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8th Pay Commission: ₹1000 से ₹20,000 होगा FMA? कर्मचारियों ने सरकार के सामने रखीं ये बड़ी शर्तें

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8वें वेतन आयोग को लेकर हलचल तेज है। कर्मचारी संगठन मेडिकल अलाउंस बढ़ाने, फिटमेंट फैक्टर और पुरानी पेंशन बहाली जैसी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं

Last Updated- March 03, 2026 | 3:48 PM IST
8th Pay Commission
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

आजकल केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनधारकों के बीच 8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चा जोरों पर है। नवंबर में सरकार ने इसके ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ नोटिफाई किए थे, लेकिन कई कर्मचारी संगठनों का कहना है कि उनकी मुख्य मांगों को ठीक से जगह नहीं मिली। अब जब कमीशन का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है तो कर्मचारी संगठन भी अपनी मांग मजबूती से रख रहे हैं। 

बीते दिनों कमीशन की मुखिया जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को नई दिल्ली के चंद्रलोक बिल्डिंग में ऑफिस दिया गया, जो बताता है कि ये काम में तेजी आ चुकी है। जनवरी से ही कर्मचारी संगठनों ने अपनी मांगें सरकार को सौंपनी शुरू की थीं, और वित्त मंत्रालय ने भी कर्मचारियों और पेंशनधारकों से सुझाव मांगे थे। 

हालांकि, सरकार ने ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ में फिटमेंट फैक्टर, ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली और मेडिकल सुविधा जैसे बड़े मुद्दों पर साफ जवाब नहीं दिया, जिससे कर्मचारियों में नाराजगी है। स्टाफ साइड द्वारा अब करीब 1 करोड़ कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुड़ी मांगों को एक साथ जोड़कर ‘यूनिफाइड चार्टर ऑफ डिमांड्स’ तैयार किया जा रहा है। 25 फरवरी से दिल्ली में ड्राफ्टिंग कमेटी की बैठक हुई, जिसमें इन मांगों को अंतिम रूप दिया गया।

फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस में बड़ी बढ़ोतरी की मांग

न्यूज वेबसाइट फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्मचारी संगठनों की सबसे ज्यादा चर्चित डिमांड है फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस (FMA) को बढ़ाना। अभी ये 1,000 रुपये प्रति महीना है, लेकिन वो इसे 20,000 रुपये तक ले जाना चाहते हैं, खासकर उन इलाकों में जहां CGHS नेटवर्क नहीं है। उनका तर्क है कि इलाज का खर्चा इतना बढ़ गया है कि 1,000 रुपये से कुछ नहीं होता, खासतौर पर गांवों या दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले पेंशनधारकों को तो और मुश्किल का सामाना करना पड़ता है। फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशंस (FNPO) जैसे संगठनों ने भी इस पर जोर दिया है। 

कर्मचारी संगठनों का मानना है कि CGHS वाले शहरों में सरकार से जुड़े तय अस्पतालों में इलाज की सुविधा मिल जाती है। लेकिन जहां CGHS की सुविधा नहीं है, वहां कर्मचारियों और पेंशनधारकों को इलाज के लिए पूरा खर्च अपनी जेब से करना पड़ता है, जो उनके लिए बड़ा बोझ बन जाता है।

स्वास्थ्य खर्च तेजी से बढ़ा है, इसलिए कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पुरानी रकम अब काफी नहीं है। अगर यह मांग मान ली जाती है, तो खासकर रिटायरमेंट के बाद इलाज पर निर्भर लाखों पेंशनधारकों को बड़ी राहत मिल सकती है। स्टाफ साइड का कहना है कि मौजूदा रकम से दवाओं का खर्च भी ठीक से नहीं निकलता। साथ ही, जिन शहरों में सरकार से जुड़े अस्पताल नहीं हैं, वहां मिलने वाला मासिक मेडिकल अलाउंस भी बढ़ाने की मांग की जा रही है।

Also Read: Explainer: 31 दिसंबर 2025 से पहले रिटायर कर्मचारियों की पेंशन 8वें वेतन आयोग के तहत नहीं बढ़ेगी?

फिटमेंट फैक्टर और सलाना इंक्रीमेंट पर बहस

फिटमेंट फैक्टर हर वेतन आयोग में सबसे बड़ी चर्चा का मुद्दा रहता है और इस बार भी यही केंद्र में है। कर्मचारी संगठन 3.25 का फिटमेंट फैक्टर मांग रहे हैं, जिससे बेसिक सैलरी बढ़ाई जाती है। FNPO जैसे कुछ संगठनों ने ग्रुप A, B, C और D कर्मचारियों के लिए 3.0 से 3.25 तक अलग-अलग स्तर सुझाए हैं।

इसके अलावा सालाना बढ़ोतरी (एनुअल इंक्रीमेंट) को 3% से बढ़ाकर 7% करने की मांग भी की जा रही है। संगठनों का कहना है कि 3% की बढ़ोतरी से लंबे समय में आमदनी में खास फर्क नहीं पड़ता। FNPO ने 5% इंक्रीमेंट का सुझाव दिया है, जबकि सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉयी कॉन्फेडरेशन ने 7% बढ़ोतरी की बात कही है। उनका तर्क है कि महंगाई बढ़ने के दौर में वेतन बढ़ोतरी भी उसी हिसाब से होनी चाहिए, तभी असली आय में सुधार दिखेगा।

एक और अहम मांग यह है कि परिवार को 3 सदस्यों के बजाय 5 सदस्यों के आधार पर जोड़ा जाए, ताकि आश्रित माता-पिता को भी इसमें शामिल किया जा सके। कर्मचारियों का कहना है कि न्यूनतम वेतन तय करने का जो फॉर्मूला अपनाया जाता है, उसी में परिवार की यूनिट अहम होती है। अगर यूनिट 3 से बढ़कर 5 हो जाती है, तो बेसिक सैलरी की गणना पर करीब 66% तक असर पड़ सकता है।

अभी न्यूनतम बेसिक पे 18,000 रुपये है, लेकिन 5 यूनिट मानने पर यह आंकड़ा काफी बढ़ सकता है। यह गणना जिस आयक्रॉयड फॉर्मूले ( यह एक तरीका है, जिसके आधार पर सरकार न्यूनतम वेतन तय करती है) पर आधारित होती है, उसमें खाने-पीने, कपड़े और मकान जैसे खर्चों को आधार माना जाता है। संगठनों का तर्क है कि आज ज्यादातर कर्मचारी अपने माता-पिता की जिम्मेदारी भी उठाते हैं, इसलिए 3 की बजाय 5 यूनिट ज्यादा वास्तविक तस्वीर दिखाती है।

अगर बेसिक पे बढ़ती है, तो पेंशन पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि पेंशन आखिरी बेसिक सैलरी का 50% होती है। कुल मिलाकर, इन मांगों का मकसद वेतन ढांचे को ज्यादा न्यायसंगत बनाना है।

प्रमोशन्स, OPS बहाली और अन्य सुधार

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अब कर्मचारी संगठन सिर्फ वेतन बढ़ाने की बात नहीं कर रहे, बल्कि प्रमोशन को लेकर भी आवाज उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि हर कर्मचारी को नौकरी के दौरान कम से कम 5 प्रमोशन मिलें, खासकर निचले पदों पर जहां आगे बढ़ने के मौके बहुत कम होते हैं।

ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉयी फेडरेशन ने 30 साल की सेवा के दौरान टाइम-स्केल के आधार पर 5 प्रमोशन देने की मांग रखी है।

इसी के साथ ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को फिर से लागू करने का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है। संगठन चाहते हैं कि NPS और UPS को खत्म करके OPS वापस लाई जाए, क्योंकि उनका कहना है कि NPS में जोखिम ज्यादा है। यह मांग ड्राफ्टिंग कमेटी की बैठक में फिर उठाई गई, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई साफ जवाब नहीं आया है।

एक और मांग यह है कि 50% महंगाई भत्ता (DA) को बेसिक सैलरी में जोड़ दिया जाए। FNPO ने 27 फरवरी को चेयरपर्सन को चिट्ठी लिखकर यह मांग उठाई है। उन्होंने लिखा कि अगर DA बेसिक में जुड़ता है, तो HRA, ट्रांसपोर्ट अलाउंस, पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी रकम भी बढ़ जाएगी। पहले जब DA 50% से ऊपर जाता था तो उसे बेसिक में मिला दिया जाता था, लेकिन इस बार सरकार ने ऐसा करने से इनकार किया है।

इसके अलावा, जमा छुट्टियों के बदले मिलने वाली रकम (लीव एन्कैशमेंट) की सीमा 300 दिन से बढ़ाकर 400 दिन करने की मांग है। लीव ट्रैवल कंसेशन (LTC) का पैसा सीधे कैश में देने का सुझाव भी दिया गया है।

रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों में सुधार, बच्चों की पढ़ाई के लिए मिलने वाला अलाउंस पोस्ट-ग्रेजुएशन तक बढ़ाने और इंटरनेट जैसी जरूरी सेवाओं के लिए अलग भत्ता देने की बात भी शामिल है।

संगठनों की यह भी मांग है कि वेतन में ज्यादा असमानता न रहे। उनका कहना है कि सबसे ज्यादा बेसिक सैलरी, सबसे कम बेसिक सैलरी की 10 गुना से अधिक नहीं होनी चाहिए। अभी 7वीं वेतन आयोग में यह अंतर करीब 13 गुना था।

कमीशन ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट शुरू कर दी है। वहां 18 सवालों का एक फॉर्म दिया गया है, जिसके जरिए कर्मचारी अपनी राय और सुझाव दे सकते हैं। उम्मीद है कि नई सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से ही लागू होंगी। जो कर्मचारी 31 दिसंबर 2025 से पहले रिटायर हो चुके हैं, उनकी पेंशन में भी सुधार किया जाएगा और उन्हें बढ़े हुए पैसों का फायदा मिलेगा लेकिन अब कर्मचारी संगठन एक मजबूत ज्ञापन तैयार कर रहे हैं, ताकि वे अपनी सभी मांगें आयोग के सामने साफ, सीधे और संगठित तरीके से रख सकें।

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First Published - March 3, 2026 | 3:48 PM IST

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