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सरकारी नौकरियां बढ़ीं, लेकिन कामकाज में तेजी आई या नहीं?

केंद्र सरकार के कर्मचारियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन सवाल यह है कि इससे क्षमता और दक्षता भी बढ़ रही है या नहीं। विस्तार से बता रहे हैं ए के भट्‌टाचार्य

Last Updated- March 01, 2025 | 6:48 AM IST
Jobs

जून 2022 में नरेंद्र मोदी सरकार ने रोजगार निर्माण पर एक साहसी घोषणा की थी। उसने अगले 18 महीनों में केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में 10 लाख लोगों को नौकरी देने की बात कही थी। घोषणा के मुताबिक ये भर्तियां ‘मिशन’ की तरह की जानी थीं।

घोषणा के राजनीतिक और आर्थिक मायने थे। राजनीतिक इसलिए यह 2024 में होने वाले आम चुनावों से महज दो साल पहले की गई थी, जब राजनीतिक दलों और आम लोगों के बीच नौकरी अहम मुद्दा बन गई थी। आर्थिक इसलिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था श्रम बाजार में तेजी से जुड़ते लोगों के लिए वेतन वाली और अधिक नौकरियां तैयार करने की चुनौती से जूझ रही थी। केंद्र सरकार सबसे अधिक रोजगार देने वालों में है और वह इस राजनीतिक तथा आर्थिक जरूरत को पूरा करना चाहती थी।

केंद्र सरकार के विभागों और मंत्रालयों में बनी रिक्तियों ने इस वादे को पूरा करने का काम तेज किया। फरवरी-मार्च 2022 में तत्कालीन कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में बताया कि केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में मार्च 2020 तक करीब 8.70 लाख पद खाली थे। सबसे ज्यादा 2.47 लाख असैन्य पद रक्षा मंत्रालय में खाली थे।

उसके बाद रेलवे में 2.37 लाख, गृह मंत्रालय में 1.28 लाख (ज्यादातर केंद्रीय पुलिस बलों में), डाक विभाग में 90,000 और अंकेक्षण विभाग में 28,000 रिक्तियां थीं। कुल रिक्तियों की 84 फीसदी तो इन्हीं में थीं। उस समय केंद्र सरकार में कुल 40 लाख कर्मचारी तय किए गए थे।

फरवरी के आरंभ में प्रस्तुत 2025-26 के केंद्रीय बजट से पता चलता है कि केंद्र सरकार ने सशस्त्र बलों के अलावा अपने सभी विभागों और मंत्रालयों में किस तरह भर्तियां कीं। हकीकत में आंकड़े दिखा रहे हैं कि रेलवे सहित विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की संख्या बढ़ी है। मगर बढ़ोतरी उतनी नहीं है, जितनी का वादा जून 2022 में किया गया था।

केंद्र सरकार के कुल कर्मचारियों की संख्या मार्च 2022 के अंत में 31.7 लाख थी। इसमें सशस्त्र बल के कर्मचारी शामिल नहीं हैं। दो साल बाद यानी मार्च 2024 के अंत में आंकड़ा बढ़कर 33 लाख हो गया। इस तरह दो साल में 1.37 लाख यानी केवल 4 फीसदी कर्मचारी बढ़े। अनुमान है कि मार्च 2025 तक संख्या बढ़कर 36.6 लाख हो जाएगी।

ध्यान रहे कि मार्च 2025 के आंकड़े कर्मचारियों की वास्तविक संख्या नहीं बताते। परंतु अगर इस संशोधित आंकड़े को भी सही मान लें तो अप्रैल 2022 से अब तक कर्मचारियों की संख्या में करीब 4.89 लाख अथवा 15 फीसदी का इजाफा हुआ। इस बात के लिए सरकार की आलोचना की जा सकती है कि 10 लाख से अधिक सरकारी नौकरियों का वादा किया गया मगर तीन साल बाद उसकी आधी नौकरियां भी नहीं दी गई हैं। सरकार यह कहकर खुद को सही साबित करेगी कि आधे लक्ष्य ने भी रोजगार की चिंता को कुछ हद तक दूर किया है।

ज्यादा सरकारी नौकरियों के सृजन के अच्छे या खराब पहलू पर बात करने के बजाय इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि 1991 से 2022 तक सभी सरकारों के कार्यकाल के दौरान कर्मचारियों का आंकड़ा कम ही हुआ है। केंद्र सरकार के कुल असैन्य कर्मचारियों की बात करें तो मार्च 1991 में करीब 40 लाख कर्मचारी थे। मार्च 2014 तक इनकी संख्या कम होकर 33.2 लाख रह गई।

मोदी सरकार भी मार्च 2022 तक इनकी तादाद कम करके 31.7 लाख पर ले आई। सार्वजनिक नीति संबंधी अधिकतर बहसों में जिस बात की अनेदखी कर दी जाती है वह यह है कि हाल के सालों में सरकार ज्यादा विरोध या आंदोलन का सामना किए बगैर कर्मचारियों की संख्या घटाने में कामयाब रही है।

यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि रिक्तियों को जानबूझकर नहीं भरा गया और कई नौकरियां खत्म कर दी गईं। उन्हीं नौकरियों को ठेके पर या अस्थायी कर्मचारियों के जरिये कराया गया। मगर कर्मचारियों की तादाद तीन दशक में 21 फीसदी घटा दी गई और कोई उथल-पुथल भी नहीं हुई!

ध्यान रहे कि इन सरकारों में से किसी ने भी इन कर्मचारियों की मंजूर संख्या नहीं घटाई और वह अब भी 40 लाख ही है। यह भी सच है कि मोदी सरकार ने पिछले तीन साल में कर्मचारियों की संख्या 15 फीसदी बढ़ाई है मगर आंकड़ा 36.5 लाख तक ही पहुंच पाया है, जो 40 लाख से काफी कम है।

परंतु बीते तीन सालों में यह इजाफा कैसे हुआ? यहां याद रहना चाहिए कि कुल कर्मचारियों में से 86 फीसदी तो रेलवे, डाक, केंद्रीय पुलिस बल और कर विभाग से ही हैं। मोदी सरकार के पहले सात सालों में भारतीय रेल के कर्मचारियों की तादाद में लगातार कमी आई और मार्च 2015 में 13.2 लाख से कम होकर ये मार्च 2022 में 12.1 लाख ही रह गए।

बीते तीन सालों में असैन्य कर्मियों की कुल संख्या में 4.89 लाख का इजाफा हुआ है मगर भारतीय रेल के कर्मचारियों में केवल 3,000 की बढ़ोतरी हुई। बीते तीन सालों में डाक विभाग में सबसे अधिक 1.79 लाख और पुलिस में 1.43 लाख कर्मचारी बढ़े। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर विभागों में करीब 71,000 कर्मचारियों का इजाफा हुआ और उनके कुल कर्मचारी 1.72 लाख तक पहुंच गए। केंद्र सरकार द्वारा की जा रही नियुक्ति कई सवाल पैदा करती है।

केंद्रीय पुलिस बलों की संख्या में तेज वृद्धि बताती है कि केंद्र सरकार कानून प्रवर्तन में दखल बढ़ा रही है। इस क्षेत्र में राज्यों को अधिक नियुक्तियां करनी चाहिए ताकि पुलिस और आबादी का अनुपात बढ़ जाए। डाक विभाग के कर्मचारियों की संख्या में इजाफे से सवाल खड़ा होता है कि जब लोग डाक संचार से दूरी बनाकर डिजिटल तरीके अपना रहे हैं तो डाक विभाग को दूसरे कामों पर ध्यान देना चाहिए या नहीं।

आप इस बात पर भी ताज्जुब कर सकते हैं कि जब कर रिटर्न डिजिटल तरीके से दाखिल किए जा रहे हैं और ऑनलाइन जांच तथा कर निर्धारण का चलन बढ़ता जा रहा है तो कर विभाग के कर्मचारियों की संख्या आखिर क्यों बढ़ रही है। मगर हकीकत यही है कि कर विभाग में बहुत अधिक भर्तियां की गई हैं।

सवाल यह नहीं है कि सरकार को अधिक कर्मचारियों की भर्ती करनी चाहिए अथवा नहीं। सच तो यही है कि केंद्र सरकार के असैन्य कर्मचारियों पर सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 1 फीसदी खर्च करती है, जो ज्यादा नहीं है। कई विकासित और विकासशील देशों की तुलना में यह आंकड़ा काफी कम है।

रेल कर्मचारियों को हटा दें तो कर्मचारियों पर केंद्र का कुल खर्च और भी कम हो जाता है। ज्यादा कायदे का सवाल यह है कि भर्तियों में इजाफा उत्पादकता तथा क्षमता, दक्षता बढ़ाने के इरादे से किया जा रहा है या नहीं। साथ ही इससे सरकार का दखल कम हो रहा है या नहीं। अधिक कर्मचारियों का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि गतिरोध बढ़ें और प्रभाव कम हो।

First Published - March 1, 2025 | 6:48 AM IST

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