India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापार वार्ता आखिरकार सफल हो गई है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत अमेरिका ने भारत से आने वाले सामानों पर लगने वाले टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया। इस फैसले के बाद देश के कारोबारी समाज को बड़ी राहत मिली है। अगस्त में जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ को बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया था तो उसके बाद भारतीय निर्यातकों को बड़ा झटका लगा। सिंतबर से ही अमेरिका को होने वाले निर्यात में गिरावट आने लगी। हालांकि, भारतीय निर्यातक चुप नहीं बैठे और जल्दी ही नए बाजारों में अपना सामान बढ़ाना शुरू कर दिया। UAE, यूरोप और एशिया के बाजारों में भारत का निर्यात बढ़ा, जिससे कुल निर्यात में मजबूती बनी रही।
हालांकि, नवंबर में हालात सुधरे और कुल निर्यात में 19 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। खासकर अमेरिका को होने वाले निर्यात में 22 फीसदी का उछाल आया, जो मुख्य रूप से उन उत्पादों से आया जो पारस्परिक टैरिफ से बाहर थे।
बता दें कि USTR के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में भारत और अमेरिका के बीच वस्तुओं (goods) का कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 128.9 अरब डॉलर रहा। इस अवधि के दौरान, अमेरिका ने भारत से 87.3 अरब डॉलर का माल आयात किया, जो 2023 की तुलना में 4.5% अधिक है। साथ ही, भारत को अमेरिकी निर्यात 41.5 अरब डॉलर था। इस तरह अमेरिका के लिए 45.8 अरब डॉलर का व्यापार घाटा रहा।
ट्रेड डील फाइनल होने को लेकर ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्र्रूथ पर लिखा, “आज सुबह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करना मेरे लिए सम्मान की बात थी। हमने रूस-यूक्रेन युद्ध सहित कई मुद्दों पर बातचीत की। प्रधानमंत्री मोदी ने रूस से तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताई। भारत अब अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा। इसके अलावा वेनेजुएला से तेल खरीदने की संभावना पर भी बात हुई। इससे यूक्रेन में चल रहा युद्ध खत्म करने में मदद मिलेगी, जहां हर हफ्ते हजारों लोगों की जान जा रही है।”
उन्होंने आगे लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी की दोस्ती, सम्मान और उनके अनुरोध पर, हमने अमेरिका और भारत के बीच तुरंत एक ट्रेड डील पर सहमति बनाई है। इसके तहत अमेरिका भारत पर लगाया जाने वाला रेसिप्रोकल टैरिफ 25% से घटाकर 18% करेगा। वहीं भारत भी अमेरिका के खिलाफ अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ मुश्किलों को घटाकर जीरो करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। PM मोदी ने ‘बाय अमेरिकन’ को लेकर भी बड़ी प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर से ज्यादा के ऊर्जा, तकनीक, कृषि, कोयला और अन्य उत्पाद खरीदेगा। मुझे पूरा भरोसा है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे और भी मजबूत होंगे।”
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर ट्रंप को धन्यवाद कहा। उन्होंने लिखा, “आज प्रिय मित्र, राष्ट्रपति ट्रंप से बात करके बहुत खुशी हुई। बहुत अच्छा लगा कि अब ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर टैरिफ घटकर 18% हो जाएगा। इस शानदार घोषणा के लिए 1.4 अरब भारतीयों की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप का बहुत धन्यवाद। जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र एक साथ काम करती हैं, तो इसका फायदा सीधे हमारे लोगों को मिलता है और दोनों देशों के लिए नए अवसर खुलते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप का नेतृत्व वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए बेहद जरूरी है। भारत उनके शांति प्रयासों का पूरा समर्थन करता है। मैं उनके साथ मिलकर हमारी साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए काम करने का इंतजार कर रहा हूं।’
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यह समझौता ऐसे समय में हुआ जब भारतीय निर्यातक पहले से ही दबाव में थे। अमेरिकी टैरिफ ने कई सेक्टरों को प्रभावित किया। हालांकि, भारतीय कारोबारियों ने जल्दी ही नए बाजार तलाश लिए।
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि सितंबर में अमेरिका को होने वाले निर्यात में गिरावट आई, लेकिन कुल निर्यात में ज्यादा असर नहीं पड़ा, क्योंकि अन्य देशों ने इसकी कमी पूरी की। इस दौरान कई रुके हुए व्यापार समझौतों को फिर से शुरू किया गया। भारत ने यूरोपिय यूनियन, ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ नए व्यापार समझौते पूरे किए। ये समझौते पहले ठंडे बस्ते में डाल दिए गए थे, लेकिन टैरिफ के दबाव ने इन्हें तेजी से आगे बढ़ाया।
इसके अलावा, कनाडा और इजरायल के साथ व्यापार वार्ता फिर से शुरू हो गई है। कनाडा के साथ राजनीतिक तनाव की वजह से बातचीत रुक गई थी, जबकि इजरायल के साथ 2022 में रुकी वार्ता में भारतीय पक्ष को ज्यादा फायदा नजर नहीं आ रहा था। अब भारत इजराइल के साथ एक विशेष व्यापार समझौते पर विचार कर रहा है।
अगस्त के आखिर में लागू हुए 50 फीसदी टैरिफ का पहला असर सितंबर में दिखा। भारतीय सामानों को अमेरिकी बाजार में मुश्किल हुई, लेकिन निर्यातक चुप नहीं बैठे। उन्होंने जल्दी ही दूसरे बाजारों में अपना सामान बढ़ाना शुरू कर दिया। वाणिज्य मंत्रालय के डेटा से साफ है कि सितंबर में अमेरिका को रत्न और आभूषणों का निर्यात पिछले साल के मुकाबले 76 फीसदी गिर गया, लेकिन कुल रत्न और आभूषण निर्यात में सिर्फ 1.5 फीसदी की मामूली गिरावट आई। इसका कारण था संयुक्त अरब अमीरात को होने वाला निर्यात 79 फीसदी बढ़ना, हांगकांग को 11 फीसदी और बेल्जियम को 8 फीसदी की बढ़ोतरी।
इसी तरह, ऑटो पार्ट्स के सेक्टर में अमेरिका को निर्यात 12 फीसदी गिरा, लेकिन जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात और थाईलैंड जैसे देशों ने मदद की और कुल ऑटो पार्ट्स निर्यात 8 फीसदी बढ़ गया।
समुद्री उत्पादों का निर्यात भी मजबूत रहा। सितंबर में यह 23 फीसदी और अक्टूबर में 11 फीसदी बढ़ा। चीन को निर्यात लगभग 60 फीसदी, जापान को 37 फीसदी, थाईलैंड को 70 फीसदी और यूरोपीय संघ को बढ़े हुए निर्यात ने यह कमाल किया।
CITI के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई-सितंबर 2025 की तुलना में अक्टूबर-दिसंबर 2025 के दौरान उनके टैक्सटाइल उद्योग के निर्यात में लगभग 50 फीसदी से अधिक की गिरावट आई।
इन आंकड़ों से लगता है कि भारतीय निर्यातकों टैरिफ के दबाव के चलते अमेरिका को निर्यात कम करना पड़ा, लेकिन दूसरे बाजारों से उन्हें थोड़ा सपोर्ट मिला। लेकिन नवंबर में अमेरिका को निर्यात 22 फीसदी बढ़ने से साफ है कि कुछ उत्पादों पर टैरिफ का असर कम था, और कारोबारी उन पर फोकस कर रहे थे।
टैरिफ के असर से बचने के लिए भारतीय निर्यातकों ने विविधीकरण पर जोर दिया। अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए उन्होंने एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बाजारों को टारगेट किया। न्यूज वेबसाइट इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, SBI की नवंबर में जारी इकोरैप रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के निर्यात ने वैकल्पिक बाजार तलाश लिए हैं, जो लंबे समय में अमेरिकी टैरिफ के असर को झेलने में मदद करेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर तक भारत के कुल माल निर्यात में 2.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, और अमेरिका को निर्यात 13 फीसदी बढ़ा। हालांकि, इसमें कुछ अग्रिम लोडिंग का प्रभाव हो सकता है, क्योंकि सितंबर में अमेरिका को निर्यात में 12 फीसदी की सालाना गिरावट दर्ज हुई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का निर्यात अब कई देशों में फैल गया है, जिससे एक्सपोर्ट की विविधता दिखती है। UAE, चीन, वियतनाम, जापान, हांगकांग, बांग्लादेश, श्रीलंका और नाइजीरिया जैसे देश अब भारत के बड़े निर्यात गंतव्य बन गए हैं। रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया कि क्या कुछ देश भारत से सामान खरीदकर उसे अमेरिका को ज्यादा बेच रहे हैं। उदाहरण के लिए, जनवरी-अगस्त 2025 में अमेरिका में मोती और कीमती पत्थरों के आयात में ऑस्ट्रेलिया का हिस्सा 2% से बढ़कर 9% हो गया, और हांगकांग का हिस्सा 1% से 2% हो गया। वहीं, अगस्त में इन सामानों का अमेरिका में आयात थोड़ा कम हुआ।
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सभी सेक्टरों में नए बाजार खोज पाना आसान नहीं है। खासकर कम मुनाफे वाले और मेहनत ज्यादा वाले उत्पाद जैसे सूती कपड़े, खेल सामान, कार्पेट और चमड़े के जूते-चप्पल वाले सेक्टरों को ज्यादा मुश्किल हो रही है। इन सेक्टरों में चीन और आसियान देशों से कड़ी टक्कर है, जिससे नए बाजार ढूंढना कठिन हो गया है। अमेरिकी टैरिफ का असर भी असमान है और छोटे उद्योगों को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। कम मुनाफे वाले उत्पाद व्यापार के झटकों से जल्दी प्रभावित होते हैं क्योंकि इनमें कामकाजी पूंजी का दबाव रहता है और विदेश में इकाई खोलना भी मुश्किल होता है।
स्पोर्ट्स सेक्टर का 40% निर्यात अमेरिका जाता है, और वैकल्पिक बाजार न मिलने की वजह से अक्टूबर में कुल निर्यात 6% गिर गया। सूती कपड़ों का अमेरिका को निर्यात 25% कम हुआ, हालांकि UAE, स्पेन, इटली और सऊदी अरब को निर्यात बढ़ा, लेकिन कुल निर्यात सितंबर में 6% घट गया। यहां वियतनाम और बांग्लादेश जैसे बड़े प्रतिस्पर्धी हैं। चमड़े के जूतों का निर्यात भी अमेरिका में गिरावट के बाद कुल 10% कम हुआ। इन सेक्टरों में छोटे कारोबारियों को सबसे ज्यादा मुश्किल होती है, क्योंकि उनके पास बड़े बदलाव करने की क्षमता कम है।
SBI की इकोरैप रिपोर्ट के अनुसार, कंटेनर शिपमेंट के आंकड़े दिखाते हैं कि कुछ सामान सीधे अमेरिका नहीं जा रहा बल्कि रीरूट हो रहा है। भारत और चीन से अमेरिका जाने वाले कंटेनरों में गिरावट आई, जबकि इंडोनेशिया, थाईलैंड और वियतनाम से बढ़ोतरी हुई। भारत से 18.4% की गिरावट हुई, चीन से 16.3%, वहीं इंडोनेशिया से 10.1% और थाईलैंड व वियतनाम से 3.6% की बढ़ोतरी हुई। इसका मतलब है कि अब भारतीय सामान पहले इन देशों में जा रहा है और वहां से अमेरिका पहुंच रहा है।
ट्रेड एक्सपर्ट शरद कोहली बिज़नेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहते हैं, “अमेरिका से हुए समझौते का सबसे ज्यादा फायदा टेक्सटाइल, समुद्री उत्पाद, फार्मा, केमिकल, ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग सामान, जेम्स एंड ज्वेलरी और IT सेक्टर को मिलेगा, क्योंकि टैरिफ लगने के बाद सबसे ज्यादा परेशानी इन्ही सेक्टरों को हुई थी। निश्चित रूप से आगे अमेरिकी बाजार में इन सेक्टरों को विस्तार मिलेगा।”
“लेकिन ट्रंप के टैरिफ को एक तरह से भारत को दोहरा फायदा मिला है। टैरिफ लगने के बाद भारत ने यूरोपीय यूनियन के साथ ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ व्यापार समझौता किया जो लगभग 18 सालों से उटका हुआ था। इसके अलावा भारत ने अन्य जरूरी व्यापार समझौते किए जो भारत के हित में है। इससे भारतीय कंपनियों और सेक्टरों को और भी बड़ा बाजार मिलेगा।”
क्या इस ट्रेड डील के बाद भारत को भी अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदना होगा? इसपर कोहली कहते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को 500 अरब डॉलर के निर्यात की बात कही है, जो 2030 तक की डेडलाइन हो सकती है क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच साल 2025 में व्यापार वार्ता शुरू हुई थी। लेकिन कोहली मानते हैं कि यह 2035-40 तक भी जा सकता है।
वो कहते हैं, “भारत अभी अमेरिका से लगभग 50 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जो तुरंत तेजी से नहीं बढ़ाया जा सकता। अमेरिका सामान महंगा है, जिसकी भारतीय बाजार में खपत कम है। ऐसा नहीं हो सकता कि ट्रेड डील के लिए बिना मांग के सामान को खरीदकर डंप किया जाए।”
शरद कोहली कहते हैं, “निश्चित रूप से। टैरिफ घटने के बाद भारतीय कारोबारी अपना निर्यात बढ़ाएंगे, जिससे इसमें बूम आएगा।”
क्या यह टैरिफ लगने से पहले के स्तर को पार कर जाएगा? इसपर कोहली कहते हैं, “ऐसा हो सकता है। ट्रंप से पहले भारतीय सामानों पर अमेरिका में औसतन 3 से 4 प्रतिशत का टैरिफ लगता था, जो अब 18 प्रतिशत लगेगा। इसके चलते अमेरिका में भारतीय सामान थोड़ा महंगा होगा। लेकिन भारत के दूसरे प्रदिद्विंदी देशों पर भी ट्रंप ने टैरिफ लगा रखा है, जो भारत के मुकाबले ज्यादा है। इसलिए भारत के लिए यहां भी फायदा ही है। और अब तो भारत के पास दूसरे बाजार के विकल्प भी मौजूद हैं, जिसके चलते व्यापार में विविधता आना तय है।”