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एसआईआर को लेकर ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं, वैध मतदाताओं के नाम काटने का लगाया आरोप

ममता की बात सुनने के बाद सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पश्चिम बंगाल एसआईआर प्रक्रिया से संबंधित कई याचिकाएं पहले से ही अदालत में लंबित हैं।

Last Updated- February 05, 2026 | 10:44 AM IST
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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देते हुए राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को उच्चतम न्यायालय पहुंच गईं। उन्होंने अपनी रिट याचिका में अदालत से उनकी बात सुनने की अपील की। इस तरह असामान्य रूप से हस्तक्षेप किए जाने पर पीठ ने उनकी बात सुनी। ऐसा पहली बार हुआ जब किसी मौजूदा मुख्यमंत्री ने शीर्ष अदालत के समक्ष मौखिक रूप से दलीलें रखीं।

हालांकि बनर्जी का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने स्वयं भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली के पीठ के समक्ष अपनी बात रखते हुए आरोप लगाया कि एसआईआर का उपयोग वैध मतदाताओं को शामिल करने के बजाय उन्हें सूची से बाहर करने के लिए किया जा रहा है।

बनर्जी ने अदालत को बताया, ‘यह प्रक्रिया समावेशन के लिए नहीं, बल्कि विलोपन के लिए है।’ उन्होंने कहा कि शादी के बाद उपनाम बदलने वाली और निवास बदलने वाली महिलाओं को कथित विसंगतियों के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जा रहा है। बनर्जी ने दावा किया कि भारतीय निर्वाचन आयोग से बार-बार अनुरोध किए जाने पर भी उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। इससे न्याय मिलने में देरी हो रही है। इसलिए हमें शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। उन्होंने कहा, ‘मैंने चुनाव आयोग को सभी विवरणों के साथ पत्र लिखे हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया गया है।’

ममता की बात सुनने के बाद सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पश्चिम बंगाल एसआईआर प्रक्रिया से संबंधित कई याचिकाएं पहले से ही अदालत में लंबित हैं। उन्होंने कहा कि पहले वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा इस मुद्दे को उठाया गया था। उसके बाद अदालत ने 19 जनवरी को संदेहास्पद मतदाताओं की सूची में रखे गए लोगों के पारदर्शी सत्यापन संबंधी निर्देश दिए थे।

बनर्जी ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग नियमों का पालन नहीं कर रहा है। वह पश्चिम बंगाल में पहचान प्रमाण के रूप में आधार कार्ड स्वीकार करने से इनकार कर रहा है जबकि अन्य राज्यों में यह मान्य है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आधार एक हद तक ही मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। एसआईआर प्रक्रिया की वैधता पर फैसला लंबित होने के मद्देनजर उन्होंने आगे कोई टिप्पणी करने से परहेज किया।

ममता ने यह भी आरोप लगाया कि एसआईआर को विधान सभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में चुनिंदा रूप से लागू किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के समय पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि त्योहार और फसल के सीजन के दौरान एसआईआर को जल्दबाजी में किया जा रहा है। मतदाता और चुनाव अधिकारी, दोनों का उत्पीड़न किया जा रहा है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) से अलग लगभग 8,000 भी तैनात किए गए थे। इसी वजह से बड़े पैमाने पर सूची से नाम काटे गए। बनर्जी ने कहा, ‘जीवित लोगों को मृत घोषित किया जा रहा है। इस तरह वे बंगाल के लोगों को उनके हक से वंचित करना चाहते हैं।’ मुख्य न्यायाधीश ने जवाब दिया कि अदालत यह सुनिश्चित करेगी कि सभी कार्य औपचारिक रूप से बीएलओ द्वारा किए जाएं।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर केवल इसलिए नियुक्त किए गए थे, क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार बार-बार अनुरोध के बावजूद एसआईआर के लिए पर्याप्त ग्रुप-बी अधिकारी उपलब्ध नहीं करा पाई। आयोग की ओर से ही पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने भी राज्य प्रशासन से सहयोग की कमी का हवाला देते हुए यही बात दोहराई।
पूरा मामला सुनने के बाद अदालत ने निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया और अगले सोमवार तक इसका जवाब मांगा। इसमें कहा गया है कि यदि राज्य सरकार एसआईआर के लिए अधिकारियों की सूची दे देती है तो माइक्रो-ऑब्जर्वर को हटाया जा सकता है। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग के अधिकारी पश्चिम बंगाल में ‘शत्रुता’ जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं।

First Published - February 5, 2026 | 10:44 AM IST

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