लगभग 5 प्रतिशत ही रह गई है।
इन बदलावों के कारण पीडीएस के लाभार्थियों की प्रकृति में भी बड़ा बदलाव आया है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के शुरुआती वर्षों में लगभग एक-तिहाई लाभार्थी गरीब थे और दो-तिहाई लाभार्थी गरीबी रेखा से ऊपर थे। लेकिन अनुमान है कि 2025-26 तक निःशुल्क खाद्यान्न हासिल करने वालों में केवल 10 प्रतिशत ही गरीबी रेखा से नीचे रह गए और 90 प्रतिशत लाभार्थी गरीबी के दायरे से बाहर हो गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समय के साथ पीडीएस का उद्देश्य केवल गरीब परिवारों की भूख मिटाना नहीं रह गया है बल्कि आबादी के बड़े हिस्से के लिए भूख और पोषण दोनों की समस्या का समाधान करने की दिशा में बढ़ गया है।
संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य पेश करती है। इसके अनुसार 2017 में भारत में 59.8 प्रतिशत लोग स्वस्थ आहार का खर्च नहीं उठा पा रहे थे मगर 2025 में उनका आंकड़ा घटकर केवल 35.5 प्रतिशत रह गया। संख्या में देखें तो ऐसे लोगों की तादाद 75.9 करोड़ से घटकर 58.9 करोड़ रह गई। इस दरम्यान लगभग 17 करोड़ लोग अपनी बढ़ी हुई क्रय-शक्ति के कारण पौष्टिक भोजन का खर्च उठाने में सक्षम हो गए।
इन आंकड़ों का नीति निर्माण के लिए विशेष महत्त्व है। यदि पीडीएस का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम आय के कारण कोई भी व्यक्ति पौष्टिक भोजन से वंचित न रहे तो योजना का दायरा फिलहाल वास्तविक आवश्यकता की तुलना में कहीं अधिक बड़ा दिखाई देता है। भविष्य में जैसे-जैसे लोगों की आय और क्रय-शक्ति बढ़ेगी वैसे-वैसे ही स्वास्थ्यवर्द्धक आहार का खर्च नहीं उठा सकने वालों की संख्या और कम होने की संभावना है।
रिपोर्ट में अल्पपोषण का भी अनुमान पेश किया गया है। इसका अर्थ उन लोगों के अनुपात से है, जिन्हें सामान्य, सक्रिय और स्वस्थ जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम कैलरी ऊर्जा वाला भोजन भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता। गरीबी या भोजन खरीदने की क्षमता के मुकाबले यह भूख मापने का अधिक प्रत्यक्ष पैमाना है।
भारत में अल्पपोषण की दर वर्ष 2013-14 में 13 प्रतिशत थी, जो घटकर वर्ष 2023-25 में 9.8 प्रतिशत रह गई। यह सुधार तो दर्शाता है लेकिन इसकी गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक वृद्धि ने लोगों की भोजन खरीदने की क्षमता तो बढ़ाई है किंतु केवल निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराकर भूख की समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
इसलिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अब खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर पोषण सुरक्षा कार्यक्रम बनाना होगा। इसके लिए दो महत्त्वपूर्ण सुधारों पर तत्काल विचार किया जाना चाहिए। पहला, पीडीएस के लाभार्थियों की संख्या धीरे-धीरे उन लोगों तक सीमित की जाए जो वास्तव में पौष्टिक आहार का खर्च वहन नहीं कर सकते।
नवीनतम अनुमानों के अनुसार इससे 2026 में लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 57 करोड़ रह जानी चाहिए। क्रय शक्ति बढ़ने के साथ भविष्य में इसमें और भी बदलाव किए जाने चाहिए। इस प्रकार के उपायों से खाद्य सब्सिडी पर होने वाला व्यय लगभग 29 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
दूसरा, इस बचत का उपयोग लोगों के पोषण स्तर में सुधार लाने के लिए किया जा सकता है। बची हुई राशि का एक भाग उन 10 प्रतिशत लोगों के लिए खाद्यान्न में दाल जैसे अधिक पोषक खाद्य पदार्थों को शामिल करने पर खर्च किया जा सकता है, जो अब भी भूख से प्रभावित हैं। शेष संसाधनों का उपयोग देश की अन्य पोषण संबंधी चुनौतियों जैसे महिलाओं और बच्चों में खून की कमी तथा बच्चों में बौनापन, दुबलापन एवं कम वजन आदि के समाधान में किया जाना चाहिए।
इस प्रकार यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को केवल कैलरी उपलब्ध कराने वाली योजना के बजाय समग्र पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली योजना का रूप दे दिया जाए तो भारत भुखमरी पूरी तरह खत्म करने के सतत विकास के लक्ष्य की दिशा में अधिक तेजी से बढ़ सकेगा।
(लेखक इक्रियर में विशिष्ट प्रोफेसर हैं तथा नीति आयोग के सदस्य रह चुके हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)