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Editorial: शहरी निकायों को रिकॉर्ड फंडिंग, लेकिन संस्थागत सुधार के बिना असर सीमित

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सोलहवें वित्त आयोग ने शहरी स्थानीय निकायों या प्रशासनों (यूएलजी) को राजकोषीय आवंटन बढ़ाया है। उसने यूएलजी के समग्र अनुदान में 130 फीसदी इजाफा किया है

Last Updated- February 20, 2026 | 9:33 PM IST
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सोलहवें वित्त आयोग ने शहरी स्थानीय निकायों या प्रशासनों (यूएलजी) को राजकोषीय आवंटन बढ़ाया है। उसने यूएलजी के समग्र अनुदान में 130 फीसदी इजाफा किया है। पंद्रहवें वित्त आयोग के 1.55 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर यह राशि 2026 से 31 तक की अवधि के लिए 3.56 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है। इसके साथ ही स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले अनुदान में यूएलजी की हिस्सेदारी बढ़ाकर रिकॉर्ड 45 फीसदी कर दी गई है जबकि पहले यह 36 फीसदी थी।

वित्त आयोग के इतिहास में यह सबसे बड़ी शहरी हिस्सेदारी है और यह दर्शाती है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और उसके आर्थिक योगदान को किस प्रकार मान्यता मिल रही है। इसके अलावा उसने शहरी अनुदान का एक अलग ढांचा पेश किया जिसमें 2.32 लाख करोड़ रुपये का बुनियादी अनुदान, 54,032 करोड़ रुपये का प्रदर्शन अनुदान, 56,100 करोड़ रुपये का विशेष अधोसंरचना अनुदान और 10,000 करोड़ रुपये का शहरीकरण प्रीमियम अनुदान शामिल है।

डिजाइन में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव बिना तयशुदा या शर्त वाली निधियों में इजाफा है। इन चार अनुदानों में बिना शर्त घटक करीब 52 फीसदी है जबकि पंद्रहवें वित्त आयोग के तहत यह केवल 21 फीसदी था। बिना शर्त हस्तांतरण का यह उच्च अनुपात शहरी स्थानीय निकायों को स्थानीय रूप से पहचानी गई प्राथमिकताओं पर खर्च करने का लचीलापन देने के लिए है।

शेष अनुदान स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जलापूर्ति और अपशिष्ट जल प्रबंधन जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों से संबंधित हैं। परफॉरमेंस यानी प्रदर्शन अनुदान अच्छे शासन को पुरस्कृत करते हैं जबकि विशेष अधोसंरचना और शहरीकरण का प्रीमियम शहर आधारित अधोसंरचना के अंतर को पाटने में मदद करते हैं और परिणाम आधारित प्रोत्साहन को शामिल करते हैं।

इस वर्ष के केंद्रीय बजट में दूसरे और तीसरी श्रेणी के शहरों के लिए पांच वर्षों में प्रति शहरी आर्थिक क्षेत्र लगभग 5,000 करोड़ रुपये का आवंटन इस बदलाव की पूर्ति कर सकता है, लेकिन केवल तभी जब यह धन सशक्त नगर निकायों के माध्यम से प्रवाहित हो, न कि एक और केंद्रीकृत, योजना-चालित शहरी हस्तक्षेप का हिस्सा बनाकर। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के आधार पर, भारत में 2021-36 अवधि के लिए आवश्यक शहरी पूंजी निवेश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 1.18 फीसदी वार्षिक होगा।

हालांकि, भारत में नगर निकाय राजस्व मुश्किल से जीडीपी का 0.6 फीसदी है, जबकि दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों में यूएलजी स्वयं के स्रोतों से क्रमशः 6 फीसदी और 7.4 फीसदी जीडीपी जुटाते हैं। नगर निकायों काे धन मिलने की कमजोर व्यवस्था को पुरानी शासन-संबंधी समस्याएं और भी जटिल बना देती हैं।

सोलहवें वित्त आयोग ने सुधारों से जुड़ी पात्रता शर्तों को बरकरार रखा है। इनमें समय पर निकायों का चुनाव कराना, अंकेक्षित खातों को प्रकाशित करना, राज्य वित्त आयोगों का गठन करना और ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ प्रस्तुत करना शामिल है। लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से विकेंद्रीकरण अधूरा है। नगर निकाय चुनाव अक्सर टाले जाते हैं।

बृहन्मुंबई महानगर पालिका के चुनाव लगभग चार साल देर से हुए, और बेंगलुरु में 2015 से अब तक कोई नगरीय चुनाव नहीं हुआ है। नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों के अनुसार नगर निकाय चुनावों में औसतन 22 महीने की देरी होती है, जिससे जवाबदेही, वैधता और स्थानीय सरकारों की संवेदनशीलता कमजोर होती है। वित्तीय स्वायत्तता भी उतनी ही सीमित है।

चूंकि नगर निगम मामूली राजस्व पैदा करते हैं, वे राज्य हस्तांतरणों पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनकी परिचालन स्वतंत्रता घटती है और वे राजनीतिक तथा प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन हो जाते हैं। खुद का अपर्याप्त राजस्व, चुनावों में देरी और कमजोर प्रशासनिक क्षमता आदि मिलकर यह दर्शाते हैं कि बड़े अनुदान भी प्रभावी सेवा वितरण या अधोसंरचना विकास में परिवर्तित नहीं हो सकते। सोलहवें वित्त आयोग की सिफारिशें सार्थक हैं लेकिन स्थानीय शासन की संस्थागत नींव को मजबूत करने के प्रयास किए जाने चाहिए।

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First Published - February 20, 2026 | 9:33 PM IST

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