केंद्र सरकार ने गत सप्ताह एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हुए देश में बनी वस्तुओं के निर्यात के लिए ई-कॉमर्स के इन्वेंट्री आधारित मॉडल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दे दी। यह स्वागतयोग्य कदम है। इससे भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और विशेष रूप से छोटे और मझोले विनिर्माण उद्यमों (एमएसएमई) को वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा। भारत के निर्यात को गति देने की उम्मीद वाले इस फैसले पर काम 2025 से ही चल रहा था, जब अमेरिका ने ऊंचे आयात शुल्क लगा दिए थे। यह निर्णय भारत के सालाना लगभग 4-5 अरब डॉलर के ई-कॉमर्स निर्यात को बढ़ाने में मददगार हो सकता है, लेकिन ई-कॉमर्स क्षेत्र के नियमों में व्यापक सुधार के लिहाज से यह पर्याप्त नहीं है। इ
न्वेंट्री आधारित ई-कॉमर्स मॉडल में एफडीआई की अनुमति केवल निर्यात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि इसे पूरे ई-कॉमर्स कारोबार पर लागू किया जाना चाहिए फिर चाहे माल निर्यात के लिए हो या देश के भीतर उपभोग के लिए। फिलहाल 90 से 100 अरब डॉलर आकार वाला भारत का ई-कॉमर्स क्षेत्र 2030 तक लगभग 250 अरब डॉलर हो जाने का अनुमान है। ऐसे में इस क्षेत्र को वास्तविक और उल्लेखनीय गति देने के लिए अधिक व्यापक एवं दूरगामी सुधारों की आवश्यकता है।
भारत में ऑनलाइन और ऑफलाइन खुदरा क्षेत्र दशकों से ढेर सारे नियमों से जूझ रहे हैं। आज क्विक कॉमर्स जैसे नए क्षेत्र बहुत ताकत के साथ उभर रहे हैं, इसलिए इस मसले को भी फौरन हल करने की जरूरत है। कम श्रेणियों और खांचों वाली सरल खुदरा नीति से ही सही मायनों में कारोबारी सुगमता आएगी। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में इन्वेंट्री आधारित या मार्केटप्लेस आधारित स्वरूप का चयन उद्योग जगत पर छोड़ दिया जाता है।
उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) द्वारा बनाए गए वर्तमान ई-कॉमर्स दिशानिर्देश केवल कारोबार से कारोबार (बी2बी) और मार्केटप्लेस प्रारूपों में प्रत्यक्ष एफडीआई की अनुमति देते हैं।
कारोबार से उपभोक्ता (बी2सी) और इन्वेंट्री-आधारित ई-कॉमर्स में एफडीआई की अनुमति नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो एमेजॉन और वॉलमार्ट के स्वामित्व वाले फ्लिपकार्ट जैसे विदेशी ई-कॉमर्स खिलाड़ी खुद माल नहीं रख सकते और उसे सीधे उपभोक्ताओं को नहीं बेच सकते मगर देसी ब्रांड ऐसा कर सकते हैं।
ये नियम भारतीय खुदरा विक्रेताओं और किराना दुकानों की रक्षा करने के इरादे से बनाए गए हो सकते हैं, लेकिन ऐसी नीति समान अवसरों के रास्ते में आड़े आती है। साथ ही ई-कॉमर्स कंपनियों को अलग-अलग कामों के लिए आठ-नौ मंत्रालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिसे निवेशकों के लिए बड़ी रुकावट माना जाता है।
निर्यात के लिए खास तौर पर बदला गया एफडीआई नियम कुछ श्रेणियों के उद्यमों के लिए कागज पर फायदेमंद दिख सकता है मगर इसे लागू करने में अड़चनें आ सकती हैं। संशोधित नियमों के मुताबिक काम करते समय बुनियादी ढांचे के सृजन और आपूर्ति श्रृंखला के तंत्र में दिक्कत आ सकती है।
उदाहरण के लिए विदेशी-स्वामित्व वाली कोई ई-कॉमर्स कंपनी यदि संशोधित नियमों का लाभ उठाना चाहती है तो उसे दो तरह के गोदाम बनाने पड़ेंगे और दोनों में अलग-अलग माल भी रखना होगा। उसे निर्यात के लिए अलग गोदाम बनाने होंगे और मार्केटप्लेस के जरिये देसी उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए अलग गोदाम तथा डार्क स्टोर्स (केवल ऑनलाइन ऑर्डरों के लिए) बनाने पड़ेंगे।
कंपनी के विक्रेताओं और आपूर्ति श्रृंखला कंपनियों के साथ काम भी नए प्रावधानों के तहत बदलेगा। जटिलता बढ़ेगी तो व्यवस्था में खामियां उत्पन्न हो सकती हैं और अनुपालन पर भी असर पड़ सकता है।
देसी व्यापारी और वितरक पहले ही नियम उल्लंघन के मसले पर विदेशी कंपनियों के साथ लड़ रहे हैं। श्रेणियां तथा नियम बढ़ाने से उद्योग में कटुता बढ़ सकती है और संभावनाओं से भरे ई-कॉमर्स उद्योग की संभावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। इस क्षेत्र में सभी के लिए एकसमान नियम ही सही रास्ता है, जिसके लिए सोच-समझकर ई-कॉमर्स नीति बनाने की जरूरत है।