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Editorial: बुलडोजर न्याय का अंत हो

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बुलडोजर न्याय अब उत्तर प्रदेश से निकलकर दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, असम और महाराष्ट्र तक फैल चुका है।

Last Updated- April 04, 2025 | 11:26 PM IST
Supreme Court

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण द्वारा 2021 में छह लोगों के घरों को बुलडोजर से गिराए जाने की कार्रवाई को ‘अमानवीय और अवैध’ ठहराते हुए ‘बुलडोजर न्याय’ पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उसे हर घर के मालिक को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी प्राधिकरण को दिया है। दो न्यायाधीशों के पीठ ने 1 अप्रैल को जिस घटना पर यह फैसला दिया है वह सर्वोच्च न्यायालय के नवंबर 2024 के आदेश (एक अलग पीठ) से पहले की है। उस आदेश में राज्यों को बुलडोजर से संपत्तियां गिराने के बारे में बाध्यकारी निर्देश दिए गए थे। हालिया आदेश उसी से आगे का है और कानून को मजबूत करता है।

घर ढहाने के पीछे भूमि अधिग्रहण को वजह बताया गया था किंतु न्यायमूर्ति अभय एस ओका और उज्जल भुइयां के पीठ ने उस पर कुछ नहीं बोला और एक स्वर में कहा कि प्रयागराज प्राधिकरण का कदम अवैध था। पीठ ने यह भी कहा कि याची को संविधान से आश्रय का बुनियादी अधिकार मिला है। आश्रय का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार है, जिसमें हर नागरिक को आवास मिलना सुनिश्चित किया जाता है। इसमें केवल भौतिक ढांचे की नहीं बल्कि सुरक्षा और निजता की भी बात है। समुचित पुनर्वास और उचित प्रक्रिया के बगैर लोगों को उनके घर से बाहर निकालना इस अधिकार का उल्लंघन है। प्रयागराज मामले में न्यायधीशों ने उचित प्रक्रिया की कमी बताई। उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 में अवैध ढांचे ढहाने से संबंधित प्रक्रिया धारा 27 में दी गई है। उसके अनुसार किसी को भी नोटिस दिए बगैर और उसका जवाब देने के लिए उपयुक्त समय दिए बगैर इमारत ढहाने का आदेश नहीं दिया जा सकता। मौजूदा मामले में अधिकारियों ने दिसंबर 2020 के मध्य में कारण बताओ नोटिस मकानों पर चिपका दिए। इसमें लिखा गया था कि नोटिस को व्यक्तिगत रूप से तामील कराने के दो प्रयास किए गए थे। जनवरी 2021 के आरंभ में मकान गिराने के आदेश भी चिपका दिए गए। बाद में पता चला कि रजिस्टर्ड डाक से पहली चिट्ठी ही 1 मार्च 2021 को भेजी गई थी, जो 6 मार्च 2021 को पहुंची। अगले दिन मकान गिरा दिए गए और आवेदकों को कानून के तहत अपील करने का मौका ही नहीं मिला। दूसरे शब्दों में प्रयागराज प्राधिकरण ने राज्य के कानूनों का उल्लंघन किया।

बुलडोजर न्याय अब उत्तर प्रदेश से निकलकर दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, असम और महाराष्ट्र तक फैल चुका है, इसलिए प्रयागराज प्राधिकरण को चेतावनी देने और जुर्माना लगाने की सर्वोच्च न्यायालय की कार्रवाई नवंबर 2024 के उसके ही फैसले को पुख्ता करती है। संविधान के अनुच्छेद 142 से मिली असाधारण और विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल कर सर्वोच्च न्यायालय ने बुलडोजर के इस्तेमाल से पहले की प्रक्रिया बताकर लोक सेवकों की जवाबदेही तय की है। इसमें इमारत गिराने से 15 दिन पहले निवासियों को नोटिस देना, उन्हें उल्लंघन के बारे में बताना, भवन स्वामी को इस कदम को चुनौती देने का सही अवसर देने, अंतिम आदेश की तार्किक परिणति और भवन गिराए जाने की वीडियोग्राफी शामिल है। इससे भी अहम बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित की है। इसमें न्यायालय की अवमानना और अभियोजन भी शामिल हैं। अप्रैल के निर्णय और नवंबर के निर्णय राज्य प्रशासन का दंड देने का उत्साह कम कर सकते हैं। परंतु असली इम्तहान निचली अदालतों का है, जहां पीड़ित सबसे पहले अपील करते हैं। उन्हें सुनिश्चित करना होगा कि आम नागरिकों के आश्रय के वैध अधिकार को राजनीति का बुलडोजर ध्वस्त न करे।

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First Published - April 4, 2025 | 10:53 PM IST

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