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बैंकिंग साख: रुपये की आगे की राह कितनी दमदार

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भारतीय रुपये और यूएई के दिरहम के आपस में इस्तेमाल के लिए स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली शुरू करके ऐसा किया जा सकता है।

Last Updated- September 14, 2023 | 9:12 PM IST
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अगस्त के मध्य में भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने अपनी स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार का निपटान शुरू किया। भारत की तरफ से इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने अबू धाबी नैशनल ऑयल कंपनी को करोड़ों बैरल तेल की खरीद का भुगतान रुपये में किया।

यह भुगतान दोनों देशों के केंद्रीय बैंकों यानी भारतीय रिजर्व बैंक और यूएई के केंद्रीय बैंक के बीच अबू धाबी में हुए समझौते के तहत हुआ। दोनों केंद्रीय बैंकों ने इस देश से उस देश में स्थानीय मुद्रा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए व्यवस्था बनाने और भुगतान तथा संदेश प्रणाली को जोड़ने के बारे में समझौते किए थे।

इसका मकसद दोनों देशों के बीच बिना बाधा के भुगतान सुनिश्चित करना था। भारतीय रुपये और यूएई के दिरहम के आपस में इस्तेमाल के लिए स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली शुरू करके ऐसा किया जा सकता है। दोनों केंद्रीय बैंकों के समझौते में सभी चालू खातों के साथ-साथ पूंजी खातों के अनुमति प्राप्त लेनदेन को शामिल किया गया है।

एक बार स्थानीय मुद्रा प्रणाली बनने पर निर्यातकों और आयातकों को बिल प्राप्त करने और संबंधित देश की घरेलू मुद्रा में भुगतान करने में मदद मिलेगी। कुछ समय बाद रुपये और दिरहम का विदेशी मुद्रा बाजार विकसित हो सकेगा।

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इससे पहले मार्च तक रिजर्व बैंक ने रुपये में भुगतान के निपटान के लिए कम से कम 18 देशों के बैंकों को विशेष रुपया वोस्त्रो खाते खोलने की इजाजत दी थी। एक वोस्त्रो खाता वह होता है जो प्रतिनिधि बैंक किसी दूसरे बैंक की ओर से अपने यहां रखता है।

रिजर्व बैंक ने जिन 60 बैंकों को विदेशी मुद्रा में लेनदेन के लिए अधिकृत किया था, वे बैंक बोत्सवाना, फीजी, जर्मनी, गुयाना, इजरायल, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, म्यामांर, न्यूजीलैंड, ओमान, रूस, सेशल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया, यूगांडा और यूनाइटेड किंगडम के हैं।

विशेष रुपया वोस्त्रो खाते के जरिये आयात और निर्यात के निपटान की प्रक्रिया जुलाई 2022 में केंद्रीय बैंक के एक सर्कुलर से शुरू हुई। सर्कुलर में बैंक ने इनवॉयसिंग, भुगतान और फेमा 1999 के तहत रुपये में आयात-निर्यात के निपटान के बारे में बताया। उसने तीन प्रमुख बिंदु बताए।

पहला था इनवॉयसिंग जिसके तहत सभी तरह के आयात और निर्यात की रुपये में बिलिंग की जा सकती है। दूसरा था विनिमय दर जिसका निर्धारण दोनों कारोबारी देशों की मुद्राओं की की विनिमय दर के हिसाब से बाजार कर सकता है। और तीसरा था निपटान। इस व्यवस्था के तहत व्यापार लेनदेन का निपटान रुपये में होगा।

इस व्यवस्था के तहत आयात करने वाली भारतीय कंपनियां रुपये में भुगतान करेंगी जिसका क्रेडिट व्यापारिक साझेदार के प्रतिनिधि बैंक के विशेष रुपया वोस्त्रो खाते में किया जाएगा। विदेशी आपूर्तिकर्ता या विक्रेता से लिए गए सामान या सेवा की आपूर्ति पर बिल के बदले यह क्रेडिट किया जाएगा।

इसी तरह, इस व्यवस्था के जरिये सामान और सेवा का निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों को निर्यात रकम साझेदार देश के प्रतिनिधि बैंक के आधिकारिक विशेष रुपया वोस्त्रो खाते में रुपये में मिलेगी।

सवाल है कि कोई निर्यातक देश इस अधिशेष रुपये का क्या करेगा जब उसका आयात बिल निर्यात से कम हो? तो विशेष वोस्त्रो खाते में रुपये में रखी राशि का इस्तेमाल भविष्य के आयात या निर्यात लेनदेन के प्रबंधन के लिए किया जा सकेगा। इस रकम का उपयोग भारत की परियोजनाओं में निवेश के साथ साथ सरकारी बॉन्ड और ट्रेजरी बिलों में निवेश के लिए भी हो सकेगा।

सर्कुलर जारी होने के बाद से ही हर बैंक के ट्रेजरी फ्लोर पर चर्चा का नया विषय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण है। कई तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। जैसे, यूक्रेन हमले के कारण रुस पर लगाए गए प्रतिबंधों की काट के लिए स्थानीय मुद्रा में व्यापार की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं क्योंकि इन प्रतिबंधों से आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक व्यापार दोनों पर असर पड़ रहा है।

पर इससे इतर देखें तो रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण बैंकिंग और राजनीतिक क्षेत्रों में बहस का बड़ा मसला है। खुछ लोग खम ठोक कर कह रहे हैं और सपना पाले हुए हैं कि रुपया डॉलर को उसकी उच्च स्थिति से हटा देगा। वे मान रहे हैं कि रुपया रिजर्व करेंसी बन जाएगा।

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रिजर्व करेंसी, जिसे ऐंकर करेंसी, हार्ड करेंसी या सुरक्षित देश की मुद्रा भी कहा जाता है, ऐसी विदेशी मुद्रा होती है जिसे विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक खासी मात्रा में विदेशी मुद्री भंडार के हिस्से के रुप में रखते हैं। ऐसी मुद्रा का उपयोग अंतरराष्ट्रीय लेनदेन, अंतरराष्ट्रीय निवेश और वैश्विक अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं में किया जाता है।

ब्रिटेन की पौंड स्टर्लिंग 19वीं सदी और बीसवीं सदी के पहले उत्तरार्ध में दुनिया के बड़े हिस्से की प्राथमिक रिजर्व मुद्रा होती थी। उसके बाद अमेरिकी डॉलर रिजर्व करेंसी बन गया। इस समय अमेरिकी डॉलर, यूरो, जापानी येन और ब्रिटिश पौंड दुनिया की प्रमुख रिजर्व मुद्राएं हैं।

वर्ष 2022 तक वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा 58.36 प्रतिशत था। इसके बाद यूरो 20.47 प्रतिशत, जापानी येन 5.51 प्रतिशत और पौंड स्टर्लिंग 4.91 प्रतिशत थे।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रुप में रुपये के भविष्य को लेकर घनघोर निराशावादी हैं। उनकी दलील है कि जब वैश्विक निर्यात में भारत का हिस्सा महज एकल अंक में है तो हम कैसे इसका सपना देख सकते हैं। इसके अलावा भारत की रेटिंग, पूंजी खाते की परिवर्तनीयता पर प्रतिबंध भी इसमें बाधक है।

रुपये की तरह चीन की मुद्रा युआन भी पूंजी खाते में पूरी तरह परिवर्तनीय नहीं है लेकिन वह विशेष आहरण अधिकार या एसडीआर का हिस्सा है। एसडीआर को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सदस्य देशों के आधिकारिक रिजर्व की भरपाई के लिए आरक्षित मुद्रा के रुप में बनाया है। एसडीआर की बास्केट में शामिल मुद्राओं में अमेरिकी डॉलर, यूरो, चीन की युआन, जापानी येन और ब्रिटिश पौंड हैं। इसमें भारतीय रुपया नहीं है।

भारत का 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का सरकारी बॉन्ड का बाजार उभरते देशों में सबसे बड़ा है। लेकिन फिर भी वह वैश्विक सूचकांकों में शामिल नहीं है। ऐसे में कैसे रुपये को सीमा पार ले जाया जा सकता है? रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण का मोटा सा मतलब यही है कि दुनिया के दूसरे देश भारतीय मुद्रा को विनिमय के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करेंगे। उसका भंडारण मूल्य होगा।

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पर क्या यह सब रातो-रात हो जाएगा या एक दशक के भीतर जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, तब होगा? निश्चित ही नहीं। लेकिन रुपये में इनवॉयसिंग और स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान की अनुमति देकर रिजर्व बैंक ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है।

इसका तात्कालिक फायदा क्या होगा? जैसे यूएई का उदाहरण लें जो भारत को निर्यात ज्यादा करता है और आयात कम। अब नई व्यवस्था में वह अपनी निर्यात आय को रुपये में रखेगा। अगर वह चाहेगा तो भारतीय परियोजनाओं में इस रकम का निवेश कर सकेगा या फिर इसे डॉलर में बदलकर पैसा वापस ले जा सकेगा।

जो भी हो, हमें फायदा ही होगा। अगर यूएई निवेश नहीं भी करता है और पैसा ले जाता है तो विनिमय जोखिम वही उठाएगा न कि भारत। जब दूसरे देशों के साथ इस तरह के ज्यादा से ज्यादा लेन-देन होंगे तो भुगतान संतुलन पर दबाव कम होगा और डॉलर का भंडार रखने की जरूरत कम होगी। क्या रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए यह सब अच्छे तर्क नहीं है?

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First Published - September 14, 2023 | 9:12 PM IST

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