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Editorial: RBI MPC की बैठक इस हफ्ते; भूराजनीतिक खतरे और महंगाई के बीच दरों में कटौती पर होगा फैसला?

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नोमूरा का अनुमान है कि खाद्य कीमतों की मुद्रास्फीति अब से लेकर मार्च 2025 तक औसतन 4.5 फीसदी के आसपास रहेगी जो इस वर्ष के अब तक के 8 फीसदी के स्तर से काफी कम है।

Last Updated- October 07, 2024 | 9:33 PM IST
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भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक इस सप्ताह होने वाली है और उसमें तीन नए बाहरी सदस्य शामिल हैं। एक दशक से भी कम पुरानी इस संस्था में बदलाव का व्यवस्थित ढंग से अंजाम लेना संस्थागत क्षमता का महत्त्व दर्शाता है। केंद्र सरकार ने एमपीसी में ऐसे स्वतंत्र सदस्य नियुक्त करने की प्रतिबद्धता लगातार जताई है जिनके पास अकादमिक क्षेत्र में या वित्तीय अर्थशास्त्र में विशाल अनुभव हो और जो सरकारी क्षेत्र से बाहर हों।

तीन नए सदस्यों में एक प्रमुख थिंक टैंक के मुखिया, एक प्रमुख शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख और एक जाने माने अर्थशास्त्री शामिल हैं जिनके पास वित्तीय क्षेत्र का गहन अनुभव है। पूरा अनुमान है कि एमपीसी उच्च विश्वसनीयता, स्वतंत्रता और पारदर्शिता के साथ काम करती रहेगी।

बहरहाल, नवगठित एमपीसी के सामने कठिन विकल्प हैं। इस बात के प्रमाण हैं कि देश में मुद्रास्फीति गिरावट पर है। उदाहरण के लिए इस वर्ष जुलाई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर गिरकर चार फीसदी से नीचे आ गई जो रिजर्व बैंक का औपचारिक लक्ष्य है। आंकड़ों की कुछ कलाकारी के चलते यह उस स्तर पर पहुंच गई जहां यह महामारी के बाद से नहीं पहुंच सकी थी।

मौजूदा दौर की बात करें तो अनेक उच्च तीव्रता वाले संकेतक हैं जो यह संकेत देते हैं कि खाद्य कीमतों सहित कीमतों में इजाफे के कारक फसल कटाई के मौसम में कमजोर पड़ सकते हैं। नोमूरा का अनुमान है कि खाद्य कीमतों की मुद्रास्फीति अब से लेकर मार्च 2025 तक औसतन 4.5 फीसदी के आसपास रहेगी जो इस वर्ष के अब तक के 8 फीसदी के स्तर से काफी कम है।

बहरहाल, खाद्य कीमतों में हाल के महीनों में आई तेजी ने आम परिवारों के अनुमानों को प्रभावित किया है और समझदारी यही होगी कि मंडियों में खरीफ की फसल की आवक की प्रतीक्षा की जाए। सरकार की नजर निजी निवेश और आर्थिक वृद्धि दोनों पर बनी हुई है और अगर एमपीसी वृद्धि को सहायता पहुंचाने के लिए दरों में कटौती का निर्णय लेती है तो उसे प्रसन्नता होगी।

निश्चित तौर पर अगले कुछ महीनों में इस वजह से कटौती हो सकती है।

बहरहाल, फिलहाल तो एमपीसी को कई चुनौतियों पर नजर रखनी होगी। इनमें सबसे ऊपर है भूराजनीतिक तनाव, खासतौर पर पश्चिम एशिया में तनाव। गाजा में होने वाला युद्ध एक अलग स्तर के क्षेत्रीय संघर्ष में बदल रहा है। पहले हिजबुल्ला और लेबनान इस युद्ध में शामिल हुए और अब हिजबुल्ला के ईरानी प्रायोजकों ने प्रतिक्रिया दी है। अगर इस लड़ाई में शामिल सभी दल गैरजवाबदेह बने रहे तो इस पूरे घटनाक्रम के आर्थिक असर पर भी नजर रखनी होगी।

पश्चिम एशिया में संकट और उसके कारण पेट्रोकेमिकल्स की कीमतों में उतार-चढ़ाव ऐतिहासिक रूप से मुद्रास्फीति पर बुरा असर डालता रहा है और उसके चलते देश में व्यापक आर्थिक अस्थिरता के हालात बनते रहे हैं। उदाहरण के लिए दोनों खाड़ी युद्धों के दौरान ऐसी परिस्थितियां बनीं।

उसके अलावा अरब उभार और ईरान पर प्रतिबंधों के दौरान भी हमने ऐसा देखा। एमपीसी को शुरुआती मौद्रिक शिथिलता पर विचार करते हुए इन बातों को भी ध्यान में रखना चाहिए। अस्थिरता और उतार-चढ़ाव के हालात के लिए तैयारी करना इस समय हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। हालात को देखते हुए एमपीसी के लिए बेहतर यही होगा कि वह अभी प्रतीक्षा करे। इससे उसे इतना समय भी मिल जाएगा कि वह देख सके कि हेडलाइन मुद्रास्फीति की दर चार फीसदी के लक्ष्य पर टिकाऊ ढंग से रुकती है या नहीं।

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First Published - October 7, 2024 | 9:33 PM IST

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