विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के अंतर्गत एक अंतरिम व्यवस्था के कारण लगभग तीन दशक तक सॉफ्टवेयर, क्लाउड आधारित सेवाओं और डिजिटल सामग्री आदि का व्यापार सीमा शुल्क के बगैर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होता रहा। सबसे पहले 1998 में अपनाई गई और फिर 11 बार बढ़ाई गई यह रोक अब खत्म हो गई है क्योंकि कैमरून के याओंडे में इस वर्ष मार्च में हुए डब्ल्यूटीए के 14वीं मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी14) में इसे आगे जारी रखने पर सहमति नहीं बनी। संभावना है कि विभिन्न देश तुरंत शुल्क नहीं लगाएंगे लेकिन इस समाप्ति ने वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में उस समय अनिश्चितता जरूर बढ़ा दी है, जब व्यापार बढ़ते संरक्षणवाद और भूराजनीतिक तनावों के दबाव में है।
भारत हाल तक इस रोक को आगे बढ़ाने के विरुद्ध था। उसका तर्क था कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को कीमती राजस्व का नुकसान हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास (अंकटाड) के अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि भारत जैसे विकासशील देश इस रोक की वजह से सालाना करीब 25 अरब डॉलर गंवा रहे हैं, जो इन्हें इस शुल्क से मिल सकता था। किंतु भारत को अपने व्यापक हित पर नजर डालनी चाहिए।
डब्ल्यूटीओ के आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2025 में डिजिटल तरीके से दी जाने वाली सेवाओं के सबसे बड़े निर्यातकों में जगह बना ली। भारत से इन सेवाओं का निर्यात 18 प्रतिशत बढ़कर 328 अरब डॉलर तक पहुंच गया। डिजिटल सेवाओं के निर्यात में भारत ने 2005 से लगातार व्यापार अधिशेष बनाए रखा है, जिससे सॉफ्टवेयर, वित्तीय प्रौद्योगिकी, अनुसंधान एवं विकास तथा क्लाउड–सक्षम निर्यात की बढ़ती अहमियत पता चलती है।
देश में अब 2,100 से अधिक वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) हैं, जिनसे सालाना करीब 100 अरब डॉलर आय होती है। ये जीसीसी सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, इंजीनियरिंग, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और अनुसंधान के क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा देते हैं। ये व्यवसाय सीमा पार बेरोकटोक डिजिटल प्रवाह पर निर्भर करते हैं।
डिजिटल व्यापार नियमों को बांटा जाएगा तो अनुपालन का खर्च बढ़ जाएगा, निवेश के फैसले जटिल हो जाएंगे और दुनिया भर के लिए नवाचार एवं सेवाओं के केंद्र के रूप में भारत का आकर्षण घट जाएगा। शुल्क लगाने पर अन्य व्यापारिक साझेदार भी शुल्क लगा सकते हैं, जिससे भारत के निर्यात पर असर पड़ेगा। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत विकसित दुनिया के साथ भारत व्यापार संबंधों को गहरा करना चाहता है और ऐसे शुल्क जटिलता पैदा कर सकते हैं।
भारतीय सेवाओं में परिवर्तन और उनकी व्यापक स्थिति बताती है कि भारत सरकार ने एमसी 14 में अपना रुख क्यों बदला, जहां उसने इस रोक को 2030 तक बढ़ाने का समर्थन किया। यह बदलाव सीधे आर्थिक यथार्थ को दर्शाता है। डिजिटल निर्यात के विस्तार से होने वाले लाभ उस मामूली राजस्व से कहीं अधिक हैं जो भारत सीमा शुल्क लगाकर पा सकता है।
भले ही डब्ल्यूटीओ की रोक हटने से सदस्य देशों को इलेक्ट्रॉनिक निर्यात पर सीमा शुल्क लगाने का विकल्प मिल जाता है मगर भारत को ऐसा करने से बचना चाहिए। डब्ल्यूटीओ के इस बात पर कभी एकमत ही नहीं हो सके कि ‘इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण’ क्या होता है या रोक केवल प्रसारण के माध्यम पर लागू है अथवा डिजिटल सामग्री पर भी। भौतिक वस्तुओं के विपरीत डिजिटल सामग्री सीमा शुल्क चौकियों से नहीं गुजरती। उनके स्रोत, सीमा शुल्क मूल्य और आयात बिंदु का निर्धारण कानूनी और तकनीकी रूप से जटिल होगा।
इस बीच यह उल्लेख करना महत्त्वपूर्ण है कि व्यापार के विकास का स्वरूप बदल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स पर डब्ल्यूटीओ के जॉइंट स्टेटमेट इनीशिएटिव में 90 प्रतिशत विश्व व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाले 91 सदस्य शामिल थे। इसमें ई–कॉमर्स नियमों की स्थिर भाषा पर बात की गई है। भारत इस पहल से बाहर रहा है क्योंकि उसे कई पक्षों द्वारा नियम बनाए जाने से चिंता है।
भारतीय नीति–निर्माताओं को अपने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए। ऐसी पहलों का हिस्सा बनने से भारत को मानक और नियम तय करने की प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिलेगा। भारत के आकार और रणनीतिक हितों को देखते हुए उन मंचों पर उसकी आवाज जरूर होनी चाहिए, जहां व्यापार के नियम कायदे तैयार किए जाते हैं।