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अचानक बंद नहीं हो सकते डेरिवेटिव: सेबी चेयरमैन पांडेय

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पांडेय ने कहा कि भरोसा भारत के तेजी से बढ़ते पूंजी बाजारों की आधारशिला है और इसे घोषणाओं से नहीं बल्कि हर दिन कार्रवाई से अर्जित किया जाना चाहिए।

Last Updated- October 31, 2025 | 11:00 PM IST
Sebi chief Tuhin Kanta Pandey on NSE IPO

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय के लिए भरोसा भारत के तेजी से बढ़ते पूंजी बाजारों की आधारशिला है और इसे घोषणाओं से नहीं बल्कि हर दिन कार्रवाई से अर्जित किया जाना चाहिए। बिजनेस स्टैंडर्ड बीएफएसआई समिट 2025 में तमाल बंद्योपाध्याय के साथ बेबाक बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे सेबी निगरानी में तेजी ला रहा है। मुख्य अंश..

आपने आम लोगों का विश्वास बनाने की बात की है। आप मुद्दों और विवादों का निपटारा कैसे करते हैं, न सिर्फ बाजार में बल्कि नियामक के भीतर भी? आज हम कहां हैं?

यह समझना जरूरी है कि सेबी एक संस्था है। इसे मेरे कई पूर्ववर्तियों ने उद्योग और बाज़ार के सहभागियों के साथ मिलकर अत्यंत प्रभावी सहयोग से पोषित और विकसित किया है। आज सेबी की न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी एक मज़बूत साख है। विश्वास आंतरिक और बाहरी दोनों ही रूपों में अहम है। यह किसी एक कदम से नहीं आता, कोई जादुई छड़ी नहीं है। यह कई कार्रवाईयों से उपजता है : हमारी भाषा, हम कैसे संवाद करते हैं, हमारा नियामकीय ढांचा और नियमों का निष्पक्ष और विवेकपूर्ण ढंग से लागू होना। पहले इस बात को लेकर चिंता थी कि क्या हमारे पास हितों के टकराव के प्रबंधन के लिए एक मजबूत आंतरिक ढाचा है। हमने हितों के टकराव के मुद्दों पर एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। यह समिति कई आंतरिक और बाहरी हितधारकों के साथ विचार-विमर्श और बातचीत कर रही है। मुझे उम्मीद है कि रिपोर्ट कुछ ही दिनों में (संभवतः 10 नवंबर तक) पेश कर दी जाएगी। हम इसकी सिफारिशों के आधार पर अगला कदम उठाएंगे।

पहले कभी पांच साल की ऐसी अवधि नहीं देखने को मिली है जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने इतनी ज्यादा बिकवाली की हो। क्या यह सिर्फ मूल्यांकन का मामला है या कुछ और भी है?

एफपीआई निवेशकों और अन्य विदेशी बाजार प्रतिभागियों के साथ मेरी बातचीत के आधार पर भारत में उनका विश्वास अभी भी बहुत ऊंचा है। वे भारत की दीर्घकालिक वृद्धि की गाथा में भरोसा करते हैं और अल्पकालिक अवसर भी देखते हैं। भारत में एफपीआई का बाजार पूंजीकरण करीब 900 अरब डॉलर है। वे वैश्विक बाजारों में निवेश करते हैं और आकलन करते हैं कि उन्हें सबसे अच्छा रिटर्न कहां मिल सकता है। इसलिए पिछले साल 45 अरब डॉलर की निकासी को अनुपातिक रूप से देखा जाना चाहिए। 900 अरब डॉलर के आधार पर 45 अरब डॉलर की निकासी बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।

भारत सबसे बड़े प्राथमिक बाज़ारों में से एक है, लेकिन आपने हाल ही में आईपीओ में न्यूनतम सार्वजनिक निर्गम (एमपीओ) का आकार और सूचीबद्ध कंपनियों के लिए न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (एमपीएस) की जरूरत को कम कर दिया है। क्या दोनों में कोई विसंगति है?

मैं स्पष्ट कर दूँ कि हमने न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (एमपीएस) के मानदंडों में कोई ढील नहीं दी है। एमपीएस 25 फीसदी पर बरकरार है यानी अपरिवर्तित है। हमने न्यूनतम सार्वजनिक निर्गम (एमपीएस) और कंपनियों को एमपीएस के अनुपालन के लिए दिए गए समय की जांच की। बाज़ार का विस्तार हुआ है। एलआईसी के बाद हमने 6 लाख करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण वाली कंपनियों के बाजार में आने को लेकर चर्चा शुरू की।

एमपीएस की सख्त समय सीमा डेमोकल्स की तलवार की तरह काम कर सकती है, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण अल्पांश शेयरधारकों को नुकसान हो सकता है। इसलिए हमने बाजार की क्षमता का यथार्थवादी आकलन किया। व्यापक परामर्श और अच्छी प्रतिक्रिया के बाद हमने निवेशकों की सुरक्षा से समझौता किए बिना एमपीएस और एमपीओ अनुपालन के लिए कई कदम उठाए।

म्युचुअल फंड की लागत पर काफी बहस चल रही है। आरबीआई बैंकों को आय में विविधता लाने के लिए ज्यादा गतिविधियों की इजाजत दे रहा है जबकि सेबी म्युचुअल फंड की आय के स्रोतों को सीमित कर रहा है। क्या इसमें कोई विरोधाभास है?

इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। खुदरा सहभागिता के लिए म्युचुअल फंड बेहद महत्वपूर्ण हैं। हमारे पास 5.6 करोड़ यूनिक निवेशक हैं। यह उद्योग तेजी से बढ़ा है, लेकिन अभी भी भारत के सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 20-25 फीसदी ही है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में म्युचुअल फंड का एयूएम सकल घरेलू उत्पाद का 80-85 फीसदी होता है। म्युचुअल फंडों को तेजी से बढ़ना चाहिए क्योंकि वे खुदरा निवेशकों को बाजार में प्रवेश करने और दीर्घकालिक निवेश को बढ़ावा देने का एक सुरक्षित तरीका प्रदान करते हैं। म्युचुअल फंड उद्योग काफी विकसित हुआ है और ज्यादा पेशेवर बन गया है। हम इसे सीमित नहीं
कर सकते।

शोध से पता चलता है कि 90-93 फीसदी व्यक्तिगत निवेशक वायदा एवं विकल्प में पैसा गंवा देते हैं। इन्हें आसान बनाने की सिफारिशें आने के बाद करीब एक साल बीत गए है। क्या आपके मन में इसे लेकर कोई समय-सीमा है?

यह एक संवेदनशील विषय है और इसे सोच-समझकर निपटाने की जरूरत है। हमने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया और पांच दौर के परामर्श के बाद बाजार में सुधार के लिए कई उपाय लागू किए।

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First Published - October 31, 2025 | 10:39 PM IST

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