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भारत-अमेरिका ट्रेड डील सिर्फ व्यापार नहीं, विकास के लिए भी अहम

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दोनों देशों के बीच इस समझौते के चलते भारत के प्रति अमेरिका का रुख शत्रुतापूर्ण से तटस्थ हो सकता है। हमारी वृद्धि के लिए यह मायने रखता है। बता रहे हैं टीटी राम मोहन

Last Updated- February 19, 2026 | 9:56 PM IST
India-US Trade Deal
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता जिसके लिए अंतरिम करार के एक ढांचे पर सहमति बनी है, उसकी आलोचना करने वाले भी कम नहीं हैं। विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे आत्मसमर्पण करार दिया है। किसान संगठनों ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। कई लोग विस्तृत ब्योरे की प्रतीक्षा में हैं और समझौते को अंतिम रूप मिलने के बाद वे कह सकते हैं कि यह समझौता अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ है।

हमें कुछ बातों को लेकर स्पष्ट होना होगा। पहली बात कोई देश जो ट्रंप प्रशासन के साथ व्यापार वार्ता कर रहा हो उसे यही उम्मीद करनी चाहिए कि समझौता अमेरिका के पक्ष में झुका होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी प्राथमिकता अमेरिका के आर्थिक समीकरणों को दुरुस्त करने की है। वह इसके लिए अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने पर दृढ़ हैं।

विश्व युद्ध के बाद की पूरी अवधि में अमेरिका कई व्यापार साझेदारों को खुशी-खुशी बढ़त दे रहा था। वह मानता रहा है कि आर्थिक रूप से वह काफी मजबूत है। वह मानता था कि समृद्धि को शेष विश्व के साथ साझा करना विश्व शांति में मददगार होगा और दुनिया को वामपंथ से भी बचाए रखेगा।

अब ऐसा नहीं है। ट्रंप साल 2016 में यह कहकर सत्ता में आए कि अब वक्त आ गया है कि व्यापारिक रिश्तों को अमेरिका के हितों के हिसाब से तय किया जाए। वह ऐसा कर नहीं सके क्योंकि उनकी पहलों को उनकी ही कैबिनेट के उन सदस्यों का साथ नहीं मिला जो हालात को जस का तस रखना चाहते थे। अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे। उन्होंने अपने वफादारों को सरकार में शामिल किया जो उनके आदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करें।

गत जुलाई में ट्रंप ने एक पोस्ट में कहा, ‘अमेरिका को व्यापार (और सैन्य मामलों!) में, दशकों से मित्रों और शत्रुओं दोनों द्वारा ठगा गया है। इसकी कीमत खरबों डॉलर रही है, और यह अब और टिकाऊ नहीं है। और कभी था भी नहीं! इसलिए किसी भी व्यापार समझौते में, लाभ अमेरिका का ही होगा।’

दूसरी बात, हमें यह स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि अमेरिका के साथ रिश्ते इस बात पर निर्भर हैं कि ऐसा व्यापार समझौता हो जो अमेरिका को स्वीकार्य हो। यदि व्यापार समझौता नहीं होता है, तो इसका मतलब होगा, हर क्षेत्र में अमेरिकी शत्रुता को आमंत्रित करना। अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत करते समय, हर राष्ट्र के सामने एक विकल्प होता है: वह क्या चाहता है, अमेरिका उसका मित्र बने या शत्रु?

यूरोपीय संघ के साथ ट्रंप का समझौता इसका सटीक उदाहरण है। यूरोपीय संघ के लिए मुद्दा केवल अमेरिकी बाजार तक पहुंच का नहीं था। उसे यूक्रेन विवाद में भी अमेरिका की मदद की आवश्यकता थी। इसके तहत अहम हथियारों और खुफिया जानकारियों के साथ-साथ उत्तर अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो में अमेरिकी सहयोग, सब शामिल था। अमेरिका के साथ रक्षा रिश्तों को बचाने के लिए यूरोपीय संघ ने ऐसी शर्तें स्वीकार कर लीं जो शर्मनाक थीं।

अब यूरोपीय संघ के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 15 फीसदी का शुल्क लगता है। इसके अलावा स्टील, एल्युमीनियम और कॉपर निर्यात पर 50 फीसदी का शुल्क लागू है। कारों का निर्यात कोटा के अधीन है। यूरोपीय संघ ने अगले तीन साल में 750 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद खरीदने की हामी भरी है और वर्ष 2029 तक अमेरिका में 600 अरब डॉलर का निवेश करने का वादा किया है।

यूरोपीय संघ समस्त अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं के आयात पर शुल्क समाप्त करेगा और अमेरिकी समुद्री और कृषि उत्पादों को प्राथमिकता वाली पहुंच देगा। इससे अधिक समर्पण भला क्या होगा? ट्रंप ने ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भी ऐसा ही एकतरफा समझौता किया। ये सभी अमेरिका के सहयोगी रहे हैं।

भारत के लिए सबक यह है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता केवल अमेरिकी बाजार तक पहुंच से संबंधित नहीं है। भारत ने अपने निर्यात पर ट्रंप के 50 फीसदी शुल्क का अपेक्षाकृत बेहतर सामना किया है। भारत का कुल निर्यात इस शुल्क वृद्धि के बावजूद 4.4 फीसदी बढ़ा है। अप्रैल-दिसंबर 2025 में अमेरिका को हमारा निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा है।

भारत के लिए दिक्कत है पूंजी प्रवाह में कमी। यह ऐसे समय हो रहा है जबकि भारत का जीडीपी के 1.3 फीसदी तक का चालू खाता घाटा कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया आदि के अनुरूप ही है। आर्थिक सुधारों के बाद के दौर में भारत के लिए इससे अधिक स्तर के घाटे का प्रबंधन करना भी कोई मुश्किल काम नहीं रहा है। आज हम पर पूंजी की आवक का दबाव है और रुपया भी कमजोर है। यह तब है जबकि आर्थिक संकेतक सकारात्मक हैं। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है।

सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) कैलेंडर वर्ष 2024 में 2 फीसदी गिरा। यह हाल के वर्षों में एफडीआई प्रवाह में सामान्य गिरावट के अनुरूप हो सकता है, लेकिन इस पर ही संतोष नहीं किया जा सकता। उसी समय, भारत से बाहर जाने वाला एफडीआई और भारत में विदेशी कंपनियों द्वारा लाभ की वापसी तेजी से बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप, अप्रैल-नवंबर 2025 में शुद्ध एफडीआई मात्र 5.6 अरब डॉलर रहा। इस समय बड़ी समस्या विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के साथ है।

अप्रैल-दिसंबर 2025 में यह 3.9 अरब डॉलर ऋणात्मक रहा यानी इतनी निकासी हुई। इसके ऋणात्मक होने के कई कारण हो सकते हैं। भारत के प्रति अमेरिकी प्रशासन का रुख एक महत्त्वपूर्ण कारक है। जब भारत पर अमेरिका द्वारा दंडात्मक शुल्क व्यवस्था लागू होती है, तो फंड मैनेजरों के भारत को निवेश के लिए अच्छा स्थान मानने की संभावना कम ही रहेगी। अमेरिकी वित्त मंत्री समेत वित्त विभाग में ऐसे लोग हैं जिनके वॉल स्ट्रीट से मजबूत संबंध हैं। वे विभिन्न मामलों पर फंड मैनेजरों से सीधे संपर्क करने के लिए जाने जाते हैं।

इसलिए, व्यापार समझौते के अभाव में, हमें पूंजी प्रवाह के मामले में कठिन परिस्थितियों का सामना करना होगा, चाहे हमारे व्यापक आर्थिक संकेतक कितने भी अच्छे क्यों न हों। और कौन जानता है कि अमेरिका को सेवाओं के निर्यात भी दंडात्मक कार्रवाई के अधीन न हो जाएं? जोखिम में रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और पिछले दो दशकों में निर्मित संपूर्ण रणनीतिक साझेदारी भी है। इस प्रकार, वर्तमान वर्ष में भारत का मजबूत आर्थिक प्रदर्शन इस बात की गारंटी नहीं है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के अभाव में इसे बनाए रखा जा सकेगा।

भारत-अमेरिका व्यापार करार का मुद्दा यह नहीं है कि इसमें कई जगह झुकना पड़ रहा है, जैसे रूस से तेल आयात कम करना या अगले पांच वर्षों तक अमेरिका से वस्तुओं का आयात सालाना 100 अरब डॉलर तक बढ़ाना। यह केवल 18 फीसदी शुल्क दर पाने का मामला भी नहीं है, जो हमारे कई प्रतिस्पर्धियों से कम है। असली मुद्दा यह है कि यह अमेरिका के भारत के प्रति रुख को शत्रुतापूर्ण से तटस्थ की ओर ले जाता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है।

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First Published - February 19, 2026 | 9:51 PM IST

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