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आईटी के लिए कठिन समय

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Last Updated- December 11, 2022 | 5:15 PM IST

रुपये में चली आ रही गिरावट के बीच क्या आईटी उद्योग अपनी विदेशी आय कायम रख पाएगा? या फिर बढ़ती लागत, कुशल कर्मियों की कमी तथा संभावित वैश्विक मंदी का मिलाजुला परिणाम वृद्धि में गिरावट के रूप में सामने आएगा? पहली तिमाही के नतीजे और साथ ही प्रबंधन के अनुमानों से संकेत मिलता है कि मार्जिन में कमी आएगी। कंपनियां सौदे हासिल करने को लेकर आश्वस्त हैं लेकिन उन सभी ने मार्जिन पर दबाव बढ़ने की बात भी कही है। निफ्टी आईटी सूचकांक में जनवरी 2022 के बाद से 30 फीसदी की गिरावट आई है जो निफ्टी में आई छह फीसदी की गिरावट से काफी ज्यादा है। इससे पहले की अवधि में जब भी रुपया दबाव में होता था तब आईटी उद्योग निवेशकों के लिए बहुत लाभदायक साबित होता था क्योंकि उसकी आय डॉलर में होती जबकि श्रम लागत रुपये में होती।
ताजा परिणाम यही संकेत देते हैं कि मार्जिन पर दबाव है और मांग में सहजता आ रही है क्योंकि विदेशी ग्राहक आईटी पर विवेकाधीन व्यय में कटौती कर रहे हैं। आईटी क्षेत्र की चार बड़ी कंपनियों पर नजर डालते हैं। इन्फोसिस का रुपये में मुनाफा सालाना आधार पर केवल तीन फीसदी बढ़ा जबकि उसके राजस्व में 24 प्रतिशत का इजाफा हुआ। कंपनी के परिचालन मुनाफा मार्जिन में 3.5 फीसदी की कमी आई। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज का परिचालन मुनाफा मार्जिन 2.5 फीसदी कम हुआ जबकि  विप्रो का परिचालन मुनाफा मार्जिन चार वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया जबकि एचसीएल टेक्नॉलाजीज का मार्जिन भी कई वर्षों के न्यूनतम स्तर पर रहा। छोटी आईटी कंपनियों के भी मार्जिन में कमी और मुनाफे में ठहराव का ऐसा ही रुझान देखने को मिला। उदाहरण के लिए टेक महिंद्रा के परिचालन मुनाफा मार्जिन में 2.25 फीसदी की कमी आई। यह समूचा क्षेत्र नकारात्मक रुझानों से त्रस्त है। कर्मचारी लागत बढ़ रही है, ऑफिस का किराया बढ़ रहा है, यात्रा की लागत में इजाफा हो रहा है। बड़ी कंपनियों में लोगों के काम छोड़कर जाने की दर 20 फीसदी से अधिक है। तमाम प्रमाण यह बताते हैं कि भारत की यूनिकॉर्न कंपनियां भी उन्हीं प्रतिभाओं को काम पर रखने की होड़ में हैं तथा स्टार्टअप की जरूरतों के चलते छोटे उपक्रमों को काम के उप ठेके देने की दर भी बढ़ी है।
इसके साथ ही विदेशी क्लाइंट भी कॉर्पोरेट आईटी बजट का पुनर्परीक्षण कर रहे हैं तथा अनिवार्य व्यय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वे रुपये तथा डॉलर के रुझान से अच्छी तरह वाकिफ हैं इसलिए वे डॉलर की कम दरों के लिए भी बातचीत कर रहे हैं। यानी लागत में इजाफे के बीच भी राजस्व में कमी आ रही है। पश्चिमी यूरोप जहां मंदी की ओर जाता दिख रहा है, वहीं यह भी संभव है कि उत्तरी अमेरिका में भी आर्थिक धीमापन आए। निश्चित रूप से अधिकांश कंपनियां नए अनुबंधों को लेकर अपनी कारोबारी गति को सही ढंग से बरकरार रखने को लेकर आशान्वित हैं। दिलचस्प बात है कि कुछ विश्लेषक यूरोपीय संघ से राजस्व बढ़ने की संभावना को मंदी जैसी परिस्थितियों से जोड़कर देखते हैं। पश्चिमी यूरोप लगातार आउटसोर्सिंग करने तथा लागत कम करने के रास्ते तलाश कर रहा है। इस संभावना के अलावा दुनिया भर के क्लाइंट क्लाउड, पूरी तरह डिजिटलीकृत सेवाओं, एनालिटिक्स, कृत्रिम मेधा और मेटावर्स से संबंधित परियोजनाओं का रुख करना जारी रखेंगे क्योंकि यह सब ढांचागत कारकों से संचालित है। परंतु निकट भविष्य में ध्यान लागत कम करने पर केंद्रित रह सकता है।
यहां तक कि दिग्गज वैश्विक डिजिटल कंपनियां मसलन अल्फाबेट और मेटा भी यह बात स्वीकार कर रही हैं कि बढ़ते मूल्यांकन के कारण वे दबाव में हैं। बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र के क्लाइंट भी कमर कस रहे हैं क्योंकि उन्हें ऊंची नीतिगत दरों का सामना करना पड़ रहा है जबकि दुनिया में हर जगह विनिर्माण आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं का शिकार है तथा मुद्रास्फीति के कारण उपभोक्ता मांग भी कम बनी हुई है। बाजार में इस पैमाने पर आ रही गिरावट एक संकेतक है। इस बात पर आम सहमति नजर आती है कि निकट भविष्य में आईटी राजस्व और मुनाफा प्रभावित हो सकता है। उद्योग जगत को जहां दीर्घावधि की ढांचागत मांग का लाभ लेना चाहिए, वहीं प्रतिभाओं की कमी और वैश्विक स्तर पर मंदी का माहौल मुनाफे को प्रभावित करेगा।

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First Published - July 28, 2022 | 12:53 AM IST

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