भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने म्युचुअल फंड की एक नई श्रेणी लाइफ साइकल फंड शुरू की है। ये टारगेट-डेट म्युचुअल फंड हैं। जब फंड की अवधि पूरी होने वाली होती है तो परिसंपत्ति आवंटन में खुद-ब-खुद बदलाव हो जाता है। इस तरह आवंटन में नए सिरे से संतुलन हो जाता है, जो कई बार निवेशक खुद नहीं कर पाते। एडलवाइस ऐसेट मैनेजमेंट की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी राधिका गुप्ता बताती हैं, ‘लाइफ साइकल फंड लक्ष्य के हिसाब से निवेश के लिए तैयार किए गए हैं। निवेशक के लिए संपत्ति आवंटन का काम ये खुद ही कर देते हैं।’
खुद-ब-खुद परिसंपत्ति आवंटन होना इसका बड़ा फायदा है क्योंकि इससे निवेशकों के व्यवहार के कारण होने वाली गलतियों की आशंका नहीं रहती। राधिका समझाती हैं, ‘लक्ष्य नजदीक आने पर शेयर में निवेश कम करने की प्रक्रिया में ये फंड अनुशासन लाते हैं और उसे व्यवस्थित तरीके से कर देते हैं।’
राधिका का कहना है कि जिन निवेशकों के पास अलग-अलग इक्विटी, डेट और कमोडिटी फंड हैं, वे जितनी बार पोर्टफोलियो रीबैलेंस करते हैं उतनी ही बार कर चुकाना पड़ता है। वह बताती हैं, ‘लाइफ साइकल फंड में रीबैलेंसिंग फंड के भीतर ही होती है, इसलिए आवंटन बदलने पर हर बार कर नहीं देना पड़ता।’
इन फंडों में विविधता का फायदा भी मिल जाता है। इनक्रेड मनी के सीईओ (म्युचुअल फंड) नितिन अग्रवाल ने कहा, ‘निवेशक इक्विटी, डेट, गोल्ड एवं सिल्वर एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड और इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (इनविट्स) सहित कई परिसंपत्तियों में निवेश कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें अलग-अलग योजना संभालने की तकलीफ नहीं उठानी पड़ेगी’
जरूरी नहीं कि लक्ष्य के मुताबिक तारीख आने पर निवेशक को पैसा निकालना ही पड़ेगा। मीरा मनी के सह-संस्थापक आनंद राठी कहते हैं, ‘ऑटो-मर्जर से पक्का होता है कि आपका पैसा बैंक खाते में पहुंचने के बजाय व्यवस्थित तरीके से निवेश होता रहे। बैंख खाते में जाने पर पैसा या तो खर्च हो जाएगा या हो सकता है कि आप उसे गलत जगह पर निवेश कर डालें।’
इन फंड में दिक्कत यह है कि सभी ग्राहकों के लिए रीबैलेंसिंग का एक जैसा ही तरीका यानी ग्लाइड पाथ होता है। राठी कहते हैं, ‘अलग-अलग आय, जोखिम सहने की भिन्न क्षमताओं और अलग-अलग माली हालत वाले निवेशक इसे अपने हिसाब से ज्यादा बदल नहीं सकते।’ वह मानते हैं कि ग्लाइड पाथ ठीक नहीं हो तो निवेशकों का रिटर्न कम भी हो सकता है।
जो निवेशक अपने पास बचे समय के हिसाब से सही योजना नहीं चुन पाते, उनके लिए ये फंड कारगर होते हैं। कई लोग तय तारीख करीब आने पर अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस नहीं कर पाते। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी विशाल धवन कहते हैं, ‘जिन निवेशकों को लक्ष्य करीब आने पर अधिक महफूज जगहों पर निवेशक करना चाहिए मगर कर या समय के कारण हिचकिचा जाते हैं उनके लिए ये फंड सही रह सकते हैं।’
कुछ निवेशक इक्विटी, डेट और अन्य श्रेणियों के मेल से रिटायरमेंट के बाद के लिए रकम जमा करते हैं। राधिका कहती हैं, ‘इससे उन्हें ज्यादा लचीला और मनचाहा निवेश करने का मौका मिलता है मगर इसमें अनुशासन बहुत चाहिए।’
जो निवेशक पहले से ही अनुशासन के साथ या किसी की सलाह पर निवेश करते हैं उन्हें लाइफ साइकल फंड की जरूरत शायद ही हो। धवन कहते हैं, ‘जो निवेशक अपने रिटायरमेंट का समय खुद तय करने का अधिकार अपने हाथ में चाहते हैं उन्हें निश्चित अवधि वाले लाइफ साइकल फंड के बजाय ज्यादा लचीली रणनीति अपनानी चाहिए।’
निवेशकों को इस श्रेणी के फंड चुनते समय देख लेना चाहिए कि उनके पास कितना वक्त है। निवेशकों के कई लक्ष्य होते हैं जैसे बच्चों की शिक्षा, उनकी शादी और अपनी रिटायरमेंट। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार दीपेश राघव की सलाह है, ‘उन फंडों को चुना जा सकता है, जो इनमें से हर लक्ष्य का समय पूरा होने के साथ ही परिपक्व हो रहे हों।’
लक्ष्य दूर हो तो लाइफ साइकल फंड में इक्विटी का हिस्सा ज्यादा होगा। धवन ने कहा, ‘निवेशकों के भीतर बीच में आने-वाले उतार-चढ़ाव को सहने की क्षमता होनी चाहिए।’ उन्हें यह भी पक्का कर लेना चाहिए कि चुने हुए फंड का ग्लाइड पाथ उनकी जोखिम लेने की क्षमता के मुताबिक ही हो।
कर के मोर्चे पर ये फंड एक मामले में बाजी मार जाते हैं। राधिका कहती हैं, ‘रीबैलेंसिंग फंड के भीतर ही होने से कर बच जाता है।’ लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अवधि पूरी होने पर क्या इक्विटी जैसा ही कर लगेगा। नियामक को इस पर तस्वीर साफ करनी चाहिए। अग्रवाल का कहना है, ‘जैसे ही इक्विटी में निवेश 65 फीसदी के नीचे जाता है, रिटर्न पर स्लैब के हिसाब से कर वसूला जाता है।’ सेबी ने इन फंडों को इक्विटी आर्बिट्राज में निवेश की अनुमति दी है। राघव कहते हैं, ‘डेट फंड की तरह बरताव से बचने के लिए वे आर्बिट्राज का इस्तेमाल कर सकते हैं।’
नैशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) में भी लाइफ साइकल फंड है। राघव बताते हैं कि म्युचुअल फंड लाइफ साइकल फंड खर्च के मामले में एनपीएस को शायद ही पछाड़ पाए। उनके हिसाब से फंड कंपनियों के लाइफ साइकल फंड को भी एनपीएस फंड की तरह परिसंपत्ति आवंटन की विस्तृत और बारीक तालिका देनी चाहिए।
पुराने रिटायरमेंट और बच्चों के फंड में निवेश करने वालों को घबराना नहीं चाहिए। राघव की राय में उन्हें यह बात साफ होने का इंतजार करना चाहिए कि उन्हें किन फंडों में मिलाया जाएगा। उसके बाद ही तय करें कि नए फंड उनके लिए उपयुक्त हैं या नहीं।
निवेशकों को लाइफ साइकल फंड में केवल इसलिए निवेश नहीं करना चाहिए क्योंकि श्रेणी नई है या उनका शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य 10 रुपये होगा। इसके बजाय उन्हें देखना चाहिए कि इन फंडों से निवेश का उनका मकसद पूरा हो रहा है या नहीं।
शुरुआत में लाइफ साइकल फंड का कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं होगा। धवन का सुझाव है कि उसी तरह के किसी अन्य फंड में फंड कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड पर गौर किया जा सकता है।