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RBI, मुद्रा सृजन और सरकारी खजाना: आने वाले वक्त में बैंकों के अलावा अन्य कर्ज क्यों होंगे जरूरी

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रिजर्व बैंक के लाभांश और बॉन्ड खरीद ने कम मुद्रास्फीति वाले माहौल में यील्ड को कम बनाए रखा है। जब हालात बदलेंगे तो गैर बैंकिंग कर्ज के जरिये वित्तपोषण जरूरी होगा

Last Updated- March 03, 2026 | 9:33 PM IST
RBI
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

मौद्रिक नीति, तरलता, और मुद्रा तथा बॉन्ड बाजारों को दिशा देने में मदद करने के साथ-साथ, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रिकॉर्ड ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) बॉन्ड खरीद और लाभांश हस्तांतरण ने सरकार की राजकोषीय गणना को सही रखने में मदद की है, जबकि यील्ड को कम बनाए रखा है। नरम महंगाई ने यह सब संभव किया है, हालांकि बाहरी संतुलन पर इसका असर हुआ है। सवाल यह है कि जब चक्र पलटेगा तो क्या होगा?

मुद्रा सृजन:  करेंसी सर्कुलेशन, बैंकिंग मांग और साव​धि जमा के साथ ही मुद्रा आपूर्ति बनाए रखने के चार तरीके हैं। पहला, जब कोई बैंक वाणिज्यिक ऋण देता है, तब वह उसे कर्जदार के खाते में जमा करता है। इससे मुद्रा सृजन होता है। सामान्य विचार के उलट बैंक ऋण भी जमा तैयार करते हैं।

दूसरा, जब रिजर्व बैंक सहित बैंकिंग व्यवस्था बॉन्ड खरीदकर सरकार को फंड करती है, तो इसके चलते सरकार जो व्यय करती है वह अर्थव्यवस्था में नया धन डालता है। ध्यान रहे कि जब परिवार और गैर बैंकिंग निवेशक वित्त प्रदान करते हैं तो मुद्रा एक धारक से दूसरे धारक तक जाती है और इस दौरान मुद्रा आपूर्ति में इजाफा नहीं होता। बैंकिंग व्यवस्था और रिजर्व बैंक द्वारा वित्त पोषण से नई मुद्रा तैयार होती है। गैर बैंकों के वित्त पोषण से ऐसा नहीं होता। 

तीसरा, जब विदेशी मुद्रा की आवक होती है और उसे रुपये में बदला जाता है तो नई मुद्रा तैयार होती है। चौथा यानी अंतिम, जब रिजर्व बैंक व अन्य बैंक अपने आरक्षित भंडार से लाभांश देते हैं तो इससे भी मुद्रा तैयार होती है।

एक बार धन का सृजन होने के बाद वह प्रचलन और खपत के लिए तैयार हो जाता है। यह बाहरी मांग के लिए भी मौजूद रहता है और उपभोक्ता तथा परिसंपत्ति मूल्य मुद्रास्फीति के लिए भी। उपरोक्त में से किसी भी हालत के उलटने पर मुद्रा बाहर होती है। यानी जब बैंक को दिए गए ऋण वापस चुकाए जाते हैं, जब सरकार बैंकों और आरबीआई द्वारा वित्तपोषित खर्चों में कटौती करती है, जब विदेशी मुद्रा बाहर जाती है, या जब बैंक गैर-बैंकों से पूंजी जुटाते हैं।

आरबीआई लाभांश-मात्रा और औचित्य: रिजर्व बैंक द्वारा सरकार को हाल के लाभांश हस्तांतरण की मात्रा महत्त्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025 के लिए, रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये (सकल घरेलू उत्पाद का 0.75 फीसदी) हस्तांतरित किया, जो इसके पिछले वर्ष के 2.11 लाख करोड़ रुपये के हस्तांतरण के बाद हुआ। ये विश्व स्तर पर किसी केंद्रीय बैंक से सरकार को किए गए सबसे बड़े हस्तांतरणों में से हैं। हालांकि, ये आवश्यक गैर-कर राजस्व के रूप में काम करते हैं, जिससे राजस्व और राजकोषीय घाटा दोनों कम होते हैं, लेकिन इनकी संरचना की जांच आवश्यक है। इस आय का एक हिस्सा केंद्रीय बैंकिंग की संरचना से जुड़ा है।

रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी परिसंपत्तियों पर अर्जित ब्याज (वित्त वर्ष 2024 में लगभग 1 लाख करोड़ रुपये), जो प्रभावी रूप से बिना ब्याज वाली देनदारियों जैसे कि प्रचलन में मुद्रा और रिजर्व बैंक के साथ बैंकिंग शेष से वित्तपोषित होती हैं, इस आय का एक स्रोत है। 

हालांकि अन्य घटकों की व्याख्या की जरूरत है। रिजर्व बैंक को भारी सरकारी बॉन्ड धारिता से हासिल अतिरिक्त ब्याज, अतिरिक्त बैंकिंग तरलता को अवशोषित करने में उठाए गए खर्चों को घटाकर, वित्त वर्ष 2024 में 0.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। बार-बार बड़े सरकारी ब्याज भुगतान को रिजर्व बैंक लाभांश के माध्यम से सरकार को वापस भेजना, मार्जिन पर अप्रत्यक्ष मुद्रीकरण की सीमा को धुंधला कर सकता है।

सबसे जटिल पहलू विदेशी मुद्रा लाभ से जुड़ा है। जब विदेशी मुद्रा, जिसे रिजर्व बैंक ने मूल रूप से कम कीमत पर खरीदा था, बाजार में ऊंची कीमत पर बेची जाती है, तो यह अंतर आरबीआई के लिए वास्तविक लाभ का प्रदान करता है और मुद्रा आपूर्ति में कमी लाता है। इस लाभ का सरकार को कोई भी हस्तांतरण और उसका व्यय, मौद्रिक संकुचन को उलट देता है। यही कुछ औचित्य प्रदान करता है कि रिजर्व बैंक ऐसे वास्तविक लाभ को लाभांश के रूप में वितरित करे। वित्त वर्ष 24 में रिजर्व बैंक ने 0.8 लाख करोड़ रुपये का विनिमय लाभ चिह्नित किया। बहरहाल, वित्त वर्ष 24 के दौरान रिजर्व बैंक ने हाजिर बाजार में शुद‌ध रूप से 41 अरब डॉलर की खरीद की। वित्त वर्ष 2024 में शुद्ध रूप से विदेशी मुद्रा खरीद के बावजूद शुद्ध विदेशी मुद्रा लाभ की पहचान रिजर्व बैंक की लेखांकन पद्धति से उत्पन्न होती है। लाभ की पहचान ऐतिहासिक भारित औसत लागत के मुकाबले सकल हाजिर बाजार बिक्री (153 अरब डॉलर) पर  होती है, जबकि सकल बाजार खरीद (194 अरब डॉलर) भंडार की औसत होल्डिंग लागत को बढ़ा देती है। इससे रिजर्व बैंक को मूल्यांकन लाभ प्राप्त करने का अवसर मिलता है, भले ही मुद्रा आपूर्ति में कोई सहवर्ती कमी न हो।

वित्त वर्ष 2025 में भी, जब रिजर्व बैंक ने हाजिर बाजार में शुद्ध रूप से 34 अरब डॉलर और वायदा बाजार में 84 अरब डॉलर बेचे, उसने हाजिर बाजार में 399 अरब डॉलर की सकल बिक्री पर लेखांकन लाभ प्राप्त किया। कुल मिलाकर रिजर्व बैंक द्वारा दिया गया हर एक रुपये का लाभांश, चाहे जितना भी औचित्यपूर्ण हो, मौद्रिक प्रभाव डालता है।

वर्तमान मौद्रिक स्थिति: जनवरी 2026 तक रिजर्व बैंक की ब्रॉड मनी रिपोर्ट दर्शाती है कि मुद्रा आपूर्ति सालाना आधार पर 12 फीसदी बढ़ी है जो पिछले कुछ सालों की सीमा के ऊपरी स्तर पर है। यह वाणिज्यिक ऋण में वृद्धि (14.1 फीसदी की बढ़ोतरी) से प्रेरित है। हालांकि, सरकार को बैंक ऋण में 12 फीसदी की वृद्धि में रिजर्व बैंक की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वित्त वर्ष 2026 में जनवरी तक रिजर्व बैंक की ओएमओ खरीद 6.4 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई, जिसने शुद्ध विदेशी मुद्रा बहिर्गमन से उत्पन्न धन निकासी की भरपाई की।

रिकॉर्ड ओएमओ और लाभांश हस्तांतरणों के माध्यम से, आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026 में मौद्रिक परिस्थितियों और ब्याज दरों को भौतिक रूप से आसान बनाया है। कम महंगाई के समय में, इसने सरकार की उधारी आवश्यकताओं और बॉन्ड बाजार की मांग के बीच की खाई को पाट दिया है। हालांकि, यह सहजता रुपये पर दबाव भी बढ़ाती है, विशेषकर प्रसिद्ध ‘असंभव त्रयी’ को देखते हुए।

मुख्य निष्कर्ष: कम अनुकूल वातावरण में, रिजर्व बैंक उतने बड़े पैमाने पर ओएमओ और लाभांश प्रदान नहीं कर पाएगा और यील्ड को कम नहीं रख पाएगा। इसके लिए उसे प्रतिकूल व्यापक आर्थिक और बाजार प्रभाव का जोखिम लेना होगा। रिजर्व बैंक कोई साधारण नकदी से संपन्न सरकारी उपक्रम नहीं है। एक केंद्रीय बैंक के रूप में, उसके द्वारा खरीदा गया हर बॉन्ड और वितरित किया गया हर रुपया लाभांश, चाहे उसका औचित्य कितना भी मजबूत या कमजोर हो, मुद्रा आपूर्ति, ब्याज दरों, उपभोक्ता और परिसंपत्ति मुद्रास्फीति, तथा बाहरी संतुलन को प्रभावित करता है।

अब दो संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं। पहला, भारत को अपने स्थिर-आय बाजारों को गहराई देनी होगी। घरेलू और गैर-बैंक भागीदारी को प्रोत्साहित करने से सरकार और वाणिज्यिक ऋण का वित्तपोषण नए धन सृजन किए बिना संभव होगा, जिससे नीतिगत लचीलापन बढ़ेगा। नीति-निर्माताओं के लिए धन डालना, उसे वापस लेने की तुलना में आसान होता है। दूसरा, राजस्व घाटे को और कम करना अनिवार्य है। वर्तमान में बड़े केंद्रीय बैंक हस्तांतरण समग्र राजस्व घाटे को उल्लेखनीय रूप से संकुचित कर देते हैं, जिससे निहित दबाव छिप जाते हैं।

जब उधारकर्ता और सरकार वित्तपोषण के लिए बैंकों और रिजर्व बैंक पर अपनी निर्भरता कम करेंगे, तब व्यापक आर्थिक लचीलापन बढ़ेगा। जब मुद्रास्फीति का चक्र पलटेगा, रिजर्व बैंक का सहारा अपेक्षा से कहीं तेजी से पीछे हटाना पड़ सकता है।

(लेखक सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - March 3, 2026 | 9:32 PM IST

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