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संपादकीय: शेयर बाजार पर विदेशी निवेशकों का दबाव

मौजूदा विदेशी निवेशकों की बढ़ती निकासी और विनिवेश चिंता की बात है और इस पर नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है।

Last Updated- May 24, 2024 | 10:25 PM IST
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भारत अब महामारी से होने वाली परेशानी से मजबूती से उबर चुका है और 7 फीसदी से ज्यादा दर से आगे बढ़ रहा है। ज्यादातर अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि मध्यम अवधि में भारत एक चमकीले सितारे की तरह आगे बढ़ता रहेगा, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की गति अपेक्षाकृत सुस्त रहने के आसार हैं।

भारत में महामारी के बाद होने वाले सुधार में सरकारी पूंजीगत व्यय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन वृद्धि की गति को आगे बनाए रखने में निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार की भी अहम भूमिका रहेगी।

वैसे तो कई क्षेत्रों में निजी निवेश के गति पकड़ने की खबर है, लेकिन इस हफ्ते प्रकाशित भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मासिक बुलेटिन में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नवीनतम आंकड़े निवेश को आकर्षित करने और सहन करने की भारत की क्षमता की एक सचेत तस्वीर पेश करते हैं।

प्रमुख आंकड़े दिखाते हैं कि वित्त वर्ष 2023-24 में भारत में सकल प्रवाह/निवेश करीब 71 अरब डॉलर पर स्थिर था, वहीं शुद्ध एफडीआई (Net FDI) एक साल पहले के 28 अरब डॉलर से घटकर 10.6 अरब डॉलर हो गया। इसकी बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की उच्च स्तर की निकासी या धन वापसी रही, जो कि मध्यम अवधि की वृद्धि संभावनों के लिए चिंता पैदा करती है।

दूसरी तरफ, भारत द्वारा किया जाने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वर्ष 2022-23 के 14 अरब डॉलर से बढ़कर पिछले वित्त वर्ष में करीब 16 अरब डॉलर हो गया, जिसकी वजह समझी जा सकती है। असल में भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में कुछ कंपनियों को विदेश में अवसर मिलना स्वाभाविक है।

लेकिन मौजूदा विदेशी निवेशकों की बढ़ती निकासी और विनिवेश चिंता की बात है और इस पर नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2023-24 में विदेशी निवेशकों ने 44 अरब डॉलर से ज्यादा राशि वापस भेजी है, जो कि इसके पिछले साल की निकासी के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा है।

यहां यह गौर करना अहम होगा कि धन वापसी में लगातार बढ़त हो रही है। जैसा कि हाल में आई रिपोर्ट में रेखांकित गया है। साल 2014 के बाद कुछ साल तक धन वापसी का हिस्सा घटा, लेकिन साल 2016-17 से रुख बदल गया। वैसे तो सकल एफडीआई में लगातार बढ़त हो रही है, लेकिन धन वापसी का हिस्सा बढ़कर करीब 30 फीसदी हो गया है, जबकि वर्ष 2015-16 में यह करीब 19 फीसदी था।

महामारी के दौरान इसमें गिरावट आई, लेकिन इसके बाद यह फिर बढ़ने लगा। पिछले वित्त वर्ष में यह सकल एफडीआई के 60 फीसदी से ज्यादा था। यही नहीं, भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में कुछ मंथन की उम्मीद करना स्वाभाविक है। कुछ मौजूदा निवेशक बाहर जाएंगे और कुछ नए निवेशक आएंगे।

शेयरधारकों को लाभांश वितरण की वजह से भी धन बाहर जाता है। लेकिन धन वापसी और विनिवेश का जो स्तर देखा जा रहा है, खासकर पिछले वित्तीय वर्ष में, वह चिंता पैदा करता है और नीति-नियंताओं को इसे ठीक से समझना चाहिए। अगर समय के साथ एफडीआई का पैमाना बढ़ता रहा तो इससे भारत को मदद मिलेगी। यह देश की उत्पादक क्षमता बढ़ाएगा और वृद्धि की संभावनाओं को बेहतर करेगा।

एफडीआई का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि विदेशी निवेशक तकनीकी विशेषज्ञता भी लाते हैं, जो समय के साथ व्यापक अर्थव्यवस्था में मदद करती है। अगर वृहद आर्थिक प्रबंधन के लिहाज से देखें तो भारत लगातार चालू खाते के घाटे से जूझ रहा है और इसे विदेशी बचतों को हासिल करने की जरूरत है, इसलिए एफडीआई भारत में विदेशी फंडिंग के सबसे टिकाऊ स्रोत के रूप में काम करता है।

अगर धन वापसी और विनिवेश कारोबार में कठिनाई की वजह से हो रहा है तो आखिरकार यह एफडीआई के सकल प्रवाह को प्रभावित करेगा। किसी भी मामले में आर्थिक और भू-राजनीतिक कारकों, दोनों वजहों से वैश्विक वातावरण चुनौतीपूर्ण है। इसलिए भारत का उद्देश्य यह होना चाहिए कि कारोबारी सुगमता को लगातार बेहतर किया जाए।

भारत के बढ़े आकर्षण से न केवल देश में ज्यादा एफडीआई लाने में मदद मिलेगी, बल्कि यह विदेशी कंपनियों और निवेशकों को इस बात के लिए भी प्रोत्साहित करेगा कि वे भारत से हुई कमाई को फिर भारत में ही निवेश कर दें।

कारोबारी माहौल में सुधार उन घरेलू निवेशकों को भी बड़े पैमाने पर निवेश शुरू करने के लिए प्रेरित कर सकता है जो अभी किनारे बैठे हुए हैं।

First Published - May 24, 2024 | 9:56 PM IST

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