भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मासिक बुलेटिन में जनवरी 2026 से देश के कुल निर्यात और आयात की रुपये में बिलिंग और निपटान से संबंधित दो सारणियां शामिल की जाने लगीं। हालांकि फिलहाल भारत के कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 5 फीसदी हिस्सा ही रुपये में तय होता है, फिर भी यह आंकड़ा ऐसे बदलाव की ओर इशारा करता है जो समय के साथ-साथ देश के शेष विश्व के साथ व्यापार करने के तरीके को बदल सकता है।
फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका ने रूस की सभी डॉलर संपत्तियों न केवल फ्रीज कर दिया, बल्कि उसे स्विफ्ट प्रणाली का उपयोग करने से भी रोक दिया और न्यूयॉर्क स्थित डॉलर भुगतान और निपटान प्रणाली तक उसकी पहुंच अवरुद्ध कर दी। स्विफ्ट एक सुरक्षित नेटवर्क है जिसका उपयोग कम से कम 200 देशों में वित्तीय संस्थान अंतरराष्ट्रीय धन और प्रतिभूति अंतरण के लिए निर्देश भेजने के लिए करते हैं।
इस वजह से भारत समेत कई देशों ने डॉलर और डॉलर-प्रधान भुगतान एवं निपटान प्रणाली के विकल्पों की खोज शुरू कर दी। आरबीआई ने रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए एक रोडमैप तैयार करने के वास्ते एक अंतर-विभागीय समूह (आईडीजी) का गठन किया।
जुलाई 2023 में प्रकाशित इसकी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक व्यवस्था के पुनर्संतुलन के साथ, आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। इस पृष्ठभूमि में, रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आरबीआई के 90वर्ष के होने पर आयोजित समारोह में 1 अप्रैल, 2024 को मुंबई में अपने संबोधन में कहा कि रुपया विश्व भर में सुलभ और स्वीकार्य होना चाहिए।
आईडीजी की रिपोर्ट में एक प्रमुख सिफारिश यह थी कि व्यापारिक साझेदारों के साथ स्थानीय मुद्रा में लेन-देन की व्यवस्था की जाए ताकि निर्यात और आयात के बिल, भुगतान और निपटान रुपये या व्यापारिक साझेदार की मुद्रा में किए जा सकें। इस तरह की व्यवस्था का मुख्य लाभ यह है कि यह विनिमय दर के जोखिम को सीमित करता है। यह उस देश के निर्यातकों के लिए फायदेमंद है जिसकी मुद्रा में बिलिंग होती है।
सशक्त और स्थिर अर्थव्यवस्था वाले देशों द्वारा जारी की गई मुद्राएं अत्यधिक स्थिर, तरल और सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत होती हैं। इन्हें सुरक्षित निवेश माना जाता है क्योंकि ये अपना मूल्य बनाए रखती हैं, और इनका व्यापक रूप से अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में उपयोग किया जाता है। प्रमुख मजबूत मुद्राएं अमेरिकी डॉलर, यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग, स्विस फ्रैंक, कैनेडियन डॉलर, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और न्यूजीलैंड डॉलर हैं। सिंगापुर डॉलर, हॉन्ग कॉन्ग डॉलर और स्वीडिश क्रोना को दूसरे स्तर की मजबूत मुद्राएं माना जाता है।
जुलाई 2023 से, आरबीआई ने संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, मालदीव और मॉरीशस के केंद्रीय बैंकों के साथ स्थानीय मुद्रा व्यवस्था पर समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। कई अन्य केंद्रीय बैंकों के साथ भी इसी तरह के समझौता ज्ञापन पर काम चल रहा है।
स्थानीय मुद्रा व्यवस्था के तहत, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के भुगतान और निपटान भारत में विशेष रुपी वोस्त्रो खातों (एसआरवीए) और साझेदार देशों में इसी तरह के खातों के माध्यम से होते हैं। जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के बैंकों सहित 35 देशों के 83 बैंकों ने भारतीय बैंकों में एसआरवीए खाते खोले हैं।
निर्यातकों को डॉलर के बजाय रुपये में बिल बनाने को प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय निर्यातकों ने सिफारिश की है कि निर्यात का बिल रुपये में बने या डॉलर में, दोनों ही स्थितियों में भारतीय निर्यातकों को समान प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। सरकार ने रुपये में बिल बनाने वाले भारतीय निर्यातकों को समान प्रोत्साहन उपलब्ध करा दिए हैं।
आरबीआई के बुलेटिन के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में यानी अप्रैल से दिसंबर 2026 के बीच, भारत से वस्तुओं और सॉफ्टवेयर के निर्यात का 6.08 फीसदी और भारत को आयात का 4.82फीसदी रुपये में बिल किया गया था। रुपये में निपटान के लिए ये आंकड़े क्रमशः 2.84 फीसदी और 2.36 फीसदी थे।
जनवरी के मध्य में ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज ने अपने प्रमुख ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में भारतीय बॉन्ड को शामिल करने का निर्णय स्थगित कर दिया। इस वर्ष के अंत तक हमें इसके अगले कदम के बारे में पता चल जाएगा। लेकिन यह सच है कि भारतीय सरकारी बॉन्ड प्रमुख उभरते बाजारों के बेंचमार्क में लगातार अपनी जगह बना रहे हैं। जेपी मॉर्गन इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी इंडेक्स में जून 2024 में इन्हें शामिल किया गया, जिसके बाद ब्लूमबर्ग इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी बॉन्ड इंडेक्स (जनवरी 2025) और एफटीएसई रसेल इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स (सितंबर 2025) ने भी इन्हें शामिल किया।
विदेश में रुपये में होने वाले लेन-देन के लिए यह आवश्यक होगा कि भारत में रहने वाले और अनिवासी भारतीय रुपये और अन्य मुद्राओं में भुगतान और प्राप्ति कर सकें। इसे संभव बनाने के लिए, आईडीजी की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं के माध्यम से भारत के बाहर रुपये में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। एनआरआई अब ऐसे रुपये खाते खोल सकते हैं। आरबीआई ने एक कदम आगे बढ़ते हुए हाल ही में नेपाल, भूटान और श्रीलंका में रहने वाले एनआरआई को भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं से रुपये में ऋण लेने की अनुमति दी है।
क्या अमेरिका को नाराज करने वाले देशों को स्विफ्ट और डॉलर-प्रधान वैश्विक भुगतान एवं निपटान प्रणाली से बाहर किए जाने का खतरा है? यह एक अनुमान मात्र है, लेकिन अगर ऐसा होता है, तो इससे निपटने का एकमात्र तरीका भारतीय भुगतान प्रणालियों, जैसे कि आरटीजीएस (रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट) और एसएफएमएस (स्ट्रक्चर्ड फाइनैंशियल मेसेजिंग सिस्टम) को अन्य देशों की भुगतान प्रणालियों से सीधे जोड़ना है। इस दिशा में काम जारी है।
कुछ हलकों में यह चिंता जताई जा रही है कि रुपये में सीमा पार लेनदेन से विनिमय दर में अस्थिरता बढ़ सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार कम हो सकता है, या यहां तक कि मौद्रिक नीति अप्रभावी भी हो सकती है। लेकिन ये चिंताएं निराधार प्रतीत होती हैं। रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए एक साथ बड़े बदलाव करने के बजाय क्रमिक दृष्टिकोण अपनाने से ऐसी आशंकाओं को दूर करने में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए, स्थानीय मुद्रा व्यवस्था का उपयोग पहले व्यापार के लिए, फिर गैर-व्यापारिक लेनदेन के लिए और अंत में पूंजी खाता लेनदेन के लिए किया जा सकता है।
भारत के बाहर वित्तीय बाजारों को खोलने और रुपये को तरलता प्रदान करने में भी इसी तरह का क्रमिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण एक धीमी और स्थिर प्रक्रिया होनी चाहिए। जल्दबाजी से व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं और नुकसान हो सकता है।
किसी देश की मुद्रा उसकी शान होती है-उसकी संप्रभुता की अभिव्यक्ति। भारत वर्ष 2047 तक एक विकसित देश बनने की आकांक्षा रखता है, इसलिए रुपये को परिवर्तनीय और आरक्षित मुद्राओं में स्थान प्राप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए।