भारत का शेयर बाजार तमाम चुनौतियों के बीच मजबूती से खड़ा है। कोविड-19 महामारी में फिसलने के बाद मानक सूचकांक (निफ्टी 50 और सेंसेक्स) घरेलू निवेश, खुदरा निवेशकों की बढ़ती तादाद और दीर्घकालिक वृद्धि दर की उत्साहजनक बातों के दम पर नई बुलंदियों पर पहुंचे हैं।
इसके बावजूद हाल में जब सूचकांक अपने अब तक के उच्चतम स्तर को पार कर गए तो एक अजीब सी बेचैनी छा गई। कई निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो लाल निशान में अटके हुए नजर आए। सोशल मीडिया पर हैरानी पसरी हुई थी। आखिर, बाजार सर्वकालिक उच्च स्तर पर कैसे हो सकते हैं जबकि पोर्टफोलियो नीचे सरक गए हैं? निफ्टी रिटर्न और पोर्टफोलियो रिटर्न, आर्थिक वृद्धि एवं कंपनियों की आय वृद्धि और अंत में आय वृद्धि एवं बाजार के रिटर्न के बीच तालमेल का घोर अभाव कई परेशान करने वाले सवाल खड़े कर रहा है।
निफ्टी दिग्गजों कंपनियों का जमावड़ा है। इसमें बैंक, वित्त, सॉफ्टवेयर, दवा, उपभोक्ता वस्तु और जिंस उत्पादक क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। ये सभी कंपनियां परिपक्व और तुलनात्मक रूप से अधिक स्थिर हैं। मगर हाल में निवेश में हुई भारी भरकम बढ़ोतरी से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। वर्ष 2023 और 2024 में बाजार में आई तेजी छोटी और मझोली कंपनियों के कारण आई। सरकार के पूंजीगत व्यय (रेलवे, सड़क, शहरी परिवहन, रक्षा, जल, बिजली और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में) के दम पर इन कंपनियों के शेयर उछल गए। खुदरा निवेशक उनके साथ हो लिए और मुनाफा भी कमाया।
हालांकि, पिछले साल की शुरुआत से भारी भरकम सरकारी व्यय में कमी आई है। पूंजीगत व्यय में कमी के लिए पहले आम चुनाव और फिर मॉनसून जैसे कारण गिनाए गए। बाद में भू-राजनीतिक मुद्दे केंद्र में आ गए। इनके बाद फिर मॉनसून एक कारण बनकर आ गया। सैकड़ों कंपनियां, जो सरकारी पूंजीगत व्यय पर ऊंची उड़ान भर रही थीं, वे थम गई हैं या फिसल गई हैं। ये वे शेयर थे जो खुदरा पोर्टफोलियो में अच्छी-खासी जगह घेरे हुए थे।
इसके उलट निफ्टी ने शायद ही इस पर ध्यान दिया और अप्रभावित रहा। लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) को छोड़कर निफ्टी में गिनी-चुनी कंपनियां ही पूंजीगत व्यय पर निर्भर रहती हैं। तेजी के दौरान कम चढ़ने के कारण गिरावट के दौरान वे अधिक फिसले भी नहीं। इसे ध्यान में रखते हुए निफ्टी की तुलना खुदरा पोर्टफोलियो से करना कहीं से तर्कसंगत नहीं लग रहा है।
दूसरी पहेली भारत के नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि और निफ्टी की आय के बीच अंतर है। भारत की जीडीपी 2008 से लगभग 10 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर (सीएजीआर) से बढ़ी है। आम धारणा यह है कि निफ्टी कंपनियों को जीडीपी की तुलना में अपनी बिक्री और आय तेजी से बढ़ानी चाहिए क्योंकि ये देश की सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार हैं जिन्हें उत्पादन बढ़ने के साथ लागत में कमी और बाजार प्रभुत्व से लाभ मिलता है।
मोतीलाल ओसवाल द्वारा हाल ही में जारी एक अध्ययन से पता चलता है कि 2008 और 2025 के बीच निफ्टी की प्रति शेयर आय में सीएजीआर केवल 8 फीसदी रही। आखिर यह अंतर क्यों है? हमें यह समझ लेना चाहिए कि अमेरिका में लगभग 70 फीसदी जीडीपी खपत से आती है और उस खपत का अधिकांश हिस्सा बिक्री के रूप में सूचीबद्ध कंपनियों को जाता है। भारत में खपत जीडीपी का लगभग 62 फीसदी है मगर एक छोटा हिस्सा ही सूचीबद्ध उपभोक्ता कंपनियों को मिल पाता है।
पूंजीगत व्यय के आंकड़े और सवाल खड़े करते हैं। जीडीपी को निवेश में तेजी से बढ़ावा मिलता है मगर इसे निफ्टी कंपनियों पर शायद ही असर होता है। भारत को पिछले दो दशकों में दो बार इसका अनुभव हुआ है। पहला अनुभव 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट से पहले और दूसरा उसके बाद हुआ था। कांग्रेस के नेतृत्व वाली दो सरकारों के अंतर्गत पूंजीगत व्यय में तेजी आई थी मगर निफ्टी की शायद ही किसी कंपनी को इसका लाभ मिला। दूसरी तेजी वर्ष 2022 और 2024 के बीच आई जिसे सरकार के पूंजीगत व्यय से मदद मिली थी। इससे सीधे तौर पर छोटी कंपनियों को लाभ हुआ लेकिन किसी निफ्टी कंपनी को कोई फायदा नहीं हुआ।
तीसरी मान्यता यह रही है कि आय वृद्धि स्वतः ही बाजार में ऊंचे रिटर्न को बढ़ावा दे देती है। यह तीनों धारणाओं में सबसे अधिक भ्रामक है क्योंकि यह मानता है कि शुरुआती और अंतिम मूल्यांकन मायने नहीं रखते हैं, केवल आय ही मायने रखती है। मगर शुरुआती मूल्यांकन कम है और बाद में यह अधिक हो जाता है तो मामूली आय वृद्धि के बावजूद रिटर्न मजबूत होगा। अक्टूबर 2008 में गिरावट की आंधी में निफ्टी लगभग 2,500 पर था। 2020 की शुरुआत तक यह मोटे तौर पर 12,000 तक पहुंच गया था।
उस अवधि के दौरान केवल 7 फीसदी आय वृद्धि के बावजूद लाभांश छोड़कर सालाना 15-16 फीसदी रिटर्न मिला। इसका उल्टा भी उतनी ही सच है। ऊंचे मूल्यांकन पर शुरुआत करना और कम मूल्यांकन पर बिकवाली करना नुकसान की तरफ ले जाता है। वर्ष 1990 और 2008 के बीच ताइवान की जीडीपी में सालाना 5 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई। मगर उसी अवधि में उसका शेयर बाजार लगभग 50 फीसदी तक फिसल गया जो मूल्यांकन घटने से पुराने स्तर पर आ गया। जापान के निक्केई ने 1989 में हासिल उच्च स्तर से 34 वर्षों तक ऋणात्मक रिटर्न दिया।
पिछले तीन दशकों में संरचनात्मक परिवर्तन, नए अभियानों, नीतियों और भव्य परियोजनाओं के बारे में बार-बार उत्साह दिखता रहा है। भारत के शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था को लेकर कही जाने वाले उत्साहजनक बातों के बावजूद निवेशकों को खास फायदा नहीं हुआ है। इसका मुख्य कारण कमजोर आय वृद्धि रही है। एक ऐसा कारण है जिसे कोई भी धारणा पर्दा नहीं डाल सकती।
कंपनियों का मुनाफा जिसके कभी सुधारों, राजकोषीय मजबूती और औपचारिकता के दम पर सरपट दौड़ने की उम्मीद थी वह घोंघे की चाल से आगे बढ़ रहा है। इससे रिटर्न को मजबूती देने वाला केवल एक ही कारक बच जाता है और वह है कम मूल्यांकन। मगर तेजड़िये भी मानते हैं कि मौजूदा समय में मूल्यांकन कम नहीं है। गणित बिल्कुल साफ है और इसमें इधर-उधर की कोई गुंजाइश नहीं है। मजबूत लाभ या सस्ती कीमतों के बिना सभी धारणाएं धूल फांकने लगती हैं।
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक और मनीलाइफ फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं)