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अतार्किक विकल्प: बैंक एफडी सही है! ऐसे अभियान की जरूरत

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एफडी और डेट फंड में मुख्य अंतर यह है कि डेट फंड से हुई कमाई पर कर तब लगता है, जब पैसा निकाला जाता है।

Last Updated- September 02, 2024 | 7:15 AM IST
Irrational Choice: Bank FD is correct! need for such a campaign बैंक एफडी सही है! ऐसे अभियान की जरूरत

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से साथ मिलकर विशेष अभियान चलाने को कहा ताकि जमा राशि जुटाई जा सके। इसकी वजह यह है कि जमा में वृद्धि की रफ्तार ऋण वृद्धि की तुलना में पीछे है। जुलाई के अंत में जमा राशि पिछले वर्ष जुलाई के मुकाबले 10.6 प्रतिशत बढ़ी मगर ऋण में 13.7 फीसदी वृद्धि हो गई। इससे भी बुरी खबर भारतीय रिजर्व बैंक ने दी, जब उसने बताया कि बैंकों के कम लागत वाले चालू एवं बचत खाते (कासा) इस वित्त वर्ष में घटकर कुल जमा राशियों के 39 प्रतिशत ही रह गए, जो पिछले वित्त वर्ष में 43 प्रतिशत थे।

बैंकरों से मुलाकात से करीब 10 दिन पहले ही वित्त मंत्री ने इशारा किया था कि बैंकरों को छोटी जमा राशि जुटाने पर ध्यान देना होगा क्योंकि ये धीरे-धीरे जमा होती हैं मगर बैंकिंग तंत्र की दाल-रोटी ये ही हैं। उस समय भी ऋण और जमा के बीच बढ़ते अंतर पर चिंता जताई गई थी।

सवाल यह भी है कि सकल घरेलू उत्पाद 7-8 प्रतिशत दर से बढ़ रहा है, कर के जरिये राजस्व संग्रह दो अंकों में बढ़ रहा है और सरकार बड़े पैमाने पर पूंजीगत वयय कर रही है, फिर भी बैंक जमा क्यों नहीं बढ़ रही है? ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि बचतकर्ता अपना पैसा बैंकों से निकालकर कहीं और निवेश कर रहे हैं। असल में ऐसा युवाओं के बीच सामान्य है क्योंकि वे म्युचुअल फंड और इक्विटी जैसी जोखिम वाली परिसंपत्तियां पसंद करते हैं। करीब 47 फीसदी सावधि जमाएं वरिष्ठ नागरिकों के नाम हैं।

रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी यही चिंता जताई, जब उन्होंने इशारा किया कि किस तरह वैकल्पिक निवेश के अवसर खुदरा ग्राहकों को ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘बैंक ऋण की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए अल्पकालिक गैर-खुदरा जमा और देनदारी वाली दूसरी योजनाओं का सहारा ले रहे हैं। इससे बैंकिंग तंत्र को नकदी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।’

कुछ रिपोर्ट बताती हैं कि परिवारों की कुल वित्तीय बचत में बैंक जमा की हिस्सेदारी लंबे समय तक औसतन 33 प्रतिशत रही, जो अब घटकर 29.4 प्रतिशत रह गई है। मगर म्युचुअल फंड की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से बढ़कर 6 प्रतिशत हो गई है। कुछ अन्य लोग मानते हैं कि यह भ्रामक बात है। सभी वित्तीय लेनदेन के केंद्र बैंक ही होते हैं। यदि धन बैंकिंग तंत्र से निकलकर म्युचुअल फंड में जाता है तो यह उन लोगों बैंक खातों में वापस भी आता है, जिनके शेयर म्युचुअल फंडों के जरिये खरीदे जाते हैं।

समाधान

मान लेते हैं कि सरकार कम जमा वृद्धि से चिंतित है तो इसकी खास वजह जरूर होगी। सवाल है कि इसके लिए अब क्या किया जा सकता है? बैंकरों को प्रोत्साहित करने के आम तौर पर खास नतीजे नहीं आते हैं। पिछले वित्त मंत्री यहां तक कि बेहद सख्त वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी सरकारी क्षेत्र के बैंकरों को अधिक उधार देने या लोगों को बैंक जमा के तौर पर बैंक खाते में अधिक पैसा रखने के लिए मनाने को प्रोत्साहित नहीं कर पाए। सरकारी बैंकों की अपनी मजबूरी हैं।

अच्छी बात यह है कि बैंक जमाओं को बढ़ाने के आसान तरीके भी हैं, जो डेट फंड की रकम बैंक जमाओं तक लाकर आसानी से किया जा सकता है। यह बदलाव आसान है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सरकार की कर नीतियों के कारण डेट फंड बैंक जमाओं की तुलना में आकर्षक नहीं रह गए। ऐसे में इस तरह की पहल के नतीजे महत्त्वपूर्ण होंगे।

अब 15.44 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश डेट म्युचुअल फंड में है। सही प्रोत्साहन मिले तो इसमें से 30-40 प्रतिशत रकम बैंक जमा खातों में आ सकती है। लेकिन ऐसा करने के लिए क्या किया जा सकता है? तीन काम: बचतकर्ताओं को प्रोत्साहन (सावधि जमा को कर के लिहाज से आकर्षक बनाना), ‘बैंक जमा सही है’ जैसा कोई मार्केटिंग अभियान और बैंकरों के प्रोत्साहन कम करना, जो निवेश सलाहकार के तौर पर बचतकर्ताओं को सावधि जमा (एफडी) में पैसा लगाने से रोकते हैं।

सीतारमण के कारण बैंक एफडी आज डेट फंड से बेहतर हैं। उनमें बराबर रिटर्न मिलता है मगर जोखिम को भी शामिल करें तो एफडी का रिटर्न बेहतर है। बाजार के हालात बदलने पर एफडी की ब्याज दर और मूलधन बदलते नहीं हैं। भारतीय बैंक जिन कायदों में बंधे हैं, उन्हें देखते हुए सुरक्षा के लिहाज से एफडी से बेहतर कुछ भी नहीं है क्योंकि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में मूलधन तो सुरक्षित रहता ही है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 2023 तक डेट म्युचुअल फंड कर के लिहाज से फायदेमंद थे, लेकिन सरकार ने 1 अप्रैल, 2023 को लंबी अवधि के डेट म्युचुअल फंडों का कर लाभ खत्म कर दिया। ऐसे में अब डेट फंड बैंक एफडी के बराबर ही हैं यानी इनके रिटर्न पर भी उतना ही कर लगता है, जैसा निवेशक की किसी अन्य आय पर लगता है। फिर भी 15 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डेट फंड में लगे हैं।

अच्छे विज्ञापन और प्रचार-प्रसार के जरिये यह रकम आसानी से एफडी या बैंक में आ सकती है मगर कुछ कर छूट मिल जाए तो काम और आसानी से हो जाएगा। एफडी और डेट फंड में मुख्य अंतर यह है कि डेट फंड से हुई कमाई पर कर तब लगता है, जब पैसा निकाला जाता है।

दूसरी ओर एफडी में ब्याज से होने वाली आमदनी पर हर साल कर वसूला जाता है। यह बात सही है कि डेट फंड से पूंजीगत लाभ मिलता है और एफडी से आमदनी होती है लेकिन इन दोनों में होड़ लगी है, इसलिए बैंक एफडी को खास श्रेणी में रखा जा सकता है, जिसमें अवधि पूरी होने के बाद ही ब्याज पर कर वसूला जाए। ऐसे एफडी से बचत करने वालों को ज्यादा ब्याज मिलेगा और जब वे निकासी करेंगे तो सरकार को भी कर के रूप में ज्यादा धन मिलेगा।

लेकिन एक समस्या भी है। बैंक किसी अन्य कंपनी की योजनाएं खासकर पारंपरिक बीमा पॉलिसी खूब बेचते हैं। हमें बहुत सारे मामले देखने को मिले हैं जहां एफडी पूरी होने पर बैंक कर्मचारी बचतकर्ता को पैसा दूसरी एफडी में लगाने के बजाय बीमा पॉलिसी में लगाने के लिए कहते हैं क्योंकि बीमा बेचने से उन्हें अच्छा कमीशन मिलता है।

सरकारी बैंक भी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए बीमा बेचने के लिए बड़े लक्ष्य रखते हैं। इसलिए अगर वित्त मंत्री चाहती हैं कि बैंकों का मुख्य कारोबार बढ़े तब उन्हें ऐसी बिक्री पर रोक लगानी होगी। ऐसा करने का यही सही समय है क्योंकि बैंक संगठनों के विरोध के बावजूद बीमा की गलत बिक्री लगभग दो दशकों से लगातार जारी है।

(लेखक मनीलाइफडॉटइन के संपादक और मनीलाइफ फाउंडेशन में ट्रस्टी हैं)

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First Published - September 2, 2024 | 7:15 AM IST

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