शेयर बाजार कभी अर्श पर तो कभी फर्श पर रहता है। शेयर के भाव फूलने और सिकुड़ने का सिलसिला चलता रहता है और निवेशकों का उत्साह भी कभी सातवें आसमान पर रहता है तो कभी धड़ाम हो जाता है। वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय शेयर बाजार ने उतार-चढ़ाव के कई दौर देखे हैं। मगर एक बात तो साफ है कि पैसा और अक्सर कही-सुनी एवं मन को भाने वाली चटपटी बातें तेजी को हवा तो देती हैं मगर फिर खोखली बुनियाद, कमजोर भरोसा और अनाप-शनाप दांव से बाजार चारों खाने चित हो जाता है।
निवेशक उतार और चढ़ाव के इन चक्रों से बच नहीं सकते। उन्हें इनका सामना करना ही पड़ता है। हालांकि, 1990 के दशक की शुरुआत से लेकर वर्ष 2026 तक बाजार में दिखे ये उतार-चढ़ाव निवेशकों को दांव लगाने का एक अधिक ताकतवर तरीका अपनाने में मदद कर सकते हैं।
तेजी: हर्षद मेहता के समय बाजार में आई उछाल के पीछे एक वास्तविक और एक बनावटी कारण था। वैल्यू रिसर्च के संस्थापक धीरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘असली कारण तो वर्ष 1991 का माहौल था जब लाइसेंस राज खत्म हो रहा था। अचानक भारतीय कंपनियों के भविष्य की कीमत तय होने लगी थी।’ बनावटी कारण पैसे का स्रोत था। हर्षद मेहता ने अंतर-बैंक प्रतिभूति बाजार (इंटरबैंक सिक्योरिटीज मार्केट) से रकम निकाली थी।
सिट्रस एडवाइजर्स के संस्थापक एवं एलऐंडटी म्युचुअल फंड के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) संजय सिन्हा कहते हैं,‘इस तेजी के दौरान शेयर बाजार में शेयरों का मूल्य बढ़ने के पीछे बैंकिंग क्षेत्र से आई रकम सबसे अहम वजह थी।’
सेंसेक्स 15 महीनों में लगभग 1,000 से बढ़कर लगभग 4,500 के स्तर तक पहुंच गया। मेहता और उसके साथियों की पसंदीदा एसीसी कंपनी का शेयर लगभग 200 से बढ़कर लगभग 9,000 रुपये हो गया। मेहता ने अधिक मूल्यांकन उचित ठहराने के लिए ‘प्रतिस्थापन लागत सिद्धांत (रिप्लेसमेंट-कॉस्ट थ्योरी) का इस्तेमाल किया। यानी शेयर की कीमत इस आधार पर तय की जाती थी कि कंपनी को दोबारा बनाने में कितना खर्च आएगा।
कुमार कहते हैं,‘ प्रतिस्थापन लागत सिद्धांत ने असल में निवेशकों को मूल्यांकन का हिसाब-किताब करना बंद करने की छूट दे दी थी।’
गिरावट: 23 अप्रैल, 1992 को एक समाचार पत्र में खबर छपी कि भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) लगभग 500 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं दे पा रहा है। इसका तार मेहता से जुड़ा पाया गया। सिन्हा कहते हैं,‘जैसे ही इस गड़बड़ी का पता चला बैंकिंग तंत्र से रकम निकालकर शेयर बाजार में डालने का तरीका बंद हो गया।’ रकम रुकने के बाद अगस्त तक सेंसेक्स औंधे मुंह गिरा और लगभग आधे स्तर पर आ गया।
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तेजी: इंटरनेट की ताकत पर भरोसे ने डॉट-कॉम तेजी का रास्ता तैयार कर दिया। यह सोच तो सही थी मगर निवेशकों ने तकनीकी शेयरों के लिए बहुत अधिक कीमतें चुकाईं। आखिरकार यह उनके नुकसान की वजह बनी। इस तेजी के दौरान बाजार दो हिस्सों में बंट गया। एक तरफ सूचना-तकनीक (आईटी), संचार एवं मनोरंजन (आईसीई) शेयर थे और दूसरी तरफ बाकी शेयर। निवेशकों ने आईसीई शेयरों में दिलचस्पी दिखाई। इन्फोसिस का कारोबार उसकी कमाई से 100 गुना अधिक कीमत पर हो रहा था। कुमार कहते हैं, ‘कपड़ा कंपनियों ने अपने नाम में ‘इन्फोटेक’ जोड़ लिया और उनके शेयरों की कीमतें दोगुनी हो गईं।’
आईटी आधारित म्युचुअल फंडों ने जबरदस्त रिटर्न दिए। सिन्हा कहते हैं,‘अच्छे रिटर्न से एक ऐसा दौर शुरू हो गया जिसने और अधिक खुदरा निवेशकों को इन योजनाओं की ओर आकर्षित किया। उनसे जुटाए गए पैसे वापस आईटी शेयरों में लगाए गए।’
केतन पारेख ने तथाकथित ‘के-10 शेयरों’ को बढ़ावा दिया। इस बार तेजी के लिए सहकारी बैंकों से पैसा आया था। कुमार कहते हैं, ‘इस घटनाक्रम में माधवपुरा सबसे बदनाम सहकारी बैंक था।’ सिन्हा के अनुसार, ‘बदला’ (एक तरह का फॉरवर्ड ट्रेडिंग सिस्टम) ने उधार के पैसे का असर बढ़ा दिया जबकि भीड़-चाल ने तेजी को और हवा दे दी।
गिरावट: मार्च 2000 में नैसडैक में गिरावट शुरू हुई। भारत में गिरावट का सिलसिला मार्च 2001 में शुरू हुआ। इसका कारण भुगतान संकट था। कुमार कहते हैं,‘इसमें कलकत्ता के ब्रोकरों द्वारा भुगतान नहीं करना एक बड़ी वजह थी। माधवपुरा मर्केंटाइल को-ऑपरेटिव बैंक का डूबना, केतन पारेख के घोटाले सामने आने और उसके बाद उसकी गिरफ्तारी ने इस तेजी का दौर खत्म कर दिया।’
इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियों के शेयर अगले 20 वर्षों तक चढ़ते रहे मगर मंदी के दौरान उनके शेयरों में 70 से 80 प्रतिशत की गिरावट आई। तकनीक वाली सोच सही थी। तकनीकी शेयरों के लिए निवेशकों ने जो कीमत चुकाई थी वह गलत थी।
निष्कर्ष: दोनों घटनाएं ऐसी सोच पर आधारित थीं जिन्होंने मूल्यांकन के अनुशासन को नजरअंदाज कर दिया। कुमार कहते हैं,‘हर्षद मेहता वाले मामले में यह प्रतिस्थापन लागत सिद्धांत था। डॉट-कॉम मामले में यह कमाई के बजाय ‘आईबॉल्स’ सिद्धांत (यानी जहां लोगों का ध्यान जाएगा वहां पैसा खुद-ब-खुद आ जाएगा) पर ध्यान देना था।’ दोनों ही तेजी के दौर में ऐसे लोगों द्वारा बैंकों के पैसे का सहारा लिया गया। यह उन लोगों की अपनी रकम थी ही नहीं।
कुमार कहते हैं, ‘अगर तेजी को बढ़ावा देने वाले पैसे के स्रोत के बारे में नहीं बताया जा सकता है तो इसका मतलब है कि वह ऐसी जगह से आ रहा है जहां से उसे नहीं आना चाहिए।’ उधार लेकर निवेश करना मुनाफे और नुकसान दोनों को बढ़ा देता है।
कुमार कहते हैं,‘जो निवेशक अपने पैसे का इस्तेमाल करते है, ‘वे 30 प्रतिशत की गिरावट भी झेल सकते हैं मगर उधार लेकर निवेश से गलत मौके पर निकलना पड़ जाता है।’कई खुदरा निवेशक कंपनी और क्षेत्रों की बुनियादी बातें जाने बगैर ही इसमें शामिल हो गए। सिन्हा कहते हैं,‘वित्तीय विश्लेषण के बजाय लोगों की सुनी-सुनाई बातें अधिक हावी हो गईं।’
उछाल: वर्ष 1994 से 2003 के बीच आईटी क्षेत्र में दो वर्षों की तेजी को छोड़कर भारतीय शेयर बाजार में कोई खास हलचल नहीं दिखी। अधिकतर क्षेत्र से कोई प्रतिफल नहीं मिला क्योंकि एशियाई संकट, ऊंची ब्याज दरों और अन्य कारणों से उन्हें नुकसान हुआ। निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड में इक्विटी इन्वेस्टमेंट के अध्यक्ष एवं मुख्य निवेश अधिकारी शैलेश राज भान कहते हैं,‘10 वर्षों तक कीमतों में स्थिरता के बाद अधिकतर क्षेत्र के मूल्यांकन आकर्षक स्तर पर आ गए थे। इससे निवेश के लिए बहुत अच्छा आधार तैयार हुआ।’
बिजली क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ा, वैश्विक जिंस की कीमतों में उछाल से मुनाफा बढ़ा और घरेलू निवेश चक्र में निचले स्तर से सुधार हुआ।
भान कहते हैं,‘वर्ष 2004 में आकर्षक मूल्यांकन और निवेश चक्र में तेजी (जिन्हें वैश्विक जिंसों की कीमतों में हुए उतार-चढ़ाव का भी साथ मिला) इन सबके मिले-जुले असर से इस अवधि में शेयरों से बहुत अच्छा रिटर्न मिला।’
गिरावट: वर्ष 2005 से 2007 के बीच वैश्विक बाजार में में तेजी आई जिससे मूल्यांकन बढ़ता गया। इसके बाद अमेरिका में ‘सब-प्राइम’ संकट के बाद वैश्विक वित्तीय उथल-पुथल शुरू हो गई। भान कहते हैं,‘बिना सोचे-समझे सब-प्राइम उधारी से एक ऐसा बुलबुला तैयार जो बाद में फूटा तो कई नामी वित्तीय संस्थान ढह गए।’
निष्कर्ष : निवेशकों को यह सोचना चाहिए कि क्या सामान्य वृद्धि के अनुमान किसी शेयर की कीमत को सही ठहराते हैं। भान कहते हैं,‘जोखिम कम करने का सबसे अच्छा तरीका है अच्छे कारोबार में निवेश करना और वृद्धि के लिए जरूरत से अधिक कीमत न चुकाना।’
तेजी: बेहतर व्यापक आर्थिक हालात, राजनीतिक स्थिरता और भरोसे ने इस तेजी को हवा दी। 10 वर्ष की अवधि के बॉन्ड पर यील्ड वर्ष 2013 के आखिर में लगभग 9 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2016 के मध्य तक लगभग 6 प्रतिशत हो गई। कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर लगभग 35-40 डॉलर प्रति बैरल रह गई। डीएसपी म्युचुअल फंड में शेयर प्रमुख विनीत सांब्रे कहते हैं,‘इससे भारत के चालू खाते की स्थिति, मुद्रास्फीति के अनुमान और राजकोषीय लचीलापन बेहतर बनाने में मदद मिली।’वर्ष 2014 के आम चुनाव ने लोगों का भरोसा बढ़ाया।
सांब्रे कहते हैं, ‘इससे नीति में स्थिरता, सुधार, संचालन में बेहतरी और निवेश चक्र में फिर तेजी आने की उम्मीदें जगीं।’
म्युचुअल फंड में निवेश और खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ी। खासकर मझोले और छोटे शेयरों को फायदा हुआ। सांब्रे कहते हैं, ‘निवेशकों ने भविष्य में मजबूत वृद्धि का अनुमान लगाना शुरू कर दिया जिससे कई कारोबारों के मूल्यांकन में काफी बदलाव आया।’
गिरावट: कंपनियों की कमाई उनके मूल्यांकन के हिसाब से नहीं थी। सांब्रे कहते हैं, ‘कई कंपनियों के शेयर की कीमतें कही-सुनी बातों के आधार पर तेजी से बढ़ीं मगर मुनाफे में वृद्धि उनके मूल्यांकन में हुई बढ़ोतरी को सही नहीं ठहराती थी।’
नोटबंदी और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और उपभोग श्रृंखला के कुछ हिस्सों को प्रभावित किया। वैश्विक स्तर पर तरलता में कमी आई क्योंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढ़ाईं, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं और रुपया कमजोर हुआ। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) संकट ने उधारी लेकर या क्षमता से अधिक निवेश और तरलता से जुड़े जोखिमों को उजागर किया, खासकर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों कंपनियों में।
सांब्रे कहते हैं, ‘कई छोटी और मझोली कंपनियों में खराब संचालन, गिरवी रखे गए शेयर और आक्रामक बहीखाते जैसी बातें तरलता कम होने के बाद ही सामने आईं।
निष्कर्ष: नकदी के दम पर शुरू हुई तेजी के दौरान सभी तरह के शेयरों में उछाल आती है। हालांकि, मंदी के दौरान बाजार में तेजी से अच्छी कंपनियों और केवल उम्मीदों पर चलने वाली कंपनियों के बीच फर्क सामने आ जाता है।
सांब्रे कहते हैं, ‘अधिक उधारी, नकदी की कम उपलब्धता, खराब कारोबारी संचालन या प्रवर्तकों द्वारा बहुत अधिक शेयर गिरवी रखने वाली कंपनियों से बचें।’ बहुत अधिक मूल्यांकन पर खरीदे जाने पर मजबूत कारोबार वाली कंपनियां भी निराश कर सकती हैं।
सांब्रे कहते हैं,‘सबसे अच्छा तरीका है तेजी में हिस्सा लेना मगर जोखिम पर नियंत्रण और बुनियादी बातों पर स्पष्ट ध्यान के साथ।’ सांब्रे के मुताबिक केवल कमाई, नकदी की उपलब्धता और बही -खते की मजबूती ही मूल्यांकन बरकार रख सकती हैं।
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तेजी: वैश्विक तरलता, लगभग शून्य ब्याज दरें, सरकारी आर्थिक मदद (राजकोषीय प्रोत्साहन), कंपनियों की कमाई में सुधार और डिजिटल तकनीक अपनाने के कारण कोविड के बाद तेजी दर्ज हुई। एडलवाइस म्युचुअल फंड की प्रबंध निदेशक एवं सीईओ राधिका गुप्ता कहती हैं,‘घरेलू निवेशकों ने एसआईपी और सीधे निवेश के जरिये शेयरों में निवेश किया। जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियां सामान्य हुईं वैसे ही भारत की विकास संभावनाओं को लेकर उम्मीदों ने बाजार में व्यापक तेजी को ताकत दी।
गिरावट: कमाई में सुस्त बढ़ोतरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की तरफ से हुई भारी बिकवाली ने वर्ष 2025-26 में बाजार में गिरावट के हालात ला दिए।
गुप्ता कहती हैं,‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) व्यापार और ऊंची वैश्विक ब्याज दरों ने कुछ उभरते बाजारों से रौनक छीन ली। जिन बाजारों में मजबूत वृद्धि की उम्मीदें पहले से ही शेयर मूल्यों में दिख चुकी थीं उन्हें ‘डी-रेटिंग’ का सामना करना पड़ा,क्योंकि वृद्धि की उम्मीदें कम हो गईं और नकदी की हालत सख्त हो गई।’
निष्कर्ष: घरेलू निवेशकों की मजबूत भागीदारी ने इस गिरावट को विदेशी निवेशकों के दबदबे वाले पिछले दौर की तुलना में अधिक व्यवस्थित बनाया। गुप्ता कहती हैं,‘क्षमता से अधिक निवेश काफी हद तक नियंत्रित था। घरेलू निवेश ने विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर हावी नहीं होने दिया। इससे घबराहट में बिकवाली नहीं हुई और बाजार में गिरावट की तीव्रता और इसकी अवधि दोनों सीमित रहीं।’खुदरा निवेशकों ने एसआईपी नहीं रोकी और निवेश आवंटन पर कायम रहे।’
गुप्ता कहती हैं,‘यह दौर पहले दिखे हालात से अलग है। पहले निवेशक अक्सर गिरावट के दौरान बाहर निकल जाते थे जिससे उन्हें नुकसान होता था और बाद में होने वाले सुधार का फायदा नहीं मिल पाता था।’ गुप्ता के मुताबिक लगातार जारी निवेश निवेशकों की बढ़ती समझदारी को दर्शाता है।
बाजार में निवेश के समय से अधिक अहम बात होती है बाजार में टिके रहना। जानकारों का कहना है कि निवेशक लंबे समय तक समझदारी भरे फैसले लेकर मोटा मुनाफा कमा सकते हैं।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य निवेश अधिकारी एस नरेन कहते हैं,‘बाजार उत्साह हमेशा उत्साह, गिरावट और सुधार के दौर आते-जाते रहते हैं। जो निवेशक इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं उनके सफल होने की संभावना उन लोगों से कहीं अधिक होती है जो हर उतार-चढ़ाव के समय की ताक में लगे रहते हैं।’
निवेशकों को बाजार के विभिन्न हालात का सम्मान करना चाहिए। नरेन कहते हैं,‘बहुत अधिक उत्साह के दौर के बाद अक्सर गिरावट आती है जबकि बहुत अधिक निराशा के बाद निवेश के बेहतरीन मौके मिलते हैं। हाल के रिटर्न को भविष्य के साथ जोड़कर देखने की गलती न करें।’ शेयर, सोना, रियल एस्टेट और फिक्स्ड इनकम योजनाएं अलग-अलग दौर से गुजरते हैं।
नरेन कहते हैं, ‘अलग-अलग परिसंपत्ति श्रेणी में निवेश करने से निवेशकों को लंबे समय में धन सृजन करने में मदद मिलती है और किसी एक चक्र के बारे में गलत अनुमान लगाने का असर भी कम हो जाता है।’ अच्छे शेयर भी अपनी बुनियादी मजबूती से कहीं अधिक कीमत पर कारोबार नहीं सकते हैं।
नरेन कहते हैं,‘इतिहास गवाह है कि केवल मन को भाने वाली कही-सुनी बातों के आधार पर कोई भी कीमत चुकाना निवेश की सफल रणनीति नहीं रही है।’