बाजार अधोसंरचना संस्थान (एमआईआई) यानी स्टॉक एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन और डिपॉजिटरी आदि की देश के पूंजी बाजारों के विकास और नियमन में अहम भूमिका है। प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक 2025 का पांचवां अध्याय एमआईआई के पंजीयन और नियमन से संबंधित है। यह केवल इस बात की पुष्टि नहीं करता है कि मौजूदा कानून के तहत पारंपरिक प्रमुख जिम्मेदारियां क्या हैं बल्कि यह उन्हें अर्ध-स्वायत्त प्राधिकरणों के दर्जे तक ऊंचा उठाता है, जिनके पास बाजार तक पहुंच, आचरण, जांच और प्रवर्तन की व्यापक शक्तियां होती हैं।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा पर्यवेक्षित और विनियमित प्राथमिक स्तर की एक नियामक संस्था का होना एक व्यावहारिक आवश्यकता है क्योंकि विभिन्न श्रेणियों के विनियमित बाजार मध्यस्थ बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अब समय आ गया है कि एमआईआई की संरचना और कार्य प्रणाली पर दोबारा विचार किया जाए। यह विचार इस संदर्भ में होना चाहिए कि वे सार्वजनिक संस्थानों की भूमिका निभाते हुए साथ ही व्यावसायिक गतिविधियों में भी संलग्न हैं। यह आलेख स्टॉक एक्सचेंज पर केंद्रित है।
स्टॉक एक्सचेंज की व्यापार से निकटता उसे वास्तविक समय में निगरानी, सूचीबद्ध मानकों को लागू करने और सुव्यवस्थित बाजार बनाए रखने में सक्षम बनाता है। अध्याय पांच इससे कहीं आगे जाता है। यह स्टॉक एक्सचेंज को बाध्यकारी उपनियम बनाने, निरीक्षण करने, जांच शुरू करने और दंड लगाने का अधिकार प्रदान करता है। उल्लेखनीय रूप से, ये शक्तियां केवल सदस्यों तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि व्यापक रूप से बाजार प्रतिभागियों तक फैलती हैं।
जो पहले सीमित, सौंपे गए कार्य थे, वे अब मूल सांविधिक शक्तियां बन गए हैं, जिससे व्यावसायिक संस्थाओं के भीतर अर्ध-नियामक अधिकार प्रभावी रूप से समाहित हो गए हैं। स्टॉक एक्सचेंज लाभ के लिए काम करने वाले संगठन हैं और वे निजी स्वामित्व वाले उपक्रम हैं। वे ऐसे वाणिज्यिक उद्यम हैं जिनके पास शेयरधारक, राजस्व की अनिवार्यता और प्रतिस्पर्धी रणनीतियां होती हैं। उनके व्यापार मॉडल कारोबार के आकार, सूचीबद्धता, डेटा के मुद्रीकरण और सहायक सेवाओं पर निर्भर करते हैं। वे ऑर्डर के प्रवाह, जारीकर्ताओं और मध्यस्थों के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। दो स्टॉक एक्सचेंज सूचीबद्ध हैं और कुछ अन्य सूचीबद्ध होने की योजना बना रहे हैं।
जब ऐसी संस्थाओं को एक साथ नियम बनाने वाले, बाजार संचालक, जांचकर्ता और प्रवर्तनकर्ता के रूप में कार्य करने की शक्ति दी जाती है, तो ढांचागत तनाव अपरिहार्य हो जाता है। असमान व्यवहार की केवल धारणा भी प्रणाली की निष्पक्षता में विश्वास को कमजोर कर सकती है। सेबी द्वारा किसी भी प्रकार की निगरानी और नियामक प्रावधान इन चिंताओं का विश्वसनीय रूप से निराकरण करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।
स्टॉक एक्सचेंज के बीच प्रतिस्पर्धा की कमी एक और समस्या है। यह केवल परंपरागत कारणों से ही नहीं, बल्कि नए इच्छुक प्रतिभागियों के लिए प्रवेश बाधाओं के कारण भी है। निर्धारित स्वामित्व संरचना के अनुसार, किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज की इक्विटी में कोई भी व्यक्ति या संस्था (निर्धारित अपवादों को छोड़कर) 5 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकती। कुछ श्रेणियां जैसे सार्वजनिक वित्तीय संस्थान, बैंक, बीमा कंपनियां और स्टॉक एक्सचेंज/क्लियरिंग कॉरपोरेशन सेबी की मंजूरी के साथ 15 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रख सकते हैं। हालांकि विविधीकृत स्वामित्व की अवधारणा पूरी तरह उचित है, लेकिन इसे किसी एक्सचेंज की स्थापना के पहले दिन से ही लागू करना नए प्रतिभागियों के लिए इस विशिष्ट समूह में शामिल होना लगभग असंभव बना देता है।
यह स्थिति एक विचित्र परिदृश्य की ओर ले जाती है, जहां प्रणाली मौजूदा संस्थानों को प्रतिस्पर्धा से बचाती है, इस प्रकार अल्पाधिकार वाले व्यवहार को प्रोत्साहित करती है और साथ ही उन्हें सांविधिक शक्तियां भी सौंपती है। यह लेख मौजूदा एक्सचेंजों के प्रदर्शन की तुलना करने के बारे में नहीं है। न ही इसका उद्देश्य किसी विशेष एक्सचेंज के कामकाज पर टिप्पणी करना है। हालांकि मुद्दे की गंभीरता को समझने के लिए नैशनल स्टॉक एक्सचेंज का उदाहरण लें। वित्त वर्ष 25 में इसका नकद इक्विटी खंड में लगभग 94 प्रतिशत, इक्विटी विकल्पों में लगभग 87 प्रतिशत और इक्विटी वायदा में लगभग 100 प्रतिशत बाजार हिस्सा था। इसके वित्तीय आंकड़ों की बात करें तो वित्त वर्ष 25 में ब्याज, कर, मूल्यह्रास और परिशोधन से पहले की आय और कर पश्चात लाभ क्रमशः राजस्व का लगभग 73 प्रतिशत और 57 प्रतिशत थे।
इसे वस्तुतः किसी प्रतिस्पर्धा का कोई खतरा नहीं है। क्या कोई अन्य व्यवसाय कल्पना कर सकता है जो इतनी ईर्ष्याजनक स्थिति का आनंद लेता हो? अंतरराष्ट्रीय अनुभव प्रमुख न्याय क्षेत्रों में नियामक प्राधिकरणों और वाणिज्यिक परिचालनों के पृथक्करण को सामान्य मानक के रूप में दर्शाता है। इसके पीछे का तर्क है: नियामक वैधता केवल कानूनी अधिकार पर ही नहीं, बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता पर भी निर्भर करती है। जहां प्रवर्तन शक्ति वाणिज्यिक हितों से टकराती है, वहां कदाचार की अनुपस्थिति में भी विश्वास कमजोर हो जाता है।
उदाहरण के लिए, अमेरिका में एक्सचेंज लाभ केंद्रित संस्थाओं के रूप में संचालित होते हैं, लेकिन अग्रिम पंक्ति का विनियमन एफआईएनआरए को सौंपा गया है, जो प्रतिभूति और विनिमय आयोग की देखरेख में एक गैर-लाभकारी संगठन है। भारत में वास्तविक रूप से स्वतंत्र फ्रंटलाइन नियामक संस्था की स्थापना, जो सेबी के प्रति जवाबदेह हो लेकिन एक्सचेंजों से संस्थागत रूप से अलग हो, प्रवर्तन की विश्वसनीयता को बनाए रखेगी और बाजार संस्थानों को उनके मूल आर्थिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने की स्वतंत्रता देगी।
ऐसा पृथक्करण नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा। एक्सचेंजों को स्पष्ट रूप से प्लेटफॉर्म व्यवसायों के रूप में मानकर, उन्हें सामान्य प्रतिस्पर्धा और कॉर्पोरेट-शासन मानदंडों के तहत संचालित किया जा सकता है। इससे फिनटेक कंपनियों, प्रौद्योगिकी फर्मों और दीर्घकालिक रणनीतिक निवेशकों के लिए दरवाजे खुलेंगे। बाजार की गहराई का भविष्य प्रतिस्पर्धी, प्रौद्योगिकी-चालित प्लेटफॉर्म को स्पष्ट और निष्पक्ष निगरानी के तहत फलने-फूलने में सक्षम बनाने में निहित है।
सिक्योरिटीज मार्केट कोड बिल सरकार और नियामक को यह अवसर प्रदान करता है कि वे प्रथम-स्तरीय नियामक और एमआईआई के लिए ढांचे को पुनः संतुलित करें, इस प्रकार कि प्रवर्तन की प्रभावशीलता और संस्थागत विश्वास बना रहे, साथ ही वाणिज्यिक संस्थाओं के बीच नवाचार और प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जा सके, एक निष्पक्ष और समान अवसर वाले वातावरण में।
(लेखक बाजार नियामक सेबी के पूर्व चेयरमैन हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)