विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की महानिदेशक नगोजी ओकोंजो इवेला ने कहा कि बहुपक्षीय संस्थानों के लिए अब ‘यथास्थिति’ कोई विकल्प नहीं है। उनके वक्तव्य से यह स्पष्ट हो गया कि डब्ल्यूटीओ के सुधार इस महीने कैमरून के याउन्दे में होने वाले 14वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन (एमसी-14) के एजेंडे में प्रमुख रूप से रहेंगे। इससे पहले 5 फरवरी से एक महीने की अवधि को डब्ल्यूटीओ सुधार का महीना घोषित किया गया।
उम्मीद है कि एमसी-14 के बाद सदस्य एक ऐसी कार्ययोजना के साथ आएंगे जिससे सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। ध्यान रहे कि यह डब्ल्यूटीओ की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है। इसमें सदस्य देशों के व्यापार मंत्री शामिल हैं और ये हर दो साल में बैठक करते हैं।
डब्ल्यूटीओ सुधारों के तात्कालिक कारणों में से एक है ई-कॉमर्स में इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क लगाने पर रोक। यह स्थगन एमसी-14 के समापन के साथ समाप्त होने वाला है। डब्ल्यूटीओ के अधिकांश सदस्य स्थायी स्थगन की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए पूर्वानुमान लगाने का अवसर देता है।
दूसरा तात्कालिक मुद्दा है निवेश सुगमीकरण विकास समझौते (आईएफडीए) का एकीकरण, जिसे ज्यादातर सदस्य 1994 के माराकेश समझौते के अनुलग्नक 4 के माध्यम से डब्ल्यूटीए की नियम पुस्तिका में चाहते हैं। दोनों मुद्दों पर सफलता प्राप्त करने में एक सामान्य बाधा है बहुपक्षीय समझौतों पर आपत्ति और डब्ल्यूटीओ में सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया।
डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय वार्ताओं के विकल्पों की आवश्यकता तक पहुंचने वाले संदर्भ को रेखांकित करना महत्त्वपूर्ण है। अपने तीन दशक के अस्तित्व में, डब्ल्यूटीओ मुख्यतः पहले हुए समझौतों के क्रियान्वयन से संबंधित मुद्दों से निपटा है और/अथवा दोहा विकास एजेंडा से जुड़े मुद्दों में उलझा रहा है।
विशेष रूप से पिछले दशक में, डब्ल्यूटीओ का कामकाज गंभीर रूप से बाधित हुआ है क्योंकि अमेरिका ने अपील निकाय में नियुक्तियों को बाधित किया और अमेरिका-चीन के द्विपक्षीय व्यापार तनावों के प्रभावों ने स्थिति को और जटिल बना दिया। पिछले 30 वर्षों में, डब्ल्यूटीओ केवल दो समझौतों को सफलतापूर्वक पूरा कर पाया है। एक व्यापार सुविधा पर और दूसरा मछली पालन के लिए दी जाने वाली सब्सिडी पर।
यद्यपि, इस दौरान वैश्विक व्यापार में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वैश्विक मूल्य श्रृंखलाएं (जीवीसी) और हिस्सों व घटकों में व्यापार वैश्विक व्यापार के प्रमुख तंत्र के रूप में उभरे हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी/ज्ञान हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा के बीच अंतर्संबंधों को वैश्विक व्यापार नियमों में पूरक विकास की आवश्यकता है। आदर्श रूप से, डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय वार्ताएं उपयुक्त नए युग के व्यापार प्रावधानों को विकसित करने का साधन होनी चाहिए थीं। लेकिन डब्ल्यूटीओ, बढ़ती सदस्यता के विविध हितों और कठिन परिस्थितियों में फंसा हुआ है और पुराने मुद्दों से आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करता रहा है।
जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स ऐंड ट्रेड (गैट) के अनुच्छेद 24 के तहत मंजूर किए गए मुक्त व्यापार समझौतों को जीवीसी के नेतृत्व वाले व्यापार को बढ़ावा देने वाले वैकल्पिक उपाय के रूप में सफलतापूर्वक अपना लिया गया है। इसके प्रासंगिक प्रावधानों की संख्या और गहराई को निरंतर बढ़ाया गया है। हालांकि, डब्ल्यूटीओ के प्रावधानों के अंतर्गत, इसके कुछ सदस्य देशों द्वारा शुरू किए गए बहुपक्षीय समझौते 21वीं सदी के व्यापार-संबंधी मुद्दों पर समान सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं। जहां एफटीए प्रावधान केवल भाग लेने वाले देशों तक सीमित रहते हैं, वहीं बहुपक्षीय वार्ताओं का परिणाम या समझौता डब्ल्यूटीओ समझौते के अनुलग्नक 4 के माध्यम से डब्ल्यूटीओ की नियम पुस्तिका में शामिल किया जा सकता है।
डब्ल्यूटीओ सदस्यता के एक उपसमूह द्वारा शुरू की गई वार्ताओं (जो सर्वसम्मति पर आधारित नहीं होतीं) के परिणामों को सभी सदस्यों तक विस्तारित करने की संभावना ही बहुपक्षीय समझौतों के प्रति मूल आपत्ति रही है। हालांकि यह समझना आवश्यक है कि शुरुआत सर्वसम्मति-आधारित नहीं होती, लेकिन अनुलग्नक 4 के तहत बहुपक्षीय समझौतों को नियम पुस्तिका में शामिल करने के लिए सभी सदस्यों की सर्वसम्मति आवश्यक होती है। खासतौर पर आईएफडीए के मामले में इसे अनुलग्नक 4 में शामिल करने से संबंधित आपत्ति इसी संभावित असंगति पर आधारित है। भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो आईएफडीए को अनुलग्नक 4 में शामिल करने का विरोध कर रहे हैं।
आईएफडीए का विधिक पाठ एक संयुक्त पहल वक्तव्य के रूप में 2017 में पेश किया गया था जिसे 2023 में पूरा किया गया। इसे डब्ल्यूटीए के 166 सदस्य देशों में से 128 का समर्थन मिला था। इनमें विकसित, विकासशील और सबसे कम विकसित देश सभी शामिल थे। इस समझौते का लक्ष्य है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवक में मदद करना।
निवेश सुविधा से संबंधित उपायों पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है, जैसे पारदर्शिता, प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण और सुव्यवस्थित करना, घरेलू नियामक सामंजस्य में सुधार और सतत निवेश के लिए क्षमता निर्माण। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आईएफडीए में पहुंच या निवेशक संरक्षण पर मौजूदा प्रतिबद्धताओं में किसी भी प्रकार का संशोधन शामिल नहीं है। क्षेत्र-विशिष्ट एफडीआई उदारीकरण से संबंधित प्रावधान इस समझौते के दायरे से बाहर हैं।
इसके अलावा समझौते में एक ‘फायरवॉल प्रावधान’ शामिल है, जिससे आईएफडीए की व्याख्या को किसी देश के अंतरराष्ट्रीय निवेश समझौतों से अलग रखा जा सके और किसी भी दोहराव को रोका जा सके। उल्लेखनीय है कि आईएफडीए गैर-भागीदारों पर कोई बाध्यता नहीं डालता, लेकिन निवेश सुविधा संबंधी सुधारित उपायों के लाभ सभी पर समान रूप से लागू होंगे।
आईएफडीए निस्संदेह अपने विकासात्मक उद्देश्यों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, डब्ल्यूटीए के ढांचे में आईएफडीए को शामिल करने के भी महत्त्वपूर्ण निहितार्थ हैं। वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के इस समय में, संदर्भ-विशिष्ट बहुपक्षीय व्यापार नियमों को विकसित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
भारत के लिए, नियामक अनिश्चितता को कम करके निवेश को सुगम बनाने वाले आईएफडीए उपाय हाल के वर्षों में शुद्ध एफडीआई प्रवाह में गिरावट की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से सहायक हो सकते हैं। इसलिए भारत को आईएफडीए पर अपने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए।
बहुपक्षीय समझौतों के बड़े मुद्दे पर भी भारत को अपने लंबे समय से चले आ रहे कठोर रुख की समीक्षा करनी चाहिए ताकि 21वीं सदी के मुद्दों पर वार्ताओं को आगे बढ़ाया जा सके। भारतीय वार्ताकारों को बहुपक्षीय वार्ता शुरू करने के नियमों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह डब्ल्यूटीओ सदस्यता के एक निर्दिष्ट बहुमत अनुपात या वैश्विक व्यापार के आधार पर हो सकता है।
अनुलग्नक 4 में बहुपक्षीय परिणामों को शामिल करने पर, भारत को अन्य सदस्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर पारदर्शिता, समावेशिता जैसे आवश्यक सुरक्षा उपाय विकसित करने पर काम करना चाहिए।
भारत को डब्ल्यूटीओ में अपनी पुरानी रक्षात्मक व्यापार नीति स्थितियों में उलझे रहना बंद करना चाहिए। एक दूरदर्शी मानसिकता, बहुपक्षीय मंच पर अपनी वार्तालाप के हालात में आवश्यक लचीलेपन के साथ, इसके प्रणालीगत पुनरुद्धार और निरंतर प्रासंगिकता में योगदान करेगी।
(लेखिका जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)