पैंतीस वर्ष पहले आज ही के दिन जो घटित हुआ वह वास्तव में ऐतिहासिक था। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था राजकोषीय अनुशासनहीनता और अभूतपूर्व भुगतान संतुलन संकट की दोहरी चुनौतियों से जूझ रही थी। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम हो गए थे और देश के पास मुश्किल से पंद्रह दिन का आयात करने लायक मुद्रा बची थी। यही वजह है कि सरकार को बैंक ऑफ इंगलैंड में सोना गिरवी रखना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से ऋण लेना पड़ा।
1990-91 में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 7.6 फीसदी तक पहुंच गया था और थोक मूल्य सूचकांक में दो अंकों की वृद्धि हुई थी। इतना ही नहीं, केंद्र में एक नव-निर्वाचित अल्पमत सरकार सत्ता में थी। यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह उस समय संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। परंतु ये कमजोरियां उस सरकार के संकल्प को रोक नहीं सकीं और उसने भारत की आर्थिक नीतियों में मौलिक परिवर्तन लाने का निर्णय लिया।
मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई, 1991 को जो बजट पेश किया उसने आने वाले वर्षों में देश के आर्थिक सुधार और आर्थिक वृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। एक साल की अवधि में राजकोषीय घाटे में सबसे बड़ी कमी दर्ज करने और आयात शुल्क में कमी करने (यह प्रक्रिया इसके बाद कई वर्षों तक जारी रही) के अलावा बजट ने कराधान और वित्तीय क्षेत्र की नीतियों में और सुधारों की बुनियाद भी रखी। यह कवायद विशेषज्ञ समितियों की अनुशंसाओं के जरिये की गई। उस ऐतिहासिक बजट की प्रस्तुति से कुछ घंटे पहले ही सरकार ने संसद में अपनी नई नीति पेश की जिसमें 18 चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़कर सभी उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग समाप्त कर दी गई।
एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम के तहत शासित कंपनियों के लिए परिसंपत्ति सीमा हटा दी गई और सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार घटाकर निजी उद्यमों को 10 ऐसे क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति दी गई जो अब तक उनके लिए निषिद्ध थे। 34 उद्योगों में 51 फीसदी तक विदेशी निवेश को स्वतः मार्ग से अनुमति दी गई। कुछ सप्ताह पहले ही नकद प्रतिपूरक सहायता जो निर्यात सब्सिडी का एक रूप थी, समाप्त कर दी गई थी और भारतीय रुपये का दो चरणों में अवमूल्यन किया गया था जिससे एक उदारीकृत विनिमय दर प्रबंधन प्रणाली की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार की इक्विटी का विनिवेश भी शुरू किया गया। उन सुधारों के परिणाम भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए निस्संदेह सकारात्मक रहे। क्योंकि पिछले पैंतीस वर्षों में औसत वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर सुधारों से पहले की समान अवधि की तुलना में अधिक रही। बाद की सरकारों ने उन सुधारों की प्रक्रिया को जारी रखा और उनके दायरे तथा कवरेज को बढ़ाया भले ही यह अक्सर धीमी गति से हुआ और इसे राजनीतिक अड़चनों का सामना करना पड़ा।
2018 से शुल्क बढ़ाए गए और औद्योगिक नीति एक नए नाम से फिर लौट आई। यदि आने वाले वर्षों में भारत की वृद्धि और विकास की दिशा को बेहतर बनाना है तो ऐसे विचलनों को ठीक करना होगा। सरकार के लिए यह भी महत्त्वपूर्ण होगा कि वह आर्थिक सुधारों के विचार को उसी उत्साह से अपनाए जैसा 1991 में दिखाया गया था और उस भावना को पुनर्जीवित करे जिसके वशीभूत राव और सिंह की जोड़ी ने वे निर्णय लिए थे।
नए सुधारों को आगे बढ़ाने में क्षेत्र विशेषज्ञों को शामिल करना एक ऐसा लक्ष्य होना चाहिए जिसे छोड़ा नहीं जा सकता। नियामक संस्थाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना ऐसा सिद्धांत होना चाहिए जिसे कोई भी ताकत कमजोर न कर सके। राज्य सरकारों को भी सुधारों को अपनाने के लिए एक सहभागी और परामर्शी तंत्र के माध्यम से प्रोत्साहित करने के कदम उठाने चाहिए। समान रूप से ही महत्त्वपूर्ण होगा सुधारों के दायरे को उन क्षेत्रों तक विस्तारित करना जो अब तक उपेक्षित रहे हैं जैसे शिक्षा, कौशल विकास, न्याय वितरण प्रणाली, कृषि और स्वास्थ्य सेवा। भारत को अपने अगले बड़े सुधारों की शुरुआत करने के लिए किसी नए संकट की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।