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Year Ender: 2025 में RBI ने अर्थव्यवस्था को दिया बूस्ट — चार बार रेट कट, बैंकों को राहत, ग्रोथ को सपोर्ट

2025 में RBI द्वारा चार मौद्रिक नीतियों में कुल 1.25 प्रतिशत की ब्याज दर कटौती की गई, साथ ही महंगाई के रिकॉर्ड निचले स्तर पर रहने से ग्रोथ को समर्थन दिया गया

Last Updated- December 30, 2025 | 3:30 PM IST
RBI governor Sanjay Melhotra
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा | फाइल फोटो

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस साल अर्थव्यवस्था को पटरी पर दौड़ाने के लिए खूब हाथ-पैर मारे। नए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पद संभालते ही फरवरी में पहली मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की कटौती कर दी। महंगाई के रिकॉर्ड नीचे स्तर पर पहुंचने से बैंक को ग्रोथ को सपोर्ट करने का मौका मिला। पूरे साल में छह बैठकों में से चार में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती हुई, जिसमें जून की बैठक में 0.50 प्रतिशत का बड़ा कट शामिल था।

मल्होत्रा, जो पहले सरकारी अधिकारी थे और अब सेंट्रल बैंक के बॉस बने हैं, ने इसे ‘दुर्लभ गोल्डीलॉक्स दौर’ बताया। उनका मतलब था कि अर्थव्यवस्था न ज्यादा गर्म है न ठंडी, बिल्कुल सही तापमान पर है। अमेरिका के टैरिफ और दुनिया की राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद GDP ग्रोथ 8 प्रतिशत से ऊपर रही, जबकि महंगाई 1 प्रतिशत से नीचे।

मल्होत्रा ने अपने एक साल के कार्यकाल को पूरा करते हुए साफ कहा कि आगे ग्रोथ थोड़ी धीमी पड़ सकती है और महंगाई RBI के 4 प्रतिशत वाले लक्ष्य के करीब पहुंचेगी। कुछ लोग नाममात्र GDP ग्रोथ के कम रहने पर चिंता जता रहे हैं, लेकिन गवर्नर ने स्पष्ट किया कि बैंक असली GDP पर फोकस करता है, जो महंगाई घटाने के बाद निकलती है। असल में महंगाई की दर RBI के अनुमानों से काफी कम रही, जिससे बैंक की भविष्यवाणियों पर सवाल उठे। साल में शामिल हुईं शिक्षाविद पूनम गुप्ता ने सफाई दी कि अनुमानों में कोई सिस्टेमैटिक गड़बड़ी नहीं है।

बैंकों पर पड़ा दोहरा असर

RBI के इन कदमों से बैंकों की कमर थोड़ी टेढ़ी हो गई। ब्याज दरें कम होने से उनकी नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) सिकुड़ गईं और मुख्य कमाई पर चोट पड़ी। लेकिन सिस्टम में पैसे की बहुलता बनाए रखने और नियमों में ढील देने से बैंक को राहत भी मिली। फरवरी की पहली प्रेस मीटिंग में मल्होत्रा ने जोर देकर कहा कि वित्तीय स्थिरता जरूरी है, लेकिन नियमों की कीमत भी देखनी पड़ती है। उन्होंने वादा किया कि RBI के फैसलों से बैंकों पर बोझ कम करने की कोशिश करेंगे।

साल भर में ढील की झड़ी लग गई। अक्टूबर की बैठक में तो 22 बड़े बदलावों की घोषणा हुई, जो RBI जैसे सख्त संस्थान के लिए अनोखे थे। मिसाल के तौर पर, बैंकों को अब भारतीय कंपनियों के विदेशी अधिग्रहणों के लिए फंडिंग करने की छूट मिल गई। ‘व्यवसाय के रूप’ वाले ड्राफ्ट नियम पर पीछे हट गए, जिसमें बैंकिंग जैसी गतिविधियों में दूसरी कंपनियों को रोकने की बात थी।

Also Read: RBI की रिपोर्ट में खुलासा: भारत का बैंकिंग क्षेत्र मजबूत, लेकिन पूंजी जुटाने में आएगी चुनौती

इंफ्रा फाइनेंस में भी कुछ बदलाव किए गए। इन फैसलों पर वित्तीय स्थिरता को लेकर सवाल उठे, लेकिन मल्होत्रा ने साफ कहा कि स्थिरता सबसे ऊपर है। उन्होंने जोड़ा कि नियम ग्रोथ को बाधित न करें और नए बदलावों में पर्याप्त सावधानियां बरती गई हैं।

खास बात ये कि अधिग्रहण फाइनेंस की घोषणा SBI चेयरमैन CS सेट्टी की सार्वजनिक अपील के कुछ हफ्तों बाद आई। उन्होंने इसके लिए जोरदार पैरवी की थी। प्रोजेक्ट फाइनेंस पर पहले आए ड्राफ्ट में बैंकों को 5 प्रतिशत तक प्रावधान रखने की बात थी, लेकिन बैंकरों की शिकायतों पर RBI पीछे हट गया। पहले के अनुभवों से बैंक इसे सख्त मान रहा था, लेकिन अब इसमें नरमी आई।

कस्टमर पहले, सख्ती कम

इस साल RBI ने बड़े सुपरवाइजरी ऐक्शन से परहेज किया, जो पिछले गवर्नर शक्तिकांत दास के दौर से अलग था। तब बड़े बैंकों पर भी रोक-टोक लगाई जाती थी। मल्होत्रा का जोर ग्राहकों पर केंद्रित नीतियों और शिकायतों के तेज निपटारे पर रहा। उनकी कई स्पीचों में ये बात झलकी। नियमों को एक जगह जोड़ने का एक बड़ा काम किया गया, जिसके तहत मास्टर डायरेक्शन बनाए गए और पुराने, बेकार नियम हटा दिए गए।

हालांकि, टाटा संस की लिस्टिंग का सवाल अनसुलझा रहा। सितंबर 2025 की डेडलाइन गुजर गई, लेकिन क्या होगा, ये अभी स्पष्ट नहीं है। RBI ने इस साल अपनी 90वीं सालगिरह मनाई, लेकिन सबसे बड़ा headache रुपए का रहा। डॉलर के मुकाबले रुपया 90 के पार चला गया। बैंक ने पहले नौ महीनों में 38 अरब डॉलर से ज्यादा फॉरेक्स बेचा, ताकि उतार-चढ़ाव कम हो। गवर्नर ने साफ किया कि हस्तक्षेप किसी स्तर को बचाने के लिए नहीं, बल्कि बाजार को स्थिर रखने के लिए है।

अब आगे की चुनौतियां भी कम नहीं। फॉरेक्स रिजर्व 690 अरब डॉलर से ऊपर हैं और करंट अकाउंट डेफिसिट संभालने लायक, लेकिन रुपए की तेज हलचल से एक्सपर्ट कहते हैं कि ये मुद्दा 2026 में और मुश्किल बनेगा। ग्रोथ को तेज करने के लिए मौद्रिक और दूसरे तरीकों का इस्तेमाल देखने लायक होगा। मल्होत्रा मानते हैं कि महंगाई कम या संभालने लायक रहेगी और ब्याज दरें लंबे समय तक नीचे रहेंगी।

(PTI के इनपुट के साथ)

First Published - December 30, 2025 | 3:24 PM IST

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