Flexi-Cap Funds: साल 2025 में इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीम्स के बीच फ्लेक्सी-कैप फंड्स के एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के आंकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक फ्लेक्सी-कैप फंड्स का AUM 26 फीसदी बढ़कर 5.52 लाख करोड़ रुपये हो गया। एक साल पहले यानी 31 दिसंबर 2024 को यह 4.38 लाख करोड़ रुपये था।
साल 2025 में बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। जहां लार्ज-कैप सेगमेंट में बढ़त रही और मिड-कैप अपेक्षाकृत स्थिर रहे। वहीं, स्मॉल-कैप के साथ-साथ सेक्टोरल और थीमेटिक फंड्स में तेज गिरावट दर्ज की गई। FundsIndia में रिसर्च के सीनियर मैनेजर जिरल मेहता कहते हैं, “लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों के बीच वैल्यूएशन में अंतर था। ऐसे रेंज-बाउंड और उतार-चढ़ाव वाले बाजार में फ्लेक्सी-कैप फंड्स की लचीलापन निवेशकों को पसंद आया। इसी वजह से निवेशकों का रुझान इन फंड्स की ओर बढ़ा।”
इन्क्रेड मनी में म्युचुअल फंड्स के सीईओ नितिन अग्रवाल भी इस राय से सहमत हैं। उनका कहना है, “बदलते बाजार हालात को प्रभावी ढंग से संभाल सकने वाले पेशेवर फंड मैनेजरों की तलाश में निवेशकों के लिए फ्लेक्सी-कैप फंड्स आकर्षक विकल्प बनकर उभरे।”
2025 की शुरुआत में लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों की तुलना में ज्यादा आकर्षक नजर आ रहे थे। एडलवाइस म्युचुअल फंड में इक्विटी के प्रेसिडेंट और चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर त्रिदीप भट्टाचार्य के अनुसार, “उस समय फ्लेक्सी-कैप फंड्स में मजबूत निवेश आया, क्योंकि ये फंड मुख्य रूप से लार्ज-कैप शेयरों पर फोक्स्ड थे और लार्ज-कैप के वैल्यूएशन लंबे समय के औसत के मुकाबले सही थे।”
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इस कैटेगरी की सबसे बड़ी खासियत इसका लचीलापन है। मेहता के मुताबिक, “फ्लेक्सी-कैप फंड्स फंड मैनेजरों को अलग-अलग मार्केट-कैप में जरूरत के हिसाब से निवेश करने की आजादी देते हैं, जिससे मौके भी पकड़े जा सकते हैं और जोखिम भी फैलाया जा सकता है।”
अलग-अलग बाजार चक्रों में लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप सेगमेंट का प्रदर्शन अलग-अलग रहता है। अग्रवाल कहते हैं, “फ्लेक्सी-कैप फंड्स निवेश का अनुपात बदलकर इन चक्रों को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं, जो तय एलोकेशन वाले फंड्स के लिए संभव नहीं होता।” इसके अलावा, इनके फंड मैनेजर अलग-अलग मार्केट-कैप में गलत प्राइसिंग का भी फायदा उठा सकते हैं।
भट्टाचार्य का कहना है कि यही लचीलापन आम तौर पर फ्लेक्सी-कैप फंड्स को केवल मिड- या स्मॉल-कैप फंड्स की तुलना में कम जोखिम वाला बनाती है।
फ्लेक्सी-कैप फंड्स पोर्टफोलियो मैनेजमेंट को भी आसान बनाते हैं। अग्रवाल के अनुसार, “जो निवेशक कई फंड्स को मैनेज करना जटिल मानते हैं, उनके लिए एक अच्छा फ्लेक्सी-कैप फंड पूरी इक्विटी जरूरतों का समाधान बन सकता है और अलग-अलग मार्केट-कैप के बीच बार-बार रीबैलेंसिंग की जरूरत को कम कर सकता है।”
कुछ फ्लेक्सी-कैप फंड्स के नियम विदेशी बाजारों में निवेश की भी अनुमति देते हैं। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन के मुताबिक, “इस तरह का भौगोलिक विविधीकरण (geographic diversification) उन वर्षों में प्रदर्शन को सहारा दे सकता है, जब भारतीय शेयर बाजार कमजोर रहता है।”
इसके अलावा, ये फंड टैक्स के लिहाज से भी फायदेमंद होते हैं। धवन कहते हैं, “जब पोर्टफोलियो के भीतर एक सब-एसेट क्लास से दूसरे में पैसा शिफ्ट किया जाता है, तो निवेशक पर कोई टैक्स असर नहीं पड़ता।”
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फ्लेक्सी-कैप फंड्स का प्रदर्शन काफी हद तक फंड मैनेजर के फैसलों पर निर्भर करता है। अग्रवाल के अनुसार, “मैनेजमेंट में बदलाव या एसेट एलोकेशन के गलत फैसले रिटर्न को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इंडेक्स फंड्स के मुकाबले इनमें एक्टिव मैनेजमेंट का जोखिम ज्यादा होता है।”
अगर किसी एक सेगमेंट में तेजी आती है और फंड का उसमें पर्याप्त निवेश नहीं होता, तो फंड का प्रदर्शन कमजोर रह सकता है। कई फ्लेक्सी-कैप फंड अभी भी लार्ज-कैप पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। भट्टाचार्य के मुताबिक, “ज्यादा जोखिम लेने वाले (रिस्क-ऑन) बाजार के दौर में ये फंड मिड और स्मॉल-कैप फंड्स से पीछे रह सकते हैं, क्योंकि आक्रामक तेजी का फायदा इन सेगमेंट्स को ज्यादा मिलता है।”
जो निवेशक लंबे समय में ज्यादा रिटर्न के लिए मिड और स्मॉल-कैप में ज्यादा निवेश चाहते हैं, उन्हें फ्लेक्सी-कैप फंड्स का लार्ज-कैप झुकाव कम आकर्षक लग सकता है।
दूसरी ओर, जरूरत से ज्यादा आक्रामक एलोकेशन जोखिम बढ़ा देता है। मेहता के मुताबिक, “अगर फंड का झुकाव मिड या स्मॉल-कैप की ओर ज्यादा हो, तो बाजार में करेक्शन के दौरान लार्ज-कैप फंड्स की तुलना में उतार-चढ़ाव और गिरावट का जोखिम ज्यादा हो जाता है।”
धवन का कहना है कि गलत शेयर चुनना या पोर्टफोलियो में शेयरों को गलत वेटेज देने की वजह से भी ऐसे फंड्स का प्रदर्शन कमजोर रह सकता है।
इसके अलावा, स्टाइल ड्रिफ्ट भी एक चिंता का विषय है। अग्रवाल के अनुसार, “कोई फंड जो पहले ग्रोथ शेयरों पर ज्यादा ध्यान देता था, वह बाद में वैल्यू स्टाइल की ओर शिफ्ट हो सकता है या इसका उलटा भी हो सकता है, जिससे वह निवेशकों की उम्मीदों के अनुरूप न रहे।”
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फ्लेक्सी-कैप फंड्स उन नए निवेशकों के लिए बेहतर हैं, जो एक ही फंड के जरिए पूरे बाजार में निवेश करना चाहते हैं। ये उन निवेशकों के लिए भी सही विकल्प हो सकते हैं, जिनके पास कई स्कीम्स को मैनेज करने और बार-बार रीबैलेंस करने का समय या अनुभव नहीं है।
मेहता के अनुसार, “फ्लेक्सी-कैप फंड्स मध्यम से उच्च जोखिम लेने की क्षमता वाले और कम से कम पांच साल या उससे ज्यादा की अवधि के नजरिए से निवेश करने वाले निवेशकों के लिए सबसे बेहतर हैं, जो लचीले तरीके से डायवर्सिफिकेशन चाहते हैं।”
वहीं, ज्यादा अनुभवी निवेशक अलग रणनीति अपनाना पसंद कर सकते हैं। भट्टाचार्य कहते हैं, “जिन अनुभवी निवेशकों को एसेट एलोकेशन और जोखिम को लेकर बेहतर समझ होती है, वे लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप फंड्स में अलग-अलग निवेश करना ज्यादा बेहतर मान सकते हैं।”
धवन का कहना है कि ऐसे निवेशक अक्सर मार्केट-कैप में निवेश का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में रखना चाहते हैं। वे कहते हैं, “कुछ समय ऐसे हो सकते हैं जब वे मिड और स्मॉल-कैप में 50, 60 या 70 फीसदी तक निवेश करना चाहें। फ्लेक्सी-कैप फंड्स में इतनी लचीलापन उपलब्ध नहीं होता।”
निवेशक का लाइफ-स्टेज भी अहम होता है। अग्रवाल के अनुसार, “रिटायरमेंट के करीब पहुंच रहे सतर्क निवेशक लार्ज-कैप की स्थिरता को तरजीह दे सकते हैं, जबकि युवा प्रोफेशनल्स ज्यादा ग्रोथ के लिए मिड और स्मॉल-कैप में अधिक निवेश करना चाह सकते हैं।” ऐसे निवेशकों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कई फंड्स रखने पर टैक्स से जुड़ा असर पड़ सकता है।
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चूंकि फ्लेक्सी-कैप फंड्स के नियम लचीले होते हैं, इसलिए निवेश प्रक्रिया की स्थिरता बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। फंड मैनेजर का प्रदर्शन अलग-अलग बाजार चक्रों में देखें। भट्टाचार्य के अनुसार, “निवेशकों को यह जांचना चाहिए कि फंड मैनेजर अलग-अलग चक्रों में निवेश का अनुपात संभालने में कितनी मजबूत और भरोसेमंद प्रक्रिया अपनाता है।”
निवेशक को पोर्टफोलियो की एकाग्रता (portfolio concentration), सेक्टर एक्सपोजर और पुराने मार्केट-कैप एलोकेशन का भी अध्ययन करना चाहिए, ताकि यह देखा जा सके कि यह उनके जोखिम उठाने की क्षमता से मेल खाता है या नहीं। एक्सपेंस रेशियो और पोर्टफोलियो टर्नओवर फंड की लागत और ट्रेडिंग अनुशासन के बारे में जानकारी देते हैं।
स्टाइल की स्थिरता भी महत्वपूर्ण है। धवन के अनुसार, “यह समझना जरूरी है कि फंड मैनेजर ग्रोथ, वैल्यू या ब्लेंड अप्रोच अपनाता है और क्या यह निवेशक की अपनी पसंद के अनुसार है।”
इक्विटी में निवेश समय मांगता है, और फ्लेक्सी-कैप फंड्स इसका अपवाद नहीं हैं। कम समय के लिए निवेश करने पर समय से जुड़ा जोखिम (timing risk) बढ़ जाता है, खासकर उतार-चढ़ाव वाले बाजार में। धवन के अनुसार, “फ्लेक्सी-कैप फंड्स के लिए निवेश की न्यूनतम अवधि पांच से सात साल होनी चाहिए।”
ये फंड अक्सर किसी इक्विटी पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा होते हैं। जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर, ये कुल इक्विटी निवेश का 30 से 40 फीसदी हिस्सा हो सकते हैं।
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फ्लेक्सी-कैप फंड्स ने पिछले साल लगभग 6.7 फीसदी रिटर्न दिया। केवल इसे देखकर पोर्टफोलियो निर्णय नहीं लेना चाहिए।
भट्टाचार्य के अनुसार, “फ्लेक्सी-कैप फंड्स का मूल्यांकन सिर्फ एक साल के प्रदर्शन से नहीं किया जा सकता। निवेशकों को पूरे मार्केट साइकिल में प्रदर्शन देखना चाहिए।”
शॉर्ट टर्म में कमजोर प्रदर्शन पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय, निवेशकों को यह जांचना चाहिए कि क्या फंड की निवेश रणनीति अभी भी सही और बरकरार है।