Money Market Funds: सुरक्षित और जरूरत पड़ने पर तुरंत पैसा निकालने की सुविधा देने वाले फिक्स्ड-इनकम विकल्पों की तलाश कर रहे निवेशकों के लिए मनी मार्केट फंड (MMF) एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरे हैं। इन योजनाओं ने पिछले एक साल में 6.97 फीसदी रिटर्न दिया है।
मनी मार्केट फंड एक साल से कम समय में मैच्योर होने वाले मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं। श्रीराम एसेट मैनेजमेंट कंपनी के सीनियर फंड मैनेजर- लीड, फिक्स्ड इनकम अमित मोदानी कहते हैं, “MMF एक तरह का डेट म्युचुअल फंड है। यह बहुत कम अवधि और हाई क्वालिटी वाले फाइनैंशियल इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करता है। ये फंड उन निवेशकों के लिए बनाए गए हैं जो कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों तक के लिए अतिरिक्त पैसा सुरक्षित जगह पर रखना चाहते हैं। इनका लक्ष्य ज्यादा मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि पूंजी की सुरक्षा, तरलता (लिक्विडिटी) और स्थिर रिटर्न देना होता है।
मनी मार्केट फंड्स का आकार भी तेजी से बढ़ा है। एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के आंकड़ों के अनुसार, 31 जनवरी 2025 तक 3.32 लाख करोड़ रुपये के एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) के साथ यह कैटेगरी डेट फंड्स में दूसरी सबसे बड़ी रही। इससे आगे केवल लिक्विड फंड्स हैं, जिनका AUM 5.37 लाख करोड़ रुपये है।
मनी मार्केट फंड बिना ज्यादा ब्याज दर जोखिम लिए उचित आय (अक्रूअल इनकम) दे सकते हैं। एडलवाइस म्युचुअल फंड के हेड और चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर-फिक्स्ड इनकम धवल दलाल के अनुसार, MMF आमतौर पर कमर्शियल पेपर (CP), सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) और ट्रेजरी बिल (T-bills) में निवेश करते हैं। इनकी वेटेड एवरेज मैच्योरिटी 3 से 9 महीने के बीच होती है। ये फंड हाई क्वालिटी वाले और डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो प्रदान करते हैं। फिलहाल 6 से 9 महीने की वेटेड एवरेज मैच्योरिटी वाले MMF सालाना लगभग 7.2 से 7.5 फीसदी तक रिटर्न दे सकते हैं, जबकि रीपो रेट 5.25 फीसदी है। इसका मतलब है कि निवेशकों को ओवरनाइट फंड्स की तुलना में लगभग 200 बेसिस पॉइंट ज्यादा रिटर्न मिल रहा है। कम से कम 3 महीने की निवेश अवधि रखने वाले निवेशकों के लिए यह आकर्षक विकल्प है।”
कॉर्पोरेट ट्रेनर (डेट) और लेखक जॉयदीप सेन कहते हैं, “रीपो रेट की तुलना में अपेक्षाकृत हाई स्प्रेड मनी मार्केट फंड्स के अक्रूअल स्तर को और बेहतर बनाता है।”
कम मैच्योरिटी वाले इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश के कारण, MMF आमतौर पर लंबे अवधि वाले डेट फंड्स की तुलना में ब्याज दरों में बदलाव के प्रति कम संवेदनशील होते हैं।
मोदानी के अनुसार, “चूंकि ये फंड कम मैच्योरिटी वाले इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं, इसलिए इनका ब्याज दर जोखिम कम होता है। ये फंड कंजर्वेटिव निवेशकों, फालतू नकदी मैनेज करने वाले कॉर्पोरेट्स, और आपातकालीन या शॉर्ट टर्म निवेश करना चाहने वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर हैं।
दलाल कहते हैं, “वर्तमान में 1 साल के CDs और 2–3 साल के AAA CPSE बॉन्ड्स के बीच टर्म प्रीमियम काफी सीमित है। ऐसे में हमारा मानना है कि MMF 7 फीसदी से ज्यादा यील्ड, अच्छी लिक्विडिटी और डायवर्सिफिकेशन का बेहतरीन मिक्स प्रदान करते हैं। साथ ही, दो साल से ज्यादा अवधि वाले अन्य फिक्स्ड-इनकम फंड्स की तुलना में इनमें ब्याज दर जोखिम कम है।”
Also Read: PSU Banks पर म्युचुअल फंड्स बुलिश, जनवरी में निवेश 3 साल के हाई पर; SBI को सबसे ज्यादा फायदा
मनी मार्केट फंड्स (MMF) पूरी तरह रिस्क फ्री नहीं हैं। मोदानी के अनुसार, “MMF बाजार से जुड़े प्रोडक्ट हैं और इनमें रिटर्न की गारंटी नहीं होती। इनमें ब्याज दर जोखिम, तरलता जोखिम और क्रेडिट जोखिम शामिल होते हैं। इसके अलावा, फिर से निवेश का जोखिम भी होता है। जब निवेश साधनों की अवधि पूरी हो जाती है, तो फंड मैनेजर को कम ब्याज दर पर दोबारा निवेश करना पड़ सकता है, जिससे भविष्य के रिटर्न घट सकते हैं।”
सेन के अनुसार, “डिफॉल्ट का जोखिम मौजूद रहता है, हालांकि आमतौर पर फंड हाउस अच्छी क्रेडिट क्वालिटी वाले पोर्टफोलियो चलाते हैं। साथ ही, सामान्य डेट फंड्स की तुलना में इनसे रिटर्न की उम्मीद थोड़ी कम होती है। जब डेट बाजार में तेजी होती है, तो अन्य डेट फंड्स MMF से कहीं बेहतर रिटर्न दे सकते हैं।”
MMF कम जोखिम लेने वाले और शॉर्ट से मीडियम अवधि का नजरिया रखने वाले निवेशकों के लिए बेहतर हो सकते हैं।
मोदानी के अनुसार, “MMF उन निवेशकों के लिए सही हैं जो तरलता, पूंजी की सुरक्षा और शॉर्ट टर्म रिस्क-एडजेस्टेड रिटर्न को प्राथमिकता देते हैं। ये कम से मध्यम जोखिम लेने की क्षमता वाले कंजर्वेटिव निवेशकों, थोड़े समय के लिए अतिरिक्त धन रखने वाले निवेशकों, और अस्थायी रूप से बड़ी राशि निवेश करने वाले हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNI) के लिए बेहतर हो सकते हैं।”
6 से 12 महीने की निवेश अवधि रखने वाले निवेशक इन योजनाओं पर विचार कर सकते हैं। उन्हें अपने निवेश की अवधि को फंड की मैच्योरिटी प्रोफाइल के साथ मिलाना चाहिए।
किसी योजना का चयन करते समय निवेशकों को एक्सपेंस रेशियो का ध्यान रखना चाहिए। यह जितना कम हो, उतना बेहतर।
(लेखक गुरुग्राम स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)