भारत और अमेरिका के बीच मंगलवार (3 फरवरी) को हुए व्यापार समझौते ने एक बार फिर देश के टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग) और अपैरल सेक्टर (परिधान उद्योग) की ओर सबकी नजरें खींच ली हैं। इस डील से टैरिफ में राहत मिलने और बाजार तक बेहतर पहुंच होने की उम्मीद है, जो देश के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स में से एक को सीधा फायदा पहुंचाएगी।
भारत का टेक्सटाइल और अपैरल निर्यात वित्त वर्ष 25 में 36.61 बिलियन डॉलर का रहा। यह पिछले साल से 6.32 फीसदी ज्यादा है। कुल माल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी करीब 8.37 फीसदी है। दुनिया के टेक्सटाइल और अपैरल मार्केट में भारत की 3.9 फीसदी हिस्सेदारी है और यह छठा सबसे बड़ा निर्यातक देश है।
अन्य प्रमुख एशियाई देशों की तुलना में भारत का टेक्सटाइल निर्यात बास्केट ज्यादा विविध है। इसमें कॉटन यार्न, फैब्रिक, गारमेंट्स और मेड-अप्स शामिल हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को एक ही देश से कई कैटेगरी में सोर्सिंग की सुविधा मिलती है।
भारत का सबसे बड़ा टेक्सटाइल निर्यात विकसित बाजारों में जाता है। अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन ने मिलकर वित्त वर्ष 2025 में भारत से 20.7 बिलियन डॉलर के टेक्सटाइल और अपैरल उत्पाद खरीदे हैं।
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा अपैरल मार्केट है। यहां से करीब एक-तिहाई गारमेंट निर्यात होता है। इंडस्ट्री के जानकार मानते हैं कि यहां थोड़ी-सी भी टैरिफ राहत से सोर्सिंग के फैसले बदल सकते हैं। इससे सबसे ज्यादा निटवियर, होम टेक्सटाइल्स और कॉटन गारमेंट्स जैसी प्राइस-सेंसिटिव चीजों को राहत मिलने की संभावना है।
PHD चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के CEO और सेक्रेटरी जनरल रंजीत मेहता कहते हैं, “MSME, जो अमेरिका के कड़े टैरिफ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, उन्हें अब दुनिया के सबसे बड़े मार्केट में अच्छी एंट्री मिलेगी। यह डील हमारे MSME के लिए फिर से शुरू करने का शानदार मौका है।”
इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, इस समझौते से अमेरिका को टेक्सटाइल और अपैरल निर्यात अगले कुछ तिमाहियों में दोगुना से ज्यादा बढ़ सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि खरीदार कितनी जल्दी ऑर्डर शिफ्ट करते हैं।
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दुनिया के बड़े ब्रैंड्स अब सोर्सिंग स्ट्रैटेजी बदल रहे हैं, क्योंकि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अपैरल निर्यातक बांग्लादेश मुश्किल में है।
वित्त वर्ष 26 के दूसरे छमाही में बांग्लादेश का रेडीमेड कपड़े का निर्यात बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दबाव में रहा। घरेलू राजनीतिक अस्थिरता, लेबर की दिक्कत और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं ने फैक्ट्रियों को प्रभावित किया, जिसके चलते शिपमेंट में देरी देखने को मिली।
पिछले साल अप्रैल में बांग्लादेश ने भारत से जमीन के रास्ते आने वाले आयात पर रोक लगा दी। इससे कच्चा माल महंगा हो गया और बांग्लादेशी कंपनियों की कीमत में बढ़त कम हो गई।
बांग्लादेश के कुल निर्यात में गारमेंट्स की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है। ऐसे में थोड़ी-सी भी रुकावट उसकी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालती है। ग्लोबल ब्रैंड्स के लिए कीमत के साथ भरोसेमंद सप्लाई भी उतनी ही जरूरी होती है, इसलिए डिलीवरी में देरी या ऑर्डर रद्द होने पर वे तुरंत दूसरे सप्लायर ढूंढ लेते हैं।
वियतनाम अभी भी अपैरल निर्यात के मामले में बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है। 2025 में उसके शिपमेंट करीब 40 बिलियन डॉलर रहने का अनुमान है, लेकिन इंडस्ट्री के आकलन बताते हैं कि वह अपने कुछ ग्रोथ टारगेट हासिल नहीं कर पाया। अमेरिका के 20 फीसदी बेसलाइन टैरिफ के कारण मार्जिन पर भी दबाव बना हुआ है।
वियतनाम यार्न और फैब्रिक के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर रहता है। ऐसे में अमेरिकी टैरिफ से बढ़ी लागत को संभालना उसके लिए मुश्किल हो जाता है। ऊपर से खरीदार कम कीमत और जल्दी डिलीवरी की मांग कर रहे हैं, जिससे कीमत तय करने की गुंजाइश और कम हो जाती है।
अमेरिका के अलावा भारत को दूसरे मोर्चों पर भी फायदा मिला है। 2025 में भारत ने यूरोपियन यूनियन के साथ ट्रेड एग्रीमेंट किया, जबकि UK के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भी पूरा हो चुका है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे भारत को दुनिया के तीन सबसे बड़े अपैरल बाजारों, जिसमें अमेरिका, EU और UK शामिल है, में एक साथ बेहतर या प्रेफरेंशियल एक्सेस मिल गया है। इसके चलते टैरिफ की शर्तें सुधरेंगी और कारोबार में आने वाली अड़चनें कम होंगी। ये तीनों बाजार मिलकर ग्लोबल अपैरल डिमांड का बड़ा हिस्सा कवर करते हैं।
घरेलू नीतियों से भी इस रफ्तार को समर्थन मिल रहा है। FY27 के यूनियन बजट में टेक्सटाइल से जुड़ी योजनाओं के लिए ज्यादा फंड रखा गया है और इस सेक्टर को मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की रणनीति का हिस्सा बताया गया है।
बजट के ये कदम भले ही तुरंत क्षमता बढ़ाने में असर न दिखाएं, लेकिन इससे खरीदारों के बीच भारत को एक भरोसेमंद और लंबे समय के सोर्सिंग पार्टनर के रूप में देखने का भरोसा मजबूत होता है।
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करेंसी का रुख भी निर्यातकों के पक्ष में नजर आ रहा है। रुपया फिलहाल करीब 90.33 प्रति डॉलर के आसपास है। डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपये से इनवॉइस पर रुपये में बेहतर रिटर्न मिलता है, जिससे निर्यातक बिना मार्जिन पर असर डाले प्रतिस्पर्धी दाम रख पाते हैं।
खास तौर पर बड़ी मात्रा के अपैरल ऑर्डर्स में एक्सचेंज रेट में होने वाला हल्का-सा बदलाव भी खरीदारों के लैंडेड कॉस्ट पर बड़ा असर डाल देता है।
मौजूदा हालात खास हैं, क्योंकि कई फैक्टर एक साथ भारत के पक्ष में काम कर रहे हैं। एक तरफ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ट्रेड एक्सेस बेहतर हो रहा है, वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश सप्लाई से जुड़े डिसरप्शन झेल रहा है और वियतनाम पर लागत का दबाव बढ़ता जा रहा है। घरेलू स्तर पर पॉलिसी सपोर्ट और करंसी ट्रेंड्स भी इस माहौल को मजबूती दे रहे हैं।
रंजीत मेहता का कहना है, “अमेरिका से बेहतर तकनीक मिलेगी, जिससे हमारा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेगा।”
ये सभी कारक मिलकर भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल निर्यातकों के लिए वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर बना रहे हैं। हालांकि इस मौके का पूरा फायदा कितना उठाया जा पाएगा, यह एक्जीक्यूशन, स्केल और रिलायबिलिटी पर निर्भर करेगा, लेकिन फिलहाल माहौल अनुकूल नजर आ रहा है।