अधिक उपज वाली अनाज की आधुनिक किस्में पारंपरिक देसी फसलों की तुलना में क्या कम पौष्टिक होती हैं? यह एक आम धारणा है जो काफी हद तक सही है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में भी इस धारणा का समर्थन किया गया है। हरित क्रांति के बाद के शुरुआती कुछ दशकों में अधिक उपज वाली फसलों की किस्मों को मुख्य रूप से उपज बढ़ाने के लिए विकसित किया गया था। उस समय अनाज की गुणवत्ता या पोषण तत्त्वों की परवाह नहीं की गई थी। मुख्य उद्देश्य संतुलित पोषण के माध्यम से अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के बजाय खाद्य आपूर्ति बढ़ाकर व्यापक रूप से व्याप्त भूख को मिटाना था।
इसका परिणाम यह हुआ कि प्रचुर मात्रा में अनाज उपलब्ध होने और विश्व के अग्रणी अनाज निर्यातकों में से एक बनने के बावजूद, भारत में कुपोषण और अल्पपोषण की समस्या अभी भी बेहद गंभीर बनी हुई है। वैश्विक भूख सूचकांक 2025 में भारत को 123 देशों में ‘गंभीर भूख’ श्रेणी में 102वां स्थान दिया गया है। इस खराब स्थिति का कारण यह है कि पांच वर्ष से कम आयु के 32.9 फीसदी बच्चे बौनेपन (उम्र के हिसाब से कम कद) और 18.7 फीसदी बच्चे दुर्बलता (ऊंचाई के हिसाब से कम वजन) से ग्रस्त हैं। वयस्कों, विशेषकर महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में भी कुपोषण व्याप्त है। लगभग 12 फीसदी आबादी को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता और लगभग दो-तिहाई लोगों को खाने के लिए स्वस्थ आहार नहीं मिलता।
कृषि वैज्ञानिकों ने पोषण संबंधी पहलू पर हाल के वर्षों में ही ध्यान देना शुरू किया है। फसल उत्पादकों ने अब मुख्य अनाजों की गुणवत्ता और पोषक तत्त्वों में सुधार को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। पारंपरिक तरीके या जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से जैव-संवर्धन वाली फसलें विकसित करने के प्रयास भी जारी हैं। इनमें स्वाभाविक रूप से आयरन, जिंक और विटामिन ए जैसे प्रमुख पोषक तत्त्वों की उच्च मात्रा पाई जाती है।
चावल, गेहूं और मक्के जैसी व्यापक रूप से उपभोग की जाने वाली मुख्य फसलों सहित विभिन्न फसलों की 100 से अधिक उच्च उत्पादकता वाली जैव-संवर्धन किस्में, देश के विभिन्न हिस्सों में खेती के लिए जारी की जा चुकी हैं। उन्हें जिंक, आयरन, विटामिन और प्रोटीन जैसे आवश्यक पोषक तत्त्वों से समृद्ध किया गया है। हालांकि, अभी भी व्यापक रूप से उगाई जाने वाली कई फसलों की किस्में पौष्टिकता के मामले में अपनी पुरानी किस्मों के बराबर नहीं हैं।
फूड साइंस ऐंड न्यूट्रिशन (वॉल्यूम 13, अंक 2) के फरवरी 2025 अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, गेहूं की आधुनिक किस्मों में जिंक, आयरन और मैग्नीशियम जैसे खनिजों की मात्रा, पुरानी किस्मों की तुलना में औसतन 19 से 28 फीसदी कम होती है। इस शोध पत्र में यह भी कहा गया है कि सामान्यतः प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ने के साथ-साथ अनाज की पौष्टिकता कम होती जाती है। रोगों और कीटों के प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता और कम जीवनकाल जैसी विशेषताओं वाली फसलों की किस्में विकसित करते समय अक्सर पोषण संबंधी पहलू को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), पश्चिम बंगाल के विधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय और हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई एक अन्य रिपोर्ट में भी लगभग इसी तरह के विचार व्यक्त किए गए हैं। इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने में मदद तो की है, लेकिन पोषण सुरक्षा की कीमत पर। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि चावल और गेहूं, जो भारत में लोगों की दैनिक ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 फीसदी से अधिक पूरा करते हैं, पिछले लगभग 50 वर्षों में अपने पोषक तत्त्वों का 45 फीसदी तक खो चुके हैं। यह शोध पत्र 2023 में विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ (लेख संख्या 21164) में प्रकाशित हुआ था।
इस शोधपत्र में एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी यह है कि हरित क्रांति के बाद विकसित की गईं उच्च उपज वाली किस्मों के अनाजों में पोषक तत्त्वों की मात्रा में गिरावट का कारण मिट्टी के बजाय पौधों से जुड़ा है। इन किस्मों के पौधे आम तौर पर मिट्टी से पर्याप्त पोषक तत्त्व ग्रहण करने में असमर्थ होते हैं। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह शोधपत्र यह भी दर्शाता है कि हाल ही में विकसित कुछ फसल किस्मों, विशेष रूप से चावल की किस्मों में आर्सेनिक जैसे कुछ विषैले तत्त्व पाए गए हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
बच्चों में एनीमिया और बौनेपन की उच्च दर का एक मुख्य कारण पॉलिश किए हुए चावल का बढ़ता सेवन है। चावल की पॉलिशिंग की प्रक्रिया में विटामिन, खनिज, फाइबर और फैटी एसिड जैसे कई उपयोगी तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। पॉलिशिंग मुख्य रूप से बाजार में चावल की मांग बढ़ाने के लिए की जाती है। इन महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों की कमी से बच्चों में रुग्णता और मृत्यु दर भी अधिक होती है।
सौभाग्य से, फसलों में पोषक तत्त्वों की कमी की समस्या से निपटने के लिए अब उत्पादन की नई तकनीकें उपलब्ध हैं। जैव संवर्धन के अलावा, जीन-संपादन तकनीक से पोषक तत्त्वों से भरपूर अधिक उपज वाली फसलें विकसित करना भी संभव हो गया है। हालांकि, आईसीएआर और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के फसल उत्पादन कार्यक्रमों में ऐसी तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सहायक नीतियों और पर्याप्त धन की आवश्यकता है।
मूल रूप से, इन संस्थानों के अनुसंधान अवसंरचना और वित्तीय स्थिति को उन्नत करने की आवश्यकता है ताकि वे नई फसल किस्मों के अनाज की पोषक गुणवत्ता में सुधार के लिए उत्पादन की अत्याधुनिक विधियों का उपयोग कर सकें। पोषक तत्त्वों से भरपूर फसल किस्मों के बीजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए बीज कंपनियों और किसानों को इन बीजों का उपयोग करने के लिए उचित प्रोत्साहन भी दिए जाने चाहिए।