एक अमेरिकी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) कंपनी एंथ्रोपिक पर हाल ही में अमेरिकी सरकार ने दबाव डाला कि वह अपने नवीनतम मॉडल फेबल को गैर अमेरिकियों की पहुंच से बाहर रखे। अब भारत में कुछ लोग एक ‘संप्रभु’ एआई मॉडल की मांग कर रहे हैं। क्या भारत को खुद के लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) की आवश्यकता है? क्या सरकारी फंड इस काम के लिए आवंटित किए जाने चाहिए? हमें तो इसको लेकर शंका हैं, हम सोचते हैं कि ऐसे प्रस्ताव केवल औद्योगिक नीति हैं।
स्वाभाविक घबराहट समझ में आती है। कोई भी तकनीकी दौड़ से बाहर नहीं होना चाहता। लेकिन भारतीय ज्ञान और वैश्विक अग्रिम मोर्चे के बीच का अंतर कोई नई बात नहीं है। ज्ञान के अधिकांश महान पड़ाव मसलन ट्रांजिस्टर, इंटरनेट या यूनिक्स कोई भी भारत में आविष्कृत नहीं हुए। भारतीय तेजस विमान अमेरिकी जेट इंजन का उपयोग करता है। सार्वजनिक धन के निवेश से भारत में सेमीकंडक्टर पर कुछ निम्न-स्तरीय हार्डवेयर कार्य शुरू हुआ है जिसके परिणामस्वरूप वही सामान्य औद्योगिक नीति वाला नतीजा आने की उम्मीद है।
भारतीय कंपनियां सूचना-प्रौद्योगिकी सेवाओं यानी आईटी में विश्वस्तरीय हैं। लेकिन भारतीय आईटी सेवाओं को लार्ज लैंग्वेज मॉडल में निवेश न करने के लिए दोष देना वैसा ही है जैसे इंडिगो को जेट इंजन न बनाने के लिए फटकारना। भारतीय आईटी सेवा कंपनियों ने पश्चिम में बनी तकनीक का उपयोग करके विश्व भर के ग्राहकों की सेवा करने के लिए 10 लाख से अधिक भारतीयों को प्रशिक्षित किया है।
उन्होंने यह सब वैश्विक ज्ञान के शीर्ष पर हुए बिना ही किया। भारतीय सेवाओं के महान निर्यात चमत्कार के हर चरण में यह खतरा था कि राष्ट्रवादी या औद्योगिक नीति के तहत संप्रभु केंद्रीय प्रोसेसिंग यूनिट, संप्रभु ऑपरेटिंग सिस्टम या संप्रभु हार्ड डिस्क की मांग उठे। उस अवधि में भारतीय नीति-निर्माताओं ने वैश्वीकरण को सही ढंग से अपनाया। भारतीय आईटी सेवा कंपनियों ने पश्चिमी तकनीक आयात की, सॉफ्टवेयर और सेवाएं निर्यात कीं और भारत के लिए एक आर्थिक चमत्कार उत्पन्न किया।
विदेशी निर्यात नियंत्रण भी कोई नई बात नहीं है। अमेरिका ने 1980 के दशक के अंत में मौसम पूर्वानुमान के लिए क्रे सुपरकंप्यूटर की बिक्री रोक दी थी। 1990 के दशक में उन्होंने मजबूत एन्क्रिप्शन को हथियार माना और पीजीपी (प्रिटी गुड प्राइवेसी) के लेखक पर आपराधिक जांच शुरू की। 1999 में उन्होंने वाणिज्यिक संचार उपग्रहों को शस्त्र के रूप में पुनर्वर्गीकृत किया। यही तंत्र अब चीन को उन्नत ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) की बिक्री पर सीमा लगाता है (जिसके लिए भारत में हमें आभारी होना चाहिए)। इनमें से किसी ने भी भारत में उच्च आर्थिक वृद्धि प्राप्त करने के हमारे उद्देश्य में हस्तक्षेप नहीं किया।
एलएलएम के साथ नई बात यह है कि नवीन तकनीक तक पहुंच सामान्य नागरिकों के हाथों में आ गई है। लाखों लोगों को नवीनतम तकनीक तक लगभग तुरंत ही अपने वैश्विक समकक्षों के साथ पहुंच मिल रही है। यह रोमांचक लगता है। वैश्विक ग्राहकों की तलाश में निजी वित्तपोषित एआई क्रांति ने उत्साही लोगों की नई पीढ़ी को जन्म दिया है। इससे इस क्षेत्र में पहले की तुलना में अधिक शोर पैदा हुआ है जितना कि अमेरिका के सीएनसी (कंप्यूटर न्यूमेरिकल नियंत्रित) लेथ मशीनों पर निर्यात नियंत्रण के मामले में भी नहीं हुआ था।
भारतीय कंपनियों को सबसे उन्नत मॉडल तक पहुंच न होने का नुकसान नहीं होगा। ये मॉडल महंगे हैं। कुछ ही घंटों में हजारों डॉलर के टोकन खर्च कर देते हैं। हममें से एक ‘द प्रोफेसर’ बना रहा है जहां एलएलएम का उपयोग मुकदमेबाजी के विश्लेषण के लिए किया जाता है जिसमें लाखों भारतीय न्यायालयी आदेशों को संसाधित करना पड़ता है। इस पैमाने पर लागत दक्षता आवश्यक है जिसके लिए पुराने मॉडल, ओपन-सोर्स मॉडल आदि का उपयोग किया जाता है। चाहे हम विदेशी ग्राहकों की सेवा करने के बारे में सोचें या भारत में निर्माण करने के बारे में, नवीनतम मॉडल बाधा नहीं हैं।
संप्रभु एआई के पक्ष में दिया जाने वाला रक्षा संबंधी तर्क कमजोर है। हम अपने अधिकांश रक्षा उपकरण खरीदते हैं। यह कहना संभव है कि हम ऐसा सैन्य ड्रोन चाहते हैं जिसका प्रत्येक घटक भारत में बना हो। इसकी लागत बहुत अधिक होगी और ऐसे सैन्य ड्रोन के चीनी प्रतिद्वंद्वियों से हारने का जोखिम बहुत अधिक होगा। ज्यादा समझदारी इसी में है कि हम अपने सहयोगियों यानी यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान के साथ सहयोग करें, जिनका उद्देश्य भी वही है। यानी ऐसे सैन्य ड्रोन बनाना जो चीनी आपूर्ति श्रृंखला से पूरी तरह सुरक्षित हों। हम एआई की जगह, भारतीय हित को समझौते, सौदेबाजी और गठबंधनों के उपकरणों के माध्यम से बेहतर ढंग से आगे बढ़ाते हैं।
एआई के क्षेत्र में अमेरिका की जीत संप्रभु एआई के संकेत से नहीं हुई है। संप्रभु एआई शब्द का उपयोग केवल वे लोग करते हैं जो एआई नवाचार नहीं करते। अमेरिका की महानता इस बात में है कि एंथ्रोपिक, गूगल और ओपनएआई केवल निजी कंपनियां हैं जिन्होंने अपनी क्षमता पर नवाचार किया और जिन्हें दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय प्रणाली का समर्थन मिला। ये तीन कंपनियां उस दौड़ में विजेता बनकर उभरीं जिसमें 1,000 कंपनियों ने प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश की और उनमें से 997 असफल रहीं। अमेरिका में जो काम आया वह वित्तीय प्रणाली और नवाचार प्रणाली थी न कि संप्रभु एआई।
औद्योगिक नीति ऐसी तलाश की प्रक्रिया में शामिल होने में सक्षम नहीं है। यह कभी भी निजी व्यक्तियों की ऊर्जा और जोखिम उठाने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर पाएगी। भारत में राज्य की कमजोर क्षमता के कारण यह जबरन और वित्तीय निवेशों को खराब परिणामों में बदल देगी और घरेलू राजनीतिक अर्थव्यवस्था द्वारा हाइजैक कर ली जाएगी। और भारतीय राज्य के छोटे संसाधन आवरण के कारण यह अप्रासंगिक भी है।
तो फिर भारत को एआई के क्षेत्र में क्या करना चाहिए? हम एक राष्ट्रीय एआई नेतृत्व नीति का सुझाव देते हैं, जिसमें चार तत्व शामिल हों:
(साथ में सिद्धार्थ रामन)
(लेखक क्रमश: एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता और द प्रोफेसर में मुख्य तकनीकी अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं)