अमेरिका के साथ अपने व्यापार करार में भारत शुल्क के मामले में एशियाई प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा फायदे पर जोर दे सकता है। उसका मकसद अमेरिकी बाजार में पैठ के मामले में मिले वे लाभ और बढ़त बनाए रखना है, जो डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा अलग-अलग देशों पर लगाए गए खास कर खत्म करने का अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने से पहले उसे हासिल हो चुके थे।
फैसला आने से पहले भारत ने अमेरिका को भारतीय उत्पादों पर 18 फीसदी शुल्क लगाने के लिए राजी कर लिया था, जबकि इंडोनेशिया, बांग्लादेश और पाकिस्तान पर 19-19 फीसदी, वियतनाम पर 20 फीसदी और चीन पर 34 फीसदी शुल्क लग रहा था।
नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर एक सरकारी अधिकारी ने बताया, ‘अमेरिका के साथ हमारा करार इस तरह किया गया था कि अपने प्रतिस्पर्द्धियों की तुलना में हमें ज्यादा फायदा हो। हमारा जोर इसी बात पर रहेगा समझौते को अंतिम रूप देते समय यह फायदा खत्म नहीं हो।’
अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद शुल्क पर अनिश्चितता बन गई, जिस कारण भारत के मुख्य व्यापार वार्ताकार दर्पण जैन के नेतृत्व वाले दल को 22 फरवरी की अपनी अमेरिका यात्रा टालनी पड़ी। लेकिन अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हावर्ड लटनिक ने पिछले सप्ताह निजी यात्रा के दौरान नई दिल्ली में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात की तथा चर्चा को बेहद सार्थक बताया।
एक दिन बाद गोयल ने कहा कि अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद के घटनाक्रम पर भारत की नजर है और अंतरिम व्यापार करार में सबसे अच्छी संभावनाओं के लिए वह अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा। अदालत के फैसले के बाद ट्रंप ने व्यापार कानून की धारा 122 के तहत सभी देशों पर 150 दिन के लिए 10 फीसदी अधिभार लगा दिया और उसे बढ़ाकर 15 फीसदी करने की बात भी कही।