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Editorial: ऑपरेशन सिंदूर का असर, रक्षा बजट में बढ़ोतरी

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FY27 के लिए पूंजीगत व्यय को 2.2 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो कुछ हद तक पाकिस्तान के साथ चार दिन तक चली झड़प के कारण खर्च और बरबाद हुए साजोसामान की भरपाई के लिए है

Last Updated- February 04, 2026 | 10:28 PM IST
Defence Budget

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर की छाप इस वर्ष के रक्षा बजट पर देखी जा सकती है। 7.85 लाख करोड़ रुपये के साथ रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2 फीसदी तक पहुंच सकता है। यह पहले लगातार आ रही गिरावट के उलट है और इसके जरिये स्वीकार किया जा रहा है कि भारत को मजबूत प्रतिद्वंद्वी चीन और उसके पिछलग्गू पाकिस्तान के रूप में दो मोर्चों पर होने वाली संभावित जंग के लिए बेहतर ढंग से तैयार रहने की आवश्यकता है।

यह बात पूंजीगत व्यय आवंटन में अहम इजाफे से भी पता चलती है। इसके लिए कुल रक्षा बजट का 28 फीसदी हिस्सा आवंटित किया गया है, जो वित्त वर्ष 2022-23 के 25 फीसदी से ज्यादा है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पूंजीगत व्यय को 2.2 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो कुछ हद तक पाकिस्तान के साथ चार दिन तक चली झड़प के कारण खर्च और बरबाद हुए साजोसामान की भरपाई के लिए है।

इसके पीछे सेना प्रमुखों को मिले त्वरित आपात खरीद अधिकारों के बेहतर इस्तेमाल की कोशिश भी है ताकि वे परिचालन में आ रही कमियां दूर करने के लिए फौरन खरीद कर सकें। साथ ही वित्त वर्ष 27 में आधुनिकीकरण बजट में 24 फीसदी इजाफा किया गया है, जो पिछले कुछ वर्षों से हो रहे 10 फीसदी इजाफे से बहुत ज्यादा है। माना जा रहा है कि इसकी मदद से हवाई सुरक्षा और नौसेना की समुद्र के भीतर की क्षमताएं मजबूत होंगी तथा लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार भी विकसित कर लिए जाएंगे।

हमेशा की तरह असली परीक्षा यह है कि खर्च कितनी कुशलता के साथ किया जाता है क्योंकि वेतन और पेंशन पर अब भी कुल बजट आवंटन का आधे से अधिक खर्च हो जाता है तथा असली पूंजीगत व्यय संशोधित बजट अनुमान से भी कम रहता है। वेतन और पेंशन मद में कमी आना हौसला बढ़ाने वाला संकेत है। वित्त वर्ष 2019-20 में रक्षा बजट का 26 फीसदी हिस्सा पेंशन पर खर्च हो रहा था, जो अब घटकर 22 फीसदी रह जाने का अनुमान है।

वेतन पर खर्च तो और भी तेजी से घटा है। यह 2019-20 में 30 फीसदी था मगर 2026-27 में केवल 22.4 फीसदी माना जा रहा है। यह कमी जून 2022 में शुरू हुई अग्निपथ योजना के कारण भी हो सकती है मगर अभी यह स्पष्ट नहीं है कि रक्षा संरचना की लड़ाकू क्षमता पर इसका कितना असर हुआ है।

आधुनिकीकरण बजट का करीब 75 फीसदी हिस्सा आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत देश के भीतर स्रोतों से खरीद के लिए अलग रख दिया जाएगा। लेकिन इससे सवाल पैदा होता है कि देसी और निजी रक्षा विनिर्माण क्षेत्र कितनी आपूर्ति कर सकता है। बजट के बाद इस समाचार पत्र के साथ साक्षात्कार में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा कि वित्त वर्ष 2024-25 में जितनी कीमत की पूंजीगत खरीद की गई, उसका 87 फीसदी हिस्सा सरकारी कंपनियों के पास गया।

लेकिन तजुर्बा यही बताता है कि स्वदेशी विनिर्माता आपूर्ति करने में जो लंबा समय लेते हैं (तेजस एमके 1ए लड़ाकू विमान की आपूर्ति में देर इसका सबूत है) उसे सीमाओं पर बढ़ते खतरों से निपटने के लिए तेजी से घटाना होगा। आपूर्ति करने की अपनी क्षमता और तकनीकी दक्षता दिखाने का इससे अच्छा मौका देसी रक्षा विनिर्माताओं को कभी नहीं मिला है।

बड़ा सवाल यह है कि रक्षा बजट में इतने अधिक इजाफे के बाद भी सशस्त्र बलों की परिचालन दक्षता में आमूल-चूल बदलाव आएगा या नहीं। रक्षा सचिव ने कहा कि मंत्रालय अगले पांच वर्ष में रक्षा व्यय को बढ़कर जीडीपी के 2.5 फीसदी तक पहुंचते देखना चाहेगा। यह विचार गलत नहीं है मगर सेना द्वारा इस्तेमाल होने वाले विभिन्न प्लेटफॉर्मों को एक साथ लाने और वायुसेना स्क्वाड्रनों की संख्या को पूर्ण क्षमता तक पहुंचाने जैसे व्यावहारिक खर्चों पर ध्यान लगाना भी रक्षा बलों के लिए फायदेमंद होगा।

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First Published - February 4, 2026 | 10:25 PM IST

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