facebookmetapixel
Advertisement
भारत और UAE के बीच 6 ऐतिहासिक समझौते; अबू धाबी में PM मोदी की यात्रा के दौरान रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र पर बड़ा फैसलापश्चिम एशिया संकट का असर: चार साल में पहली बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, CNG भी हुई महंगीतेल की बढ़ती कीमतों और कमजोर रुपये से शेयर बाजार बेदम; सेंसेक्स-निफ्टी में साप्ताहिक गिरावटApple पर CCI कसेगा शिकंजा, वैश्विक टर्नओवर के बजाय अब भारत के राजस्व पर मांगा जवाबरिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया: ₹96.14 तक लुढ़का, क्या ₹100 प्रति डॉलर तक गिर जाएगा?IMD का पूर्वानुमान: केरल में जल्दी आएगा मॉनसून, लेकिन अल नीनो के कारण सामान्य से कम बारिश की आशंकानीट परीक्षा में बड़ा बदलाव: अगले साल से ऑनलाइन मोड में होगी परीक्षा, शिक्षा मंत्री ने किया ऐलानरक्षा क्षेत्र का नया हब बनेगा आंध्र प्रदेश, सत्य साईं जिले में रखी गई स्टेल्थ फाइटर जेट परियोजना की नींवभोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला, परिसर को बताया देवी सरस्वती का मंदिरनई दिल्ली में ब्रिक्स बैठक में पश्चिम एशिया संघर्ष पर नहीं बनी सहमति, बिना संयुक्त विज्ञप्ति के समाप्त हुई चर्चा

बैंकिंग बचाव के फौरी उपाय

Advertisement
Last Updated- March 13, 2023 | 9:49 PM IST
immediate measures for banking rescue

सिलिकन वैली बैंक (एसवीबी) के पतन का असर दुनिया भर में पड़ना लाजिमी है। ब्रिटेन में उसके संबद्ध बैंक का एचएसबीसी ने अ​धिग्रहण कर लिया, जापान का सॉफ्टबैंक विजन फंड पहले ही दबाव में है और उसका निवेश भी ज्यादा प्रभावित होगा, स्वीडन के पेंशन फंड को एक अरब डॉलर से अ​धिक का नुकसान हो चुका है।

परंतु एक बड़े वित्तीय संकट का तात्कालिक जो​खिम और बैंकिंग जगत में इसका व्यापक संक्रमण नहीं हो सका क्योंकि अमेरिका में बाजार नियामकों ने सप्ताहांत पर तेजी से कदम उठाए।

रविवार को यह घोषणा की गई कि जहां बैंक की अंशधारिता समाप्त की जाएगी, वहीं संघीय सरकार यह सुनि​श्चित करेगी कि किसी जमाकर्ता को आ​र्थिक नुकसान न हो। हालांकि अब इस कदम की लागत का विश्लेषण किया जाना चाहिए तथा साथ ही एसवीबी की नाकामी से मिले सबकों का भी परीक्षण किया जाना चाहिए।

अमेरिकी वित्त मंत्री जैनेट येलन को अच्छी तरह पता है कि एसवीबी के ग्राहकों को बचाने की राजनीतिक कीमत क्या होगी। उनमें से अ​धिकांश अच्छी फंडिंग वाले टेक और स्टार्टअप उद्योग से आते हैं और मतदाताओं के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं हैं। उन्होंने जोर देकर कहा है कि एसवीबी को उबारा नहीं जा रहा है और इस काम में करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

यह बात तकनीकी रूप से सही है कि बैंक और उसके प्रबंधन को नहीं उबारा जा रहा है। परंतु व्यापक स्तर पर देखें तो बैंकिंग क्षेत्र पर एक नया कर लगाया जा रहा है ताकि पहले बिना गारंटी के रह रहे जमाकर्ताओं को गारंटी दी जा सके। जहां तक उबारने के लिए दिए जाने वाले पैकेजों की बात है तो आम जनता को बैंकिंग सेवाओं की अधिक कीमत चुकानी होगी। इसके अलावा एक नैतिक समस्या भी उत्पन्न होती है।

यह स्पष्ट है कि एसवीबी का प्रबंधन सही ढंग से नहीं हो रहा था: बैंक के पास लंबी अव​धि के जो बॉन्ड थे उनकी कीमतों में गिरावट से बचाव के लिए उसने अ​धिक निवेश नहीं किया था, बैंक ने इस बात को ध्यान में नहीं रखा कि उसके जमाकर्ता एक ही उद्योग तक सीमित हैं और ऐसे में उस क्षेत्र में गिरावट आने पर सभी को पैसों की आवश्यकता हो सकती है। बैंक ने ऋण वृद्धि को लेकर अपेक्षा से अ​धिक सकारात्मक अनुमान लगा रखा था।

अमेरिकी नियामकों ने जो नए कदम उठाए हैं उनका भी सावधानीपूर्वक परीक्षण करने की आवश्यकता है। वर्ष 2018 में एसवीबी और अन्य छोटे बैंकों को संकट के बाद के बैंकिंग नियमन से राहत दी गई थी। परंतु अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व और वित्त विभाग ने पुरानी ​​स्थिति को बहाल नहीं किया है। इसके बजाय उन्होंने ब्याज दरों में इजाफे की तात्कालिक समस्या का हल किया है।

एक नई व्यवस्था शुरू की गई है जो रेहन के मूल्यांकन के हिसाब से ऋण देगी जिससे बैंकों का यह जो​खिम खत्म हो जाएगा कि उन्हें परिपक्वता के लिए रखे प्रपत्र को अचानक बाजार में पेश करना होगा। क्या बैंकों के लिए ब्याज दर के जो​खिम को समाप्त करना सही विचार है?

इसके अलावा क्या सभी जमाकर्ताओं को नियमन की मदद से सुर​क्षित किया जाना चाहिए? क्या बैंक इस ​स्थिति में बेहतर प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे? ये सवाल अहम हैं क्योंकि पहली बार दुनिया में सोशल मीडिया के दौर में दरों में इजाफा हो रहा है।

एसवीबी मामले की तरह अब ​अफवाहें मिनटों में फैल जाएंगी और बैंकों के लिए संभावनाएं सीमित हैं। उच्च दरों के कारण बैंकों को भी जो​खिम है और ऐसे में नए समय में नए नियमन जरूरत भी बन सकते हैं। परंतु पिछले दिनों जो मिलेजुले कदम उठाए गए क्या उन्हें अन्य जगह पर अपनाया जा सकता है या उन्हें स्थायी बनाया जा सकता है यह देखना होगा।

भारत समेत बैंकिंग नियामकों को और अ​धिक कदम उठाने होंगे। उसके बाद ही वै​श्विक वित्तीय क्षेत्र को जो​खिम से बचाव वाला ठहराया जा सकेगा।

Advertisement
First Published - March 13, 2023 | 9:49 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement