भारत द्वारा आर्थिक सुधारों की राह अपनाने के करीब 35 वर्ष बाद भी देश की अर्थव्यवस्था द्वारा पूरी संभावनाओं का दोहन करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है। नीति आयोग के सदस्य राजीव गाैबा ने इस सप्ताह भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई के सालाना व्यापार सम्मेलन में भारतीय नीति निर्माण की एक बड़ी कमी को उचित रूप से वर्णित किया। उन्होंने कहा, ‘1991 के सुधारों ने औद्योगिक लाइसेंसिंग को समाप्त कर दिया लेकिन लाइसेंस राज को नहीं।’ कारोबारों और सरकार के बीच जुड़ाव का स्तर और साथ ही किसी उद्यम को शुरू करने और चलाने के लिए आवश्यक अनेक अनुमतियां, लाइसेंस और अनुपालन आदि अक्सर उद्यमियों को हतोत्साहित करते हैं। निष्पक्ष रूप से देखें तो, सरकार इस मोर्चे पर काम कर रही है। उसने हजारों अनुपालन आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है और बड़ी संख्या में प्रावधानों को अपराधमुक्त कर दिया है।
साफ है कि अभी बहुत कुछ किया जाना है। यह मानना होगा कि वैश्विक कारोबारी माहौल बीते कुछ सालों में बदला है और भारत जैसे देश को अपने कारोबारी माहौल में सक्रिय बदलाव लाना होगा। भारत चालू खाते के घाटे में है जो बहुत बड़ा तो नहीं है लेकिन उसकी भरपाई के लिए टिकाऊ रूप से विदेशी मुद्रा की आवक की आवश्यकता होगी। मौजूदा समय में जब देश से पूंजी बाहर जा रही है तब इस आवश्यकता को विशेष रूप से महसूस किया जा रहा है। अर्थशास्त्रियों ने संकेत दिया है कि चालू वर्ष लगातार ऐसा तीसरा वर्ष हो सकता है जब भुगतान संतुलन में घाटा दर्ज होगा। पश्चिम एशिया संकट वर्तमान में पूंजी प्रवाह को प्रभावित कर रहा है और शुद्ध स्तर पर भारत कुछ समय से कमजोर प्रवाह देख रहा है। पश्चिम एशिया में युद्ध विराम निश्चित रूप से अल्पकालिक राहत देगा लेकिन भारत को मध्यम और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से अपने व्यापक आर्थिक प्रबंधन ढांचे पर पुनर्विचार करना होगा। यह न केवल व्यापक स्थिरता के लिए महत्त्वपूर्ण है बल्कि दीर्घकाल में वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है। हालांकि केवल विदेशी निवेशक ही हिचकिचा नहीं रहे हैं, भारतीय व्यवसाय भी विभिन्न नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद आक्रामक रूप से निवेश नहीं कर रहे हैं।
इसके कई कारण हो सकते हैं जिनमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग की परिस्थितियां शामिल हैं लेकिन कारोबारी सुगमता संभवतः उनमें से एक है। केंद्र ने परिस्थितियों को सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं लेकिन कंपनियों को राज्य और स्थानीय सरकारों से भी निपटना पड़ता है जिनका नजरिया हमेशा एक जैसा नहीं होता। गाैबा ने सही कहा कि भारत को ऐपल जैसी कई कामयाबियों की आवश्यकता है। हालांकि यह मानना होगा कि ऐपल को उन तरीकों से सुविधा दी गई थी जो अन्य व्यवसायों विशेषकर छोटे व्यवसायों को मिलने की संभावना नहीं है। इसलिए, एक जीवंत व्यापारिक वातावरण बनाने के लिए भारत को स्पष्ट नीतिगत निर्माण और निर्बाध अनुमतियों की आवश्यकता है ताकि छोटे व्यवसाय जो आमतौर पर अधिक गतिशील होते हैं, वह भी वृद्धि की आकांक्षा कर सकें। ऐसे में सही दृष्टिकोण यही होगा कि ‘जब तक मना न हो तब तक अनुमति’ मानी जाए।
इसके अलावा नियम और विनियम स्थिर और पूर्वानुमान योग्य होने चाहिए। अल्पकालिक उद्देश्य हासिल करने के लिए हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उदाहरण के लिए, सरकार ने भारतीयों से सोने की खरीद कम करने को कहा है जिससे भुगतान संतुलन के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसा आह्वान अनिवार्य रूप से आभूषण क्षेत्र के व्यवसायों को प्रभावित करेगा और अन्य व्यवसायों को यह संकेत देगा कि सरकार अन्य नीतिगत लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सक्रिय रूप से उनके अवसरों को बाधित कर सकती है। सरकार ने सोने और चांदी पर सीमा शुल्क भी बढ़ा दिया है। आभूषण उद्योग को प्रभावित करने के अलावा इसके अनपेक्षित परिणाम भी हो सकते हैं। लोग किसी तरह के तनाव के पहले ही संकेत पर अधिक सोना और चांदी खरीद सकते हैं क्योंकि शुल्क में संभावित वृद्धि उनके निवेश का मूल्य बढ़ा देगी। कुल मिलाकर, यह अच्छी तरह से पता है कि व्यापारिक वातावरण को सुधारने के लिए क्या करने की आवश्यकता है और सरकार इस दिशा में काम कर रही है। इसका श्रेय भी उसे जाता है लेकिन अब गति को तेज करने की आवश्यकता है।
First Published - May 14, 2026 | 10:08 AM IST
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