पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है। जैसे-जैसे तनाव बढ़ रहा है, निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी वजह से गुरुवार को सोने की कीमत करीब 5,170 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई और इसमें लगातार तेजी देखने को मिली।
दरअसल अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान की जवाबी मिसाइल हमलों से हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं। यह संघर्ष अब छठे दिन में प्रवेश कर चुका है, जिससे बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। खबरों के अनुसार अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया, हालांकि ईरान ने अमेरिका से बातचीत की खबरों को खारिज कर दिया है।
वेंचुरा के कमोडिटी हेड एन.एस. रामास्वामी के अनुसार इस समय सोने की कीमतों में एक तरह की “खींचतान” चल रही है। एक तरफ भू-राजनीतिक तनाव के कारण सुरक्षित निवेश की मांग तेजी से बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ मजबूत डॉलर और बढ़ते बॉन्ड यील्ड जैसे आर्थिक कारक सोने की तेजी को कम कर रहे हैं।
उनका कहना है कि इतिहास बताता है कि जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती है, तब सोना अक्सर मजबूत बना रहता है, भले ही ब्याज दरें बढ़ रही हों।
रामास्वामी के मुताबिक कई देशों के केंद्रीय बैंक डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए अपने सोने के भंडार लगातार बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका में बढ़ता राजकोषीय घाटा भी लंबे समय में सोने को मजबूत सहारा दे सकता है। उनका मानना है कि 5,000 डॉलर का स्तर सोने के लिए मजबूत आधार बन सकता है। आने वाले समय में सोना 5,100 से 5,200 डॉलर के दायरे में स्थिर रह सकता है और अप्रैल 2026 के बाद इसमें तेजी बढ़कर 5,600 डॉलर से ऊपर तक जा सकती है। हालांकि उन्होंने निवेशकों को सलाह दी कि अमेरिका के 10 साल के बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि ये दोनों कारक सोने की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिख रहा है। तेल और गैस की कीमतों में तेजी से महंगाई बढ़ने की आशंका फिर से मजबूत हो गई है। इससे अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद भी कमजोर पड़ सकती है। अगर महंगाई का दबाव बढ़ता है तो बॉन्ड यील्ड ऊपर जा सकते हैं, जो सोने की कीमतों पर दबाव डालने का काम करते हैं।
तनाव का असर सिर्फ सोने तक सीमित नहीं रहा। सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग के कारण चांदी की कीमत भी करीब 85 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई और लगातार दूसरे दिन तेजी दर्ज की गई। केडिया एडवाइजरी के मुताबिक, कमजोर डॉलर और भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने कीमती धातुओं की मांग को और मजबूत किया है।
इस बीच अमेरिका सरकार ने संकेत दिया है कि जल्द ही 15% वैश्विक टैरिफ लागू किया जा सकता है। इससे भी वैश्विक व्यापार और बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक दुनिया में तनाव और आर्थिक अनिश्चितता बनी रहेगी, तब तक सोना और चांदी जैसे सुरक्षित निवेश निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहेंगे। हालांकि बीच-बीच में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
केडिया एडवाइजरी के अनुसार वैश्विक चांदी बाजार में कमी की स्थिति आगे भी बनी रह सकती है और अनुमान है कि 2026 में भी चांदी का बाजार लगातार छठे साल घाटे में रहेगा, यानी मांग सप्लाई से ज्यादा बनी रहेगी। रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में चांदी की कमी करीब 6.7 करोड़ औंस रह सकती है। औद्योगिक क्षेत्र में चांदी की मांग कुछ घटकर करीब 650 मिलियन औंस रहने का अनुमान है, जिसकी एक वजह सोलर पैनल में चांदी के उपयोग में कमी मानी जा रही है, हालांकि दुनिया भर में सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं।
वहीं चांदी की कुल सप्लाई में लगभग 1.5% की बढ़ोतरी हो सकती है, जिसमें खदानों से उत्पादन करीब 1% बढ़कर 820 मिलियन औंस तक पहुंच सकता है। इसके अलावा ऊंची कीमतों के कारण रिसाइक्लिंग से मिलने वाली चांदी में करीब 7% की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, क्योंकि ज्यादा कीमत मिलने पर स्क्रैप की आपूर्ति बढ़ जाती है। निवेशकों की दिलचस्पी भी बनी हुई है और वैश्विक स्तर पर ईटीपी में चांदी की होल्डिंग करीब 1.31 अरब औंस रहने का अनुमान है।
इसी बीच 2026 में अब तक चांदी की कीमतों में करीब 11% की तेजी देखी जा चुकी है, जिसका कारण भू-राजनीतिक तनाव और बाजार में सीमित सप्लाई को माना जा रहा है। केडिया एडवाइजरी का मानना है कि जब तक मांग मजबूत और सप्लाई सीमित रहेगी, तब तक चांदी की कीमतों को समर्थन मिलता रह सकता है।