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दूसरे चरण के लोन पर कम प्रावधान चाहें बैंक, RBI ने न्यूनतम सीमा 5 फीसदी निर्धारित की

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दूसरे चरण के तहत रखे गए ऋण में कुछ एसआईसीआर दिखती है लेकिन उसे ऋण का नुकसान नहीं माना जाता है। तीसरे चरण के तहत ऋण नुकसान को स्पष्ट तौर पर माना जाता है

Last Updated- November 11, 2025 | 11:05 PM IST
Banks

वा​णि​ज्यिक बैंक ऋण नुकसान प्रावधान के लिए पिछले महीने जारी अनुमानित ऋण नुकसान (ईसीएल) के मसौदा ढांचे के तहत दूसरे चरण के ऋण के लिए आवश्यक प्रावधान की सीमा को कम करने के लिए नियामक से अनुरोध करेंगे।

दूसरे चरण के अधिकतर ऋण विशेष उल्लेख खाता 1 या 2 (एसएमए1/ एसएमए2) के अंतर्गत आते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण वितरण के लिए प्रावधान की न्यूनतम सीमा 5 फीसदी निर्धारित की है। आम तौर पर बैंक फिलहाल प्रावधान में 0.40 फीसदी रकम रखते हैं।

एक बड़े सरकारी बैंक के वरिष्ठ बैंकर के अनुसार, अगर 5 फीसदी प्रावधान वाले मसौदा प्रस्ताव को लागू किया जाता है तो प्रावधान का बोझ काफी बढ़ जाएगा। विकसित अर्थव्यवस्थाओं सहित दुनिया के तमाम देशों में दूसरे चरण के ऋण के लिए प्रावधान की तय सीमा नहीं है और अगर है भी तो इतनी अधिक नहीं है।

बैंक यह भी अनुरोध करेंगे कि तीसरे चरण में पहुंच चुके ऋण के बकाये का भुगतान होने के बाद उसे तुरंत पहले चरण में रखा जाए ताकि अतिरिक्त प्रावधान वापस हो सके। रिजर्व बैंक ने ऋण के नियमित होने के बाद उसे पहले चरण के तहत लाने से पहले दूसरे चरण में छह महीने की अवधि तक रखने का प्रस्ताव दिया है।

बैंक इस मामले में जल्द ही आरबीआई के समक्ष एक प्रस्तुति देने की योजना बना रहे हैं। मसौदा ईसीएल फ्रेमवर्क पर 30 नवंबर तक राय अथवा सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।

ऋण जोखिम में महत्त्वपूर्ण वृद्धि (एसआईसीआर) को निर्धारित करने के लिए मसौदे में तीन चरण प्रस्तावित किए गए हैं। जब किसी साधन में कोई एसआईसीआर नहीं होती है तो उसे पहले चरण के तहत रखा जाता है क्योंकि इसमें उधारी संबंधी जोखिम भी कम होती है।

दूसरे चरण के तहत रखे गए ऋण में कुछ एसआईसीआर दिखती है लेकिन उसे ऋण का नुकसान नहीं माना जाता है। तीसरे चरण के तहत ऋण नुकसान को स्पष्ट तौर पर माना जाता है।

ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर जतिन कालरा ने कहा, ‘जहां तक दूसरे चरण के ऋण का सवाल है तो उसके अधिकतर पोर्टफोलियो के लिए प्रावधान की सीमा 5 फीसदी पर अधिक है। यह ज्यादातर एसएमए1 और एसएमए2 श्रेणी के ऋण के लिए आवश्यक 0.4 फसदी की मौजूदा सीमा से काफी अधिक है। इसलिए दूसरे चरण के ऋण पर ईसीएल के कारण प्रावधान काफी अधिक होगा। मगर यह उचित भी है क्योंकि ऐसे ऋण पर जोखिम भी काफी बढ़ जाता है।’

पहले चरण में प्रावधान का बोझ कम नहीं हो सकता है और दूसरे चरण में वह काफी बढ़ जाता है। ऐसे में अधिकतर बैंकों के लिए प्रावधान संबंधी जरूरतें जाहिर तौर पर बढ़ जाएंगी।

कालरा ने कहा, ‘प्रस्तावित सीमा वैश्विक स्तर पर प्रचलित ईसीएल से अलग हो सकती है क्योंकि आम तौर पर अन्य देशों में इतनी अधिक सीमा नहीं होती है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, यूएई आदि अधिकतर देशों में कोई न्यूनतम सीमा नहीं है। उन्होंने कहा कि ईसीएल में बैंकों को ऋण जोखिम पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देना होता है। दबाव बढ़ने पर प्रावधान भी बढ़ जाता है।

मसौदा प्रावधानों के तहत 1 अप्रैल 2027 से ईसीएल फ्रेमवर्क को अपनाने का प्रस्ताव रखा गया है। बैंकों को अपनी मौजूदा बहीखाते के लिए अतिरिक्त प्रावधान के लिए 4 साल मिलेंगे।

ईवाई इंडिया के पार्टनर (वित्तीय सेवा जोखिम परामर्श) ध्रुव पारिख ने कहा, ‘दूसरे चरण की परिसंपत्तियों पर 5 फीसदी ईसीएल की सीमा रखने का उद्देश्य प्रावधान करने में बेहतर अनुशासन एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।’

पारिख ने कहा, ‘हालांकि इससे प्रावधान का स्तर बढ़ जाएगा। ऐसा खास तौर पर उन बैंकों के मामले में दिखेगा जिनके पास अधिक दबावग्रस्त ऋण है। मगर यह संस्थानों को अपने ऋण, जोखिम और पूंजी संबंधी रणनीति में तालमेल बिठाने के लिए भी मजबूर करता है।’

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First Published - November 11, 2025 | 10:59 PM IST

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