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कमजोर रुपया हमेशा बुरा नहीं, जानें कैसे बढ़ा सकता है निर्यात और आर्थिक वृद्धि?

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कई टिप्पणीकार रुपये में गिरावट को राष्ट्रीय शर्म का विषय मानते हैं। डॉलर के मुकाबले रुपया 100 की मनोवैज्ञानिक सीमा लांघ जाए तो इसे लगभग आर्थिक विफलता का प्रमाण माना जाता है

Last Updated- July 28, 2026 | 9:59 PM IST
Indian Rupee
डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के पार जाना आर्थिक विफलता माना जाता है।

मिल्टन फ्राइडमैन ने आर्थिक बहसों के बारे में एक बार बहुत काम की बात कही थी। अलगअलग वैचारिक नजरिये वाले अर्थशास्त्रियों को एक कमरे में रख दीजिए और गैर अर्थशास्त्रियों को दूसरे कमरे में। दोनों समूहों से आर्थिक नीति पर चर्चा करने को कहिए। अधिकतर मुद्दों पर अर्थशास्त्री एक दूसरे से इतना असहमत नहीं होंगे, जितना गैर अर्थशास्त्रियों से। भारत की विनिमय दर पर चल रही बहस भी कुछ ऐसी ही है।

कई टिप्पणीकार रुपये में गिरावट को राष्ट्रीय शर्म का विषय मानते हैं। डॉलर के मुकाबले रुपया 100 की मनोवैज्ञानिक सीमा लांघ जाए तो इसे लगभग आर्थिक विफलता का प्रमाण माना जाता है। अर्थशास्त्री आम तौर पर इस मुद्दे को अलग ढंग से देखते हैं। वे अवमूल्यन का उत्सव नहीं मनाते, ही इसके कुप्रभावों से इनकार करते हैं। वे ज्यादा अनुशासित प्रश्न पूछते हैं: इसकी क्या कीमत चुकानी होगी, इसके लाभ क्या हैं और रुपये की चाल व्यवस्थित है या नहीं? कीमत तो चुकानी पड़ती है।

कमजोर रुपये से आयात महंगा हो जाता है, विशेषकर कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का। यह उन कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर भी बोझ बढ़ा देता है जिन्होंने विदेशों से ऋण लिया है। रुपये में गिरावट तेज और बेतरतीब हो तो वित्तीय अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

लेकिन इसके लाभ भी हैं। धीरेधीरे वास्तव में अवमूल्यन हो तो भारतीय वस्तुएं विदेश में अधिक होड़ कर पाती हैं। रुपया कमजोर होता है तो विदेशी खरीदारों के लिए भारतीय उत्पाद सस्ते हो जाते हैं, निर्यात बढ़ता है, कंपनियां विस्तार करती हैं और रोजगार आते हैं। भारत में इसके शुरुआती संकेत शायद पहले ही दिख रहे हैं क्योंकि हाल में निर्यात दो अंकों की दर से बढ़ा है।

लाभ केवल इतना नहीं है कि कंपनियां विदेशों में अधिक बेचती हैं। निर्यात कंपनियों को बदल देता है। जब कंपनियां वैश्विक बाजारों में पहुंचती हैं तो उन्हें खरीदारों के साथ सख्त गुणवत्ता मानकों, कठिन प्रतिस्पर्धा और डिलिवरी, डिजाइन तथा विश्वसनीयता में सुधार के दबाव का सामना करना पड़ता है। टिके रहने के लिए उन्हें सुधार करना ही पड़ता है। वे उत्पादन के तरीके बेहतर करते हैं, प्रबंधन के तरीके सुधारते हैं, गुणवत्ता नियंत्रण में निवेश करते हैं और विदेशी ग्राहकों प्रतिस्पर्धियों से सीखते हैं।

यह कोई किताबी बात नहीं है। निर्यात से सीखने पर जो भी लिखा गया है, उससे पता चलता है कि कंपनियां निर्यात बाजारों में प्रवेश करने के बाद अक्सर अधिक उत्पादक बन जाती हैं। स्लोवेनियाई विनिर्माण पर जान डी लोएकर के अध्ययन से पता चलता  है कि बेहतर कंपनियां निर्यात अधिक करती हैं किंतु निर्यात शुरू करने पर वे भी उत्पादक बन जाती हैं। उत्पादकता में इजाफा निर्यातकों तक ही सीमित नहीं रहता।

निर्यातकों की जरूरतें पूरी करने के लिए उन्हें आपूर्ति करने वाले भी स्वयं में सुधार करते हैं। श्रमिक और प्रबंधक एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जाते रहते हैं। प्रतिस्पर्द्धी सफल तौरतरीकों को अपना लेते हैं। वैश्विक बाजारों के लिए तैयार तकनीकें अंत में देसी बाजारों में भी जाती हैं।

निर्यात प्रोत्साहन के पीछे की औद्योगिकनीति का तर्क यही है। निर्यात से केवल विदेशी मुद्रा नहीं आती बल्कि क्षमताएं भी उत्पन्न होती हैं। दक्षिण कोरिया के अनुभव से यह बात साफ होती है। लैरी वेस्टफाल के अध्ययन में तर्क दिया गया है कि निर्यात के लिहाज से किया गया कोरिया का औद्योगीकरण केवल विदेशों में अधिक वस्तुएं बेचने के लिए नहीं था। उसका मकसद निर्यात में होड़ के जरिये कंपनियों को तकनीकी क्षमता हासिल करने के लिए मजबूर करना था।

कोरिया साधारण विनिर्माण से इस्पात, जहाज, इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहन तक पहुंच गया क्योंकि कंपनियों को वैश्विक बाजारों में धकेला गया और सीखने के लिए मजबूर किया गया।  यही वजह है कि विनिमय दर नीति को केवल मौद्रिक या वित्तीय वेरिएबल नहीं मानना चाहिए। यह औद्योगिक रणनीति का भी हिस्सा है। प्रतिस्पर्द्धी रुपये से उन भारतीय कंपनियों की संख्या बढ़ती है, जो निर्यात बाजारों की देहरी लांघ सकती हैं। कुछ नाकाम होंगी। दूसरी कंपनियां सीखेंगी, बढ़ेंगी और ज्यादा उत्पादक बनेंगी। इससे जो सामाजिक लाभ होगा, वह निर्यातक को हो रहे निजी लाभ से बहुत ज्यादा हो सकता है। कमजोर रुपया देश में उत्पादन को भी सहारा देता है।

आत्मनिर्भर भारत के तहत भारत ज्यादा देसी क्षमता चाहता है। शुल्क से उत्पादकों को मदद मिल सकती है किंतु वे सख्त, व्यवस्था बिगाड़ने वाले होते हैं और उनका जवाब भी मिल सकता है। मुद्रा को ज्यादा बारीकी से संभालना होता है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है, लेकिन ऐसा बाजार तंत्र के जरिये होता है किसी संरक्षणवादी दीवार से नहीं।

इसीलिए रुपये के अवमूल्यन को स्वतः ही आर्थिक पतन का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। जापान का येन तेजी से गिरा है। कोरिया के वॉन का अवमूल्यन हुआ है। इंडोनेशिया का रुपिया दबाव में रहा है। कुछ यूरोपीय मुद्राएं डॉलर के मुकाबले मजबूत हुई हैं। यह उतारचढ़ाव वैश्विक पूंजी प्रवाह, ब्याज दरों के अंतर, मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं और निवेशकों की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। इसे देश के प्रदर्शन पर कोई नैतिक निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।

सही निष्कर्ष यह नहीं है कि भारत को स्वयं रुपये का अवमूल्यन करवाना चाहिए। यह लापरवाही होगी। ही भारतीय रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार की अनदेखी करनी चाहिए। बाजारों में अव्यवस्था होने पर उसकी भूमिका आवश्यक होती है। अचानक उतारचढ़ाव से बैंक और कंपनियों की बैलेंस शीट को नुकसान पहुंच सकता है, घबराहट हो सकती है, व्यापार के लिए वित्त की उपलब्धता कम हो सकती है और वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है। विदेशी मुद्रा भंडार ऐसे ही संकट रोकने के लिए होता है।

लेकिन बेतरतीब उतारचढ़ाव को रोकने और मनमाने मनोवैज्ञानिक स्तरों की रक्षा करने में अंतर है। रिजर्व बैंक को भंडार का उपयोग अत्यधिक उतारचढ़ाव को काबू रखने में करना चाहिए, रुपये को किसी आंकड़े पर रोके रखने के लिए नहीं। भारत को ऐसे उपायों से भी बचना चाहिए जो आज धीरेधीरे होने वाले अवमूल्यन को टालने के लिए कल के जोखिम पैदा करें। अल्पकालिक पूंजी आकर्षित करने के लिए जिन गारंटी, कृत्रिम प्रोत्साहन और उपायों का सहारा लिया जाता है उन्हीं के कारण कल पूंजी बाहर भी जा सकती है। शक्तिशाली नीतिगत हथियारों को प्रतीकों की रक्षा में बरबाद नहीं करना चाहिए।

रुपया मूल्य है, देश का झंडा नहीं। स्थिर अर्थव्यवस्था के लिए लगातार स्थिर रहने वाली विनिमय दर आवश्यक नहीं है। यदि धीरेधीरे और व्यवस्थित अवमूल्यन से भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों में प्रवेश करने, सीखने, सुधार करने और रोजगार पैदा करने में मदद मिलती है तो इससे डरना नहीं चाहिए। इसे सावधानी के साथ संभालना चाहिए और समझदारी से इस्तेमाल करना चाहिए।


(लेखक इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में पढ़ाते हैं)

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First Published - July 28, 2026 | 9:59 PM IST

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