दिल्ली सरकार ने अगले साल संशोधित इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति लागू करने का निर्णय लिया है। यह स्वच्छ परिवहन में हुई प्रगति और वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केवल ईवी पर निर्भर रहने की संरचनात्मक सीमा को रेखांकित करता है। शहर की पहली ईवी नीति को वर्ष 2020 में अधिसूचित किया गया था। उसमें यह महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि 2024 तक सभी नए वाहन पंजीकरणों में से 25 फीसदी इलेक्ट्रिक होने चाहिए। लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।
रिपोर्टों से पता चलता है कि शहर में ईवी की संख्या 12 फीसदी से अधिक हो गई है, लेकिन इससे सर्दी में दिल्ली की वायु गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। यह नीति के डिजाइन और कार्यान्वयन में चुनौतियों को दर्शाता है। आगामी ईवी नीति में पुराने वाहनों को स्क्रैप करने के साथ वित्तीय प्रोत्साहन को जोड़कर, मोहल्ले स्तर पर चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार कर तथा रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क में छूट जारी रखकर इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया है।
पेट्रोल-डीजल वाहन और इलेक्ट्रिक वाहन के बीच कीमत का अंतर कम करने के उद्देश्य से दी जाने वाली सब्सिडी और बैटरी स्वैपिंग विकल्प का नए ढांचे का मुख्य आधार बनने की उम्मीद है। यह क्रय-सब्सिडी के संकीर्ण दृष्टिकोण से हटकर अधिक कारगर हस्तक्षेप की ओर एक बदलाव का संकेत देता है।
दिल्ली का अब तक का अनुभव बताता है कि केवल प्रोत्साहन से ही स्वच्छ हवा नहीं मिल सकती। इन्हें प्रदूषण नियंत्रण के परिणामों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का उपयोग दोपहिया और तिपहिया वाहनों में अधिक केंद्रित रहा है, जो पहले से ही अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन करते हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के लगभग 37 फीसदी वाहन बीएस-III या उससे पुराने इंजनों पर चलते हैं। परिणामस्वरूप, परिवहन प्रणाली में ईवी को शामिल तो कर लिया गया, लेकिन सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को उसी अनुपात में हटाया नहीं गया। पुराने वाहनों को हटाने में यह विफलता विशेष रूप से चिंताजनक है।
यह मुद्दा हाल ही में तब और भी स्पष्ट हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार पर पुराने वाहनों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल बीएस-IV और उससे ऊपर के इंजन वाले वाहनों को ही कार्रवाई से छूट दी जाएगी, जिससे 10 साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों पर पहले के आदेश से उत्पन्न अस्पष्टता दूर हो गई। अदालत का स्पष्टीकरण इस बात के सबूतों के आधार पर आया है कि बीएस-II और -III श्रेणी के वाहन, जो आमतौर पर इसी आयु वर्ग में आते हैं, दिल्ली में सर्दी की धुंध में बड़े पैमाने पर योगदान करते हैं। वाहनों को नष्ट करने के लिए विश्वसनीय और निरंतर प्रवर्तन के बिना प्रदूषण के लिहाज से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने से होने वाले लाभ नगण्य ही रहेंगे।
यह समझना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि दिल्ली, एनसीआर के साझा वायु क्षेत्र का हिस्सा है। केवल दिल्ली के लिए बनाई गई नीतियां सीमित लाभ ही दे सकती हैं। इस संदर्भ में पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश ने इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइब्रिड वाहनों पर अधिक आक्रामक नीति अपनाई है, जिसमें कर छूट, सीधी खरीद के लिए प्रोत्साहन और चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए सब्सिडी शामिल हैं। इससे इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने और चार्जिंग नेटवर्क के विस्तार दोनों में तेजी आई है, जिससे पूरे एनसीआर में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
दिल्ली की नीति एक स्वतंत्र हस्तक्षेप के रूप में काम करने के बजाय ऐसे क्षेत्रीय प्रयासों के साथ तालमेल बिठाकर अधिक प्रभावी होगी। संशोधित इलेक्ट्रिक वाहन नीति के परिणामस्वरूप सब्सिडी का स्वरूप महत्त्वपूर्ण होगा। प्रोत्साहन लक्षित, समयबद्ध और प्रदूषण कम करने से स्पष्ट रूप से जुड़े होने चाहिए। उच्च माइलेज वाले वाणिज्यिक बेड़े, सार्वजनिक परिवहन और पुराने डीजल वाहनों के प्रतिस्थापन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जहां प्रति रुपये खर्च पर उत्सर्जन में कमी सबसे अधिक है।
इसके अलावा प्रदूषण रोकने के लिए हतोत्साहित करने के कड़े उपाय करने आवश्यक हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि साफ-सुथरे वाहन गंदे वाहनों की जगह लें, न कि उनके साथ-साथ चलाए जाएं। इन उपायों में पेट्रोल-डीजल इंजन पर चलने वाले वाहनों के लिए पंजीकरण शुल्क, कंजेशन प्राइसिंग यानी भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने के लिए शुल्क या प्रदूषण फैलाने वाली बहुत पुरानी कारों से जुड़े ‘एंड ऑफ लाइफ’ नियमों को सख्ती से लागू करना शामिल है।