कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा उनके पदभार संभालने के बाद से द्विपक्षीय संबंधों में उल्लेखनीय बदलाव को दर्शाती है। दोनों देशों के संबंधों में कभी कटुता आ गई थी लेकिन अब उनमें महत्त्वाकांक्षा का भाव पनप रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई उनकी मुलाकात के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों ने साल के अंत तक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को अंतिम रूप देने की प्रतिबद्धता जताई है। उन्होंने दशक के अंत तक व्यापार दोगुना करने का भी संकल्प लिया है।
यह सब म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कार्नी के उस वादे की पृष्ठभूमि में हो रहा है, जिसमें उन्होंने ‘मध्यम शक्ति’ कहे जाने वाले देशों के साथ मुद्दों पर आधारित संबंधों के माध्यम से कनाडा की विदेश नीति को पुनर्परिभाषित करने की बात कही थी। यह बदलाव राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा चुने जाने के बाद इसके विशाल दक्षिणी पड़ोसी अमेरिका के साथ संबंधों में आई भारी गिरावट के बाद हुआ है।
कनाडा की धरती पर एक सिख चरमपंथी की हत्या में भारतीय संलिप्तता के आरोप को लेकर वहां की पिछली सरकार और भारत के बीच गहरे मतभेद पैदा हो गए थे। इसके बाद दोनों देशों में राष्ट्रवादी भावनाएं हावी हो गईं और संबंधों में प्रगति की संभावना खत्म हो गई। यह तनाव कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के पद पर बने रहने तक व्याप्त रहा।
भारत ने उक्त घटना में किसी भी आधिकारिक संलिप्तता से स्पष्ट इनकार किया था। अब महत्त्वपूर्ण बात यह है कि दोनों पक्षों ने कटुता को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ने की समझदारी दिखाई है। कार्नी के सत्ता में आने से व्यावहारिकता का दौर शुरू हुआ और धीरे-धीरे सामान्य राजनयिक आदान-प्रदान बहाल हो गया।
व्यापार समझौतों के प्रति भारत की नई प्रतिबद्धता से पता चलता है कि आर्थिक एकीकरण बढ़ाने में कनाडा के साथ उसकी भी समान रुचि है। कनाडा के नागरिकों को इस बात की चिंता है कि अमेरिका और मेक्सिको के साथ उसके मुक्त व्यापार समझौते का इस वर्ष नवीनीकरण नहीं हो सकता है, इसलिए नए गंतव्य तलाशना उसके लिए अनिवार्य हो गया है।
भारत में हुए अन्य बदलावों ने एक साझेदार के रूप में कनाडा के महत्त्व को और बढ़ा दिया है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय परिसंपत्ति मुद्रीकरण योजना के दूसरे चरण में राजमार्ग जैसी परिसंपत्तियां शामिल हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां कनाडा के पेंशन फंडों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहने की उम्मीद है। ये फंड भारत द्वारा स्थिर दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित करने के प्रयासों में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। भारत में परमाणु संयंत्रों के निर्माण और निवेश से संबंधित कानूनों के उदारीकरण का अर्थ है कि इससे यूरेनियम की मांग बढ़ेगी, जिसका कनाडा प्रमुख निर्यातक है।
इस यात्रा का मुख्य केंद्र ऊर्जा सुरक्षा था। कतर के बुनियादी ढांचे पर ईरान के हमले के बाद प्राकृतिक गैस की कीमतों में आई तेजी ने इसके महत्त्व को और भी रेखांकित किया है। इस हमले के कारण गैस से समृद्ध अमीरात में उत्पादन ठप हो गया है। आपूर्ति और स्रोतों का विविधीकरण अब और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। इस संदर्भ में, यह स्वागत योग्य है कि सरकार ने कैमेको के साथ 1.9 अरब अमेरिकी डॉलर का समझौता किया है, जिससे 2027 से 2035 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए 11,000 टन से अधिक यूरेनियम उपलब्ध होने की उम्मीद है।
आगामी दशकों के विकास और आर्थिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से समान रूप से अहम यह है कि इस शिखर सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति पर एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, जिनके कनाडा के पास विशाल भंडार हैं। भारत और कनाडा की अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापक पूरकता को देखते हुए, संबंधों में इस तरह की नई शुरुआत की सख्त जरूरत थी। दोनों प्रधानमंत्रियों को इस बात का श्रेय जाता है कि वे स्थिति को स्पष्ट करने में सफल रहे हैं।
अब भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि कनाडा में चल रही जांच और कानूनी प्रक्रिया में कोई और बाधा न आए। उम्मीद है कि कनाडा के लोग एक ऐसे आर्थिक संबंध पर अपना ध्यान केंद्रित रखेंगे जो दोनों देशों को बहुत कुछ प्रदान करता है।