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परोपकार की नई मिसाल: 540 अरब डॉलर पहुंचा भारत का दान बाजार, छोटे परिवारों ने भी पेश की नजीर

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एक नए सर्वेक्षण पर आधारित अध्ययन से पता चलता है कि यह न केवल फलफूल रहा है बल्कि खपत और जीडीपी में वृद्धि के साथ  नए मानक छू रहा है

Last Updated- February 20, 2026 | 11:16 PM IST
Rupee
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

देश के अमीर लोग अधिक से अधिक दान कर रहे हैं। नकदी और वस्तुएं दान करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। लेकिन सीमित संसाधनों वाले लोग भी अनौपचारिक माध्यमों के जरिये लगातार दान कर रहे हैं। देश में परोपकार के बाजार का आकार 2023 के 370 अरब डॉलर से बढ़कर 540 अरब डॉलर पहुंच गया है। एक नए सर्वेक्षण पर आधारित अध्ययन से पता चलता है कि यह न केवल फलफूल रहा है बल्कि खपत और जीडीपी में वृद्धि के साथ  नए मानक छू रहा है।

इतना ही नहीं परोपकार केवल कंपनियों और बड़े कारोबारियों की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी यानी सीएसआर से संचालित नहीं होता है बल्कि यह घरों से आने वाले शांत और कभी-कभी गुमनाम किंतु निरंतर दान से भी होता है। ऐसा करने वालों में से कई की मासिक आय तो 8,000 रुपये से भी कम है। अशोक विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सोशल इंपैक्ट ऐंड द फिलैंथ्रॉपी (सीएसआईपी) ने सलाहकार सेवा अर्थ ग्लोबल के साथ मिलकर एक अध्ययन किया है जिसका शीर्षक है ‘हाऊ इंडिया गिव्स : 2025-26’।

यह 19 फरवरी को जारी किया गया। यह सीएसआईपी की तीसरी रिपोर्ट है। इसमें कहा गया है कि पहले की तरह धार्मिक संगठनों और जरूरतमंदों को अनौपचारिक दान भारतीयों के परोपकारी योगदान का सबसे बड़ा हिस्सा बनता है, वहीं अब सामाजिक कारणों के लिए दान देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है जो एक परिपक्व परोपकार बाजार का संकेत है। उत्तर देने वालों में लगभग 68 प्रतिशत किसी न किसी रूप में दान करने की रिपोर्ट करते हैं। इनमें से 48 प्रतिशत दान वस्तु के रूप में है। जैसे भोजन, कपड़े या अन्य घरेलू सामान। 

इसके बाद 44 फीसदी लोग नकद दान करते हैं और 30 फीसदी लोग गैर-लाभकारी संस्थाओं, धार्मिक संस्थानों या सामुदायिक समूहों के साथ स्वेच्छा से काम करते हैं। यहां तक कि 4,000-5,000 रुपये के कम मासिक खपत स्तर वालों में से आधे परिवार भी दान करते हैं।

आय बढ़ने के साथ-साथ प्रतिभागिता का स्तर बढ़कर 70-80 फीसदी पहुंच जाता है।

इस सर्वेक्षण में 20 राज्यों के 7,000 लोगों को शामिल किया गया जिनमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के रहवासी शामिल हैं। इस सर्वेक्षण का आधार राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) का उपभोग डेटा था, जिसने सीएसआईपी सर्वेक्षकों को घरेलू आय, व्यय और उपभोग पर आधारित प्रश्नों का एक सेट तैयार करने में मदद की। इससे रोजमर्रा के दानदाताओं का प्रोफाइल बना। इसके बाद उत्तरदाताओं को प्रोत्साहित किया गया कि वे तीन महीने की अवधि में कितना और कितनी बार दान करते हैं, इसे याद करें।

इस डेटा की गणना करके वार्षिक अनुमान निकाले गए।

सीएसआईपी की प्रमुख जिन्नी उप्पल के अनुसार, ‘भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है और उपभोग हमारी जीडीपी का एक प्रमुख घटक है। जैसे-जैसे घरेलू उपभोग बढ़ता है, रोजमर्रा के दान का यह खंड भी विकसित होने और संभवतः इसके साथ बढ़ने की संभावना है।’ यह सर्वेक्षण रोजमर्रा के दान पर केंद्रित है। इसमें प्रत्यक्ष, व्यक्तिगत मदद उदाहरण के लिए भिखारियों, परिवार या दोस्तों की मदद जिसे अक्सर चैरिटी कहा जाता है, के साथ संगठित गैर धार्मिक संस्थाओं को दिया गया दान शामिल है।

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First Published - February 20, 2026 | 11:16 PM IST

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