भारत में अपना घर या जमीन खरीदना किसी भी आम इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा सपना होता है। आम तौर पर लोग सोचते हैं कि सब-रजिस्ट्रार के दफ्तर जाकर सरकारी फीस चुका दी और रजिस्ट्री हाथ में आ गई, तो काम पूरा हो गया। लेकिन रियल एस्टेट की दुनिया में यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। दरअसल, प्रॉपर्टी खरीदने की कानूनी प्रक्रिया दो अलग-अलग हिस्सों में बंटी है। रजिस्ट्री कराना सिर्फ आधी जंग जीतने जैसा है, जब तक आप उसका म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज नहीं करा लेते, तब तक आपकी प्रॉपर्टी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।
प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री और म्यूटेशन के बीच के अंतर को दिल्ली बार काउंसिल के एडवोकेट समर्थ लूथरा बहुत आसान शब्दों में स्पष्ट करते हैं।
समर्थ कहते हैं, “प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन दोनों अलग-अलग सरकारी उद्देश्यों को पूरा करते हैं। रजिस्ट्रेशन वह कानूनी रिकॉर्ड है, जिसके जरिए संपत्ति के अधिकार कागजों पर एक व्यक्ति से दूसरे को ट्रांसफर किए जाते हैं (जैसे सेल डीड या गिफ्ट डीड)। वहीं दूसरी तरफ, म्यूटेशन का सीधा मतलब ट्रांसफर के बाद नगर निगम या राजस्व (Revenue) रिकॉर्ड को अपडेट करना होता है, ताकि सरकारी कागजों में नए मालिक का नाम प्रॉपर्टी टैक्स और अन्य प्रशासनिक कामों के लिए दर्ज किया जा सके।”
इसी बात को और व्यावहारिक ढंग से समझाते हुए रियल एस्टेट एडवाइजरी फर्म ‘SILA’ के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अंकित माहेश्वरी कहते हैं कि भारत में संपत्ति की खरीद दो अलग-अलग सरकारी विभागों द्वारा संभाली जाती है, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग काम करते हैं।
माहेश्वरी के मुताबिक, किसी प्रॉपर्टी का असली मालिकाना हक रजिस्ट्रेशन के जरिए ट्रांसफर होता है। यह प्रक्रिया रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 के तहत सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में पूरी की जाती है। वहीं, म्यूटेशन सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया है, जिसे नगर निगम या राजस्व विभाग (जैसे तहसीलदार या पटवारी) करता है। इसका मकसद सिर्फ यह तय करना होता है कि प्रॉपर्टी टैक्स किस व्यक्ति से वसूला जाएगा। म्यूटेशन से न तो किसी को मालिकाना हक मिलता है और न ही किसी का मालिकाना हक खत्म होता है।
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अक्सर लोग प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री कराने के बाद म्यूटेशन करवाना भूल जाते हैं या इसे बाद के लिए टाल देते हैं। लेकिन लूथरा के मुताबिक, यह गलती आगे चलकर कानूनी और आर्थिक परेशानी की वजह बन सकती है। अगर म्यूटेशन नहीं कराया गया, तो सरकारी रिकॉर्ड में पुराने मालिक का नाम ही दर्ज रहेगा। इससे प्रॉपर्टी टैक्स जमा करने, सरकारी नोटिस मिलने, बिजली-पानी का नया कनेक्शन लेने, बिल्डिंग परमिशन हासिल करने और बैंक से लोन लेने जैसी कई जरूरी प्रक्रियाओं में दिक्कत आ सकती है।
मामला सिर्फ सरकारी कामकाज में देरी का नहीं है, बल्कि इससे आपकी प्रॉपर्टी भी मुश्किल में पड़ सकती है। माहेश्वरी के मुताबिक, अगर सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (खाता) में अब भी पुराने मालिक का नाम दर्ज है, तो कोई बेईमान विक्रेता उसी संपत्ति को किसी और को बेचने या उसके नाम पर लोन लेने की कोशिश कर सकता है। ऐसे मामलों में अदालत में आपकी रजिस्ट्री ही सबसे मजबूत सबूत होगी, लेकिन एक छोटी सी लापरवाही आपको वर्षों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई में जरूर फंसा सकती है।
माहेश्वरी आगे कहते हैं, “अगर रजिस्ट्री और म्यूटेशन के रिकॉर्ड में नाम अलग-अलग हैं, तो कई बैंक ऐसे मामलों में होम लोन देने से मना कर सकते हैं। वहीं, अगर भविष्य में वह जमीन किसी सरकारी परियोजना, जैसे हाईवे या मेट्रो के लिए खरीदी जाती है, तो मुआवजे की रकम मिलने में भी सरकारी रिकॉर्ड की वजह से देरी और दूसरी प्रशासनिक परेशानियां आ सकती हैं।”
इस पूरे मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत का नजरिया भी बेहद साफ रहा है। एडवोकेट समर्थ लूथरा बताते हैं कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में कह चुका है कि म्यूटेशन रिकॉर्ड से किसी संपत्ति का मालिकाना हक न बनता है और न ही खत्म होता है। यह सिर्फ प्रशासनिक और राजस्व रिकॉर्ड को अपडेट करने की प्रक्रिया है। किसी भी प्रॉपर्टी का असली मालिकाना हक सिर्फ वैध टाइटल डॉक्यूमेंट्स, जैसे रजिस्टर्ड सेल डीड या वसीयत जैसे कानूनी दस्तावेजों से ही तय होता है।
अंकित माहेश्वरी इस पूरे फर्क को एक आसान उदाहरण से समझाते हैं। उनके मुताबिक, प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री कराना वैसा ही है जैसे सेकंड-हैंड गाड़ी खरीदकर उसका बिल लेना और चाबी अपने हाथ में लेना, यानी गाड़ी अब आपकी हो गई। वहीं, म्यूटेशन कराना उसी तरह है जैसे RTO में जाकर गाड़ी का रिकॉर्ड अपने नाम पर ट्रांसफर कराना। अगर यह रिकॉर्ड अपडेट नहीं कराया जाता, तो गाड़ी आपकी होने के बावजूद टैक्स, चालान और सरकारी नोटिस पुराने मालिक के नाम पर ही जाते रहेंगे। इसी तरह, भविष्य में गाड़ी बेचने में भी दिक्कत आ सकती है। यही बात प्रॉपर्टी के म्यूटेशन पर भी लागू होती है।
संपत्ति का दाखिल-खारिज कराने के लिए स्थानीय नियमों का पालन करना होता है। लूथरा के मुताबिक, प्रॉपर्टी का म्यूटेशन कराने के लिए स्थानीय नियमों के अनुसार नगर निगम, तहसीलदार या हाउसिंग सोसाइटी में आवेदन करना होता है। इसके लिए रजिस्टर्ड सेल डीड (रजिस्ट्री की कॉपी), पहचान पत्र, प्रॉपर्टी टैक्स की नई रसीद और पुराने मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं। अगर किसी तरह का विवाद या आपत्ति नहीं होती, तो आमतौर पर यह प्रक्रिया कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों के भीतर पूरी हो जाती है।
जबकि माहेश्वरी की सलाह है कि प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री होने के 30 से 90 दिनों के भीतर राज्य के ऑनलाइन राजस्व पोर्टल या स्थानीय नागरिक केंद्र पर म्यूटेशन के लिए आवेदन कर देना चाहिए। अगर किसी तरह का विवाद नहीं है, तो आमतौर पर 30 से 60 दिनों में सरकारी रिकॉर्ड अपडेट हो जाता है।
वह यह भी कहते हैं कि प्रॉपर्टी खरीदने से पहले कम से कम 13 से 30 साल पुराने टाइटल चेन की जांच जरूर करें। ऐसा इसलिए क्योंकि लिमिटेशन एक्ट, 1963 के तहत निजी संपत्तियों और सरकारी दावों के लिए अलग-अलग समय-सीमाएं लागू होती हैं। इसके अलावा, खरीददारों को एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (Encumbrance Certificate) भी जरूर निकलवाना चाहिए, ताकि यह तय हो सके कि प्रॉपर्टी पर पहले से कोई कर्ज या कानूनी बोझ नहीं है।