डॉनल्ड ट्रंप के नए कार्यकाल को अक्सर अमेरिकी राष्ट्रपति का ऐसा दौर माना जाता है, जहां दुनिया भर में बेचैनी बढ़ी है, तमाम देश शुल्क की बढ़ी दरों, धमकियों और अजीब सी अनिश्चितता से परेशान हैं। लेकिन भारत की बात करें तो वह अमेरिका के शुल्क के हथियारों की धार कुंद करने में काफी हद तक कामयाब रहा है। इसने जवाबी कार्रवाई नहीं की, मजबूत आर्थिक वृद्धि बनाए रखी और अमेरिका से आ रहे उकसावों के जवाब में खीझ दिलाने वाल मौन धारण कर जानबूझकर संयमित रुख बना रखा।
पलटकर देखें तो यह रणनीति कारगर साबित हुई। अमेरिका और भारत के बीच असमान आर्थिक संबंधों के बावजूद अमेरिका इस व्यापार समझौते के लिए भारत से ज्यादा उत्सुक नजर आ रहा था। यह भी सच है कि लंबे समय तक समझौता नहीं हो पाने की कीमत भी चुकानी पड़ी। भारत को इसका स्पष्ट आर्थिक नुकसान हुआ और उन क्षेत्रों में ज्यादा हुआ जो अमेरिका को निर्यात पर ज्यादा निर्भर थे।
भावनाओं को परे रख दें तो इस व्यापार समझौते का आर्थिक महत्त्व निर्विवाद है क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और तेजी से बढ़ती चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के बीच हो रहा है। कर की नई 18 प्रतिशत दर से दोनों देशों के बीच महत्त्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है और वस्त्र, वाहन कलपुर्जे, रत्न एवं आभूषण तथा द्विपक्षीय व्यापार के अन्य प्रमुख क्षेत्रों को एक बार फिर ऊर्जा मिल सकती है। मगर भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक महत्त्व और भी ज्यादा है।
द्विपक्षीय स्तर पर देखें तो यह समझौता भारत-अमेरिका संबंधों के एक काफी अप्रिय दौर को समाप्त करने वाला है। इस अप्रिय दौर में ट्रंप का अड़ियलपन राजनीतिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में फैल गया था। यह समझौता राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है, जो भारत के नजरिये से खास तौर पर स्वागत योग्य है क्योंकि अमेरिका ने भी अचानक क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर अपना रुख बदला है। जब भारत और अमेरिका व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे, तब वैश्विक घटनाक्रम तेजी से बदला और बार-बार ऐसा लगा कि ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकता कुछ और हैं।
कम से कम बातों से लगा कि अमेरिका में राजनीतिक बदलाव हुआ, जो भारत के विरुद्ध था। पहली थी ऐसे रिश्ते में खुलकर व्यापारीवादी नजरिया अपनाना, जो इस नजरिये से नहीं बना था। इस बात ने भारत को चौंका दिया और उसे अपनी नीतियां नए सिरे से तय करनी पड़ीं। अमेरिका के 25 प्रतिशत जवाबी शुल्क को सभी ने बहुत ज्यादा माना और भारत को रियायतें देने के लिए मजबूर करने की कोशिश भी माना। दूसरी बात रूसी तेल खरीदने के एवज में भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क और लगाना था। यह वाकई सख्त कदम था क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत का कोई प्रत्यक्ष हित नहीं था, लेकिन उसे बीच में रखकर रूस पर दबाव बढ़ाने का प्रयास किया गया।
तीसरी बात, भारत के पड़ोस में अमेरिका की नीतियां पहले के रुख से अलग होने लगीं, जो खास तौर पर पाकिस्तान के साथ अमेरिका के सहयोग में नजर आया। सच कहें तो अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में घनिष्ठता जरूर नजर आई मगर इससे भारतीय हितों को कोई ठोस नुकसान नहीं हुआ। मोटे तौर पर यह बदलाव अमेरिका के आर्थिक हितों और क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति से प्रेरित लगा।
अंतिम बात, व्यापार गतिरोध से अमेरिका में भारत-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा मिला, जो कभी-कभी वहां बढ़ती रूढ़िवादी और स्वदेशी लहर को हवा दी। ऐसी स्थिति में व्यापार समझौते की घोषणा और 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का महत्त्वाकांक्षी वादा अहम मोड़ है चाहे इसके लिए कोई मियाद तय क्यों नहीं की गई हो। यह समझौता दोनों देशों के रिश्तों के उन पहलुओं को सक्रिय कर सकता है, जो अभी तक हाशिये पर थे।
उदाहरण के लिए लंबे समय से अटकी क्वाड बैठक को अब नई राजनीतिक वैधता मिल गई है, जिसे व्यापार समझौते के बगैर बनाए रखना मुश्किल होता। भारत की अध्यक्षता में होने वाली क्वाड बैठक हिंद-प्रशांत रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन के लिए आवश्यक आधार भी प्रदान करेगी। ट्रंप प्रशासन के रणनीतिक दस्तावेजों – राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और राष्ट्रीय रक्षा रणनीति – में पहले ही हिंद प्रशांत के लिए प्रतिबद्धता दिखती थी मगर शर्त थी कि क्षेत्रीय साझेदारों को अधिक बोझ उठाना होगा। हालांकि बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भारत हिंद-प्रशांत के लिए अपनी प्रतिबद्धता किस तरह आगे ले जाना चाहता है मगर अमेरिका से समर्थन इसे मजबूत आधार प्रदान कर सकता है।
भारत-अमेरिका संबंधों में निरंतरता बनाए रखना लाभकारी साबित हुआ है। इस घटनाक्रम से तीन स्पष्ट बातें सामने आती हैं। पहली, भारत और अमेरिका अपने संबंधों के एक नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं, जिसमें गहरे तक बैठी असमानता की जगह धीरे-धीरे ज्यादा समानता ले रही है। दूसरी, शुल्क प्रकरण ने भारत को भरोसे का पुनर्मूल्यांकन करने और देश के भीतर आर्थिक एवं श्रम सुधारों के साथ बाहर विविध पक्षों के साथ साझेदारी के जरिये संतुलन की रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया। अंत में, व्यापार समझौता भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर जैसा है मगर कुछ चुनौतियां भी हैं। इनमें सबसे प्रमुख है महाशक्तियों विशेषकर चीन और रूस के साथ पेचीदा संबंधों को संभालना। बहुत कुछ इस बात से तय होगा कि इनके साथ अमेरिका के द्विपक्षीय संबंध क्या शक्ल लेते हैं।
भारत और अमेरिका के लिए सबसे बड़ी साझा चुनौती शायद यह होगी कि व्यापार गतिरोध के दौरान पनपी नकारात्मक धारणाओं को कैसे खत्म किया जाए। यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो इस प्रकरण को द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी दरार के बजाय संक्षिप्त मोड़ के रूप में याद किया जाएगा। किंतु भारत के लिए स्थायी परीक्षा यह होगी कि वह बाहरी असर के बगैर स्वतंत्र रिश्तों को कैसा निभाता है। रूस-यूक्रेन संघर्ष में यह स्पष्ट रूप से दिख चुका है।
(पंत ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में वाइस-प्रेसिडेंट और मिश्रा फेलो (अमेरिका) हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)