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Editorial: पश्चिम एशिया संघर्ष, भारत के लिए चुनौती

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भारत के पास इस समय 10 दिन के कच्चे तेल और एक सप्ताह के ईंधन का भंडार मौजूद है

Last Updated- March 02, 2026 | 10:06 PM IST
Crude Oil
प्रतीकात्मक तस्वीर

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध से भारत के समक्ष तेल की कीमतें बढ़ने से लेकर प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और विदेशी मुद्रा की आमद में ठहराव जैसी कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इस टकराव का अंतिम परिणाम क्या होगा, इस बारे में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है। इसका मतलब यह है कि लड़ाई यदि लंबी चली तो हालात से निपटने के लिए भारत को अपने पास मौजूद सभी नीतिगत उपाय अपनाने होंगे।

अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट को अवरुद्ध करता है तो नि​श्चित रूप से कच्चे तेल का आयात बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि वै​श्विक पेट्रोलियम और एलएनजी का लगभग 20 फीसदी इसी मार्ग से जाता है। यद्यपि ईरान ने इस मार्ग को बंद करने की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन तेल वाले सैंकड़ों जहाजों ने पहले ही यहां से निकलने का फैसला टाल दिया है।

युद्ध छिड़ने के साथ ही बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड भी 80 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया, हालांकि बाद में ये कीमतें 77 डॉलर के स्तर पर आकर ​ठहर गईं। पिछले साल जून में ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अमेरिकी हमले के बाद से यह सबसे अ​धिक है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, जो अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से मंगाता है। इनमें भी आधे से अ​धिक तेल इराक, सऊदी अरब और कुवैत से आता है।

अमेरिकी दबाव के बाद रूस से तेल खरीद में कटौती किए जाने से इन देशों पर निर्भरता और बढ़ गई है। भारत के पास इस समय 10 दिन के कच्चे तेल और एक सप्ताह के ईंधन का भंडार मौजूद है। यह ​स्थिति आपूर्ति और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति इसकी संवेदनशीलता को दर्शाती है। संकट के समय ऐसे हालात से निपटने के लिए भारत को तेल और गैस के लिए मजबूत रणनीतिक भंडार बनाने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेल आयात की हिस्सेदारी 3.1 फीसदी है।

नोमूरा के आकलन के अनुसार, तेल की कीमत में यदि 10 फीसदी की वृद्धि होती है तो चालू खाता घाटा 0.4 फीसदी अंक बढ़ जाता है। य​द्यपि भारत का चालू खाता घाटा मामूली रहा है, लेकिन वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल पहले से ही दबाव का सामना कर रहे पूंजी प्रवाह को और प्रभावित कर सकती है। इससे वित्त प्रबंधन में और मु​श्किल आ सकती है। दूसरे, रुपये पर नए सिरे से दबाव पड़ सकता है।

इसके अलावा बढ़ते मुद्रास्फीति दबाव के कारण बजट एवं मौद्रिक अनुमानों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यह सच है कि भारत वेनेजुएला और अमेरिका जैसे देशों का विकल्प चुनकर तेल आपूर्ति में विविधता ला सकता है, लेकिन इन दोनों ही जगह से आयात अपेक्षाकृत महंगा पड़ता है। मुद्रास्फीति फिलहाल कोई बड़ी चिंता की बात नहीं है। सरकार पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क कम करके कुछ हद तक इसकी भरपाई कर सकती है, लेकिन गैस अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का 85 फीसदी खाड़ी देशों से आयात करता है और देश में कोई रणनीतिक भंडार भी नहीं है। ईंधन आपूर्ति में व्यवधान से तो भारत किसी तरह निपट सकता है, लेकिन संघर्षरत क्षेत्रों में रह रहे लगभग 90 लाख प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा नि​श्चित रूप से उसके लिए चिंता का विषय है, जहां उसके पास बहुत सीमित विकल्प हैं। वर्तमान में ईरान के हमलों की जद में आए बहरीन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों में आबादी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा भारतीयों का है।

यहां अ​धिकांश भारतीय निर्माण और आतिथ्य जैसे कम कौशल की जरूरत वाले क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इन देशों में ज्यादातर लोग उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना के गरीब इलाकों से आते हैं, जबकि कुशल श्रमिक मुख्य रूप से केरल और तमिलनाडु से हैं।

संघर्ष में ​घिरे संवेदनशील क्षेत्रों से इतनी बड़ी संख्या में लोगों को निकालना अपने आप में बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके अलावा एक और समस्या विदेशी मुद्रा प्रवाह में अवरोध है। अमेरिका के बाद पश्चिम एशिया विदेशी मुद्रा प्रवाह का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। यदि विदेश से प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली रकम रुकती है तो देश में उन पर आश्रित हजारों परिवारों पर एक नया आ​र्थिक संकट आ सकता है।

इसलिए इस अनिश्चितता की ​स्थिति से निपटना सरकार के लिए किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं होगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि यह युद्ध कितने लंबे समय तक चलेगा और इससे क्षेत्र की भू-राजनीति क्या करवट लेती है।

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First Published - March 2, 2026 | 9:58 PM IST

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