आने वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक से पहले तस्वीर काफी हद तक साफ होती दिख रही है। नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस बार ब्याज दरों में कोई नया बदलाव नहीं करेगा। पहले ही 1.25 फीसदी की कटौती के बाद रेपो रेट 5.25 फीसदी पर आ चुका है और अब केंद्रीय बैंक कुछ समय के लिए रुककर हालात को परखना चाहता है।
RBI ने दरें तो घटाईं, लेकिन उसका पूरा फायदा अभी तक बाजार और कर्जदारों तक नहीं पहुंच पाया है। बैंकों के लोन रेट्स में कटौती की प्रक्रिया जारी है, इसके बावजूद 10 साल के सरकारी बॉन्ड की ब्याज दरों में कोई खास कमी नहीं आई है। यही नहीं, कमर्शियल पेपर और सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट की दरें भी चढ़ी हुई हैं। ऐसे में RBI अब ब्याज दरों से ज्यादा नकदी के फ्लो पर नजर टिकाए हुए है।
बैंकिंग सिस्टम में हालात तंग हैं। नुवामा की रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच महीनों से सिस्टम में नकदी 1 फीसदी से नीचे बनी हुई है और जनवरी में यह घटकर सिर्फ 0.2 फीसदी रह गई। रुपये पर दबाव और डॉलर को संभालने के लिए RBI के हस्तक्षेप ने ओपन मार्केट ऑपरेशंस के असर को भी कमजोर किया है। नकदी की यह तंगी RBI के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था निचले स्तर से धीरे-धीरे ऊपर आ रही है। कर्ज की मांग बढ़ रही है और GST व इनकम टैक्स कटौती से खपत को कुछ सहारा मिला है। लेकिन यह सुधार हर जगह नहीं दिख रहा। सरकार का पूंजीगत खर्च अब धीमा पड़ता नजर आ रहा है, जबकि घरों की आमदनी और बड़ी कंपनियों के मुनाफे अभी भी दबाव में हैं।
स्टील की खपत और कोर इंडस्ट्रियल ग्रोथ जैसे अहम संकेतक अभी भी सुस्ती की कहानी कह रहे हैं। भले ही वित्त वर्ष 2027 में नॉमिनल GDP ग्रोथ 10 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद हो, लेकिन फिलहाल मांग में वह मजबूती नहीं दिख रही, जो तेज रिकवरी का भरोसा दे सके।
दुनिया के बाजारों में अनिश्चितता अब भी छाई हुई है। भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक सुस्ती के चलते बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ा हुआ है। ऐसे माहौल में RBI कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता और हर कदम फूंक-फूंक कर रखने के मूड में है।
नुवामा के मुताबिक, भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौता विदेशी निवेश को सहारा दे सकता है और रुपये को मजबूती मिल सकती है। इससे RBI को घरेलू नकदी संभालने में कुछ राहत मिलेगी और केंद्रीय बैंक को आगे की चाल चलने के लिए थोड़ा वक्त मिल जाएगा।
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है- RBI फिलहाल दरें घटाने की दौड़ से बाहर है। अब उसकी नजरें लिक्विडिटी, ट्रांसमिशन और मांग के संकेतों पर टिकी हैं। जब तक अर्थव्यवस्था की रिकवरी मजबूत और व्यापक नहीं हो जाती, तब तक केंद्रीय बैंक की नीति इंतजार और निगरानी की ही रहने वाली है।