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Editorial: चीन से निवेश पर सरकार की नरमी और FDI को मंजूरी में बड़ी ढील

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सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने और चीन के साथ व्यापार घाटा कम करने के लिए चुनिंदा औद्योगिक क्षेत्रों में विदेशी निवेश के नियम आसान कर दिए हैं

Last Updated- May 10, 2026 | 9:57 PM IST
FDI
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

केंद्र सरकार ने हाल ही में एक निर्णय लिया है, जिसके तहत चीन और भू-सीमा वाले अन्य पड़ोसी देशों से 40 विनिर्माण उपक्षेत्रों में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को 60 दिन के भीतर मंजूरी देने की बात कही गई है। इससे पता लगता है कि भारत मान रहा है कि उसकी औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के बीच गहन एकीकरण की जरूरत है। 2020 में प्रेस नोट 3 लागू होने के बाद वर्षों तक कड़ी निगरानी के पश्चात अब भारत अधिक खुल रहा है और वैश्विक उत्पादन तंत्र में शामिल होने का इच्छुक नजर आ रहा है, जहां अब भी चीनी कंपनियों का दबदबा है।

अहम बात यह है कि चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों का आपसी व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और 2025-26 में चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया है। तर्क दिया जाता रहा है कि व्यापार घाटा और चीन पर निर्भरता कम करने का एक तरीका चीनी निवेश को आकर्षित करना भी है ताकि उत्पादन वहां से भारत आ सके।

जिन क्षेत्रों को तेज मंजूरी के लिए चुना गया है, उनमें दुर्लभ धातु, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, उन्नत बैटरी कलपुर्जे, डिस्प्ले मॉड्यूल, मशीन उपकरण और पॉलिसिलिकन वेफर शामिल हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और नवीकरणीय ऊर्जा पर भारत का जोर इन्हीं पर आधारित है। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे स्पष्टता आती है और समय के साथ यह देश के विनिर्माण उत्पादन को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगा।

भारत का दुर्भाग्य है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण का हिस्सा लंबे समय से लगभग 15-17 प्रतिशत पर अटका हुआ है, जो सरकार के 25 प्रतिशत लक्ष्य से काफी कम है और कई पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से पीछे है।

हालिया विश्लेषण से पता चला कि सूचीबद्ध कंपनियों के सकल मूल्य वर्धन में विनिर्माण कंपनियों का हिस्सा 2024-25 में घटकर 33.4 प्रतिशत रह गया। महामारी से पहले यह 40 प्रतिशत से अधिक था। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई कदम उठाए हैं, जिनमें उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भी शामिल है, लेकिन परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। उदाहरण के लिए पीएलआई योजना मोबाइल फोन क्षेत्र में सफल रही लेकिन अन्य क्षेत्रों में इसके प्रभाव निराशाजनक रहे।

ऐसे में यह समझना होगा कि चुनिंदा क्षेत्रों में चुनिंदा देशों से निवेश को तेज मंजूरी भर से देश की विनिर्माण चुनौतियां हल नहीं हो जाएंगी। इस क्षेत्र में लॉजिस्टिक्स की ऊंची लागत, इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत विनिर्माण में कौशल की कमी, सख्त अनुपालन व्यवस्था और कमजोर अनुबंध प्रवर्तन जैसी कई बुनियादी दिक्कतें बरकरार हैं। इनसे कारोबार की लागत भी बढ़ जाती है। यही वजह है कि भारत अपनी बढ़ती श्रम शक्ति के मुताबिक रोजगार नहीं तैयार कर पाया है।

तेजी से बदलते वैश्विक वातावरण में भारत को निवेश आकर्षित करने और विनिर्माण उत्पादन को सार्थक रूप से बढ़ाने के लिए एक सुसंगत रणनीति और सुधारों की आवश्यकता होगी। संसद द्वारा 2019 और 2020 में पारित श्रम संहिताओं का उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना, श्रम लचीलापन सुधारना और रोजगार के औपचारिकीकरण को प्रोत्साहित करना था। मगर उनका क्रियान्वयन देर से हुआ क्योंकि नियमों की अधिसूचना पिछले सप्ताह ही जारी की गई। बड़ी औद्योगिक इकाइयों के लिए भूमि अधिग्रहण अब भी चुनौती है, जिसे दूर करना जरूरी है। सरकार को व्यापार नीति की भी समीक्षा करनी होगी।

हालांकि भारत ने हाल के वर्षों में कई मुक्त व्यापार समझौते किए हैं जिनमें यूरोपीय संघ के साथ समझौता भी शामिल है, लेकिन इसकी औसत शुल्क दरें अब भी दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक हैं। यह भी समझना होगा कि वैश्विक व्यापार का अधिकांश हिस्सा मध्यवर्ती वस्तुओं में होता है और ऊंचे टैरिफ अक्सर रोड़े बनते हैं। विनिर्माण उत्पादन को आगे बढ़ाने के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ जुड़ना जरूरी है।

एफडीआई की आवक भी अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि व्यापार कितना खुला है और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ कितना जुड़ाव है। इसलिए भारत को एफडीआई के लिए केवल चुनिंदा क्षेत्रों को खोलने के बजाय ढील देनी होगी। अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया है कि कम लागत वाले जिस विनिर्माण को चीन छोड़ रहा है, उसे हासिल करने में भारत नाकाम रहा है। भारतीय नीति-निर्माताओं को पूछना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है।

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First Published - May 10, 2026 | 9:57 PM IST

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