जब भी भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवा क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण क्षण की बात आती है तो अधिकांश लोगों के मन में वर्ष 2000 का ख्याल आता है। यह वाई2के दौर का चरम था, जब वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग अमेरिका में डॉटकॉम बुलबुले के फटने की समस्या से जूझ रहा था।
हालांकि देश के उद्योग के दिग्गजों के लिए उस तेजी से हुई तरक्की की नींव लगभग एक दशक पहले 1991 में ही रख दी गई थी। उस साल हुए सुधारों ने कई तरह की पाबंदियों को हटा दिया और कंपनियों को नए और बड़े काम करने की आजादी दी। इसने भारतीय उद्योग को इस काबिल बनाया कि वह साल 2000 में आई गिरावट से बने मौकों का फायदा उठा सके।
उद्योग के लोगों और वरिष्ठ कार्याधिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि शायद यह पहला मौका था जब सरकार ने निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम किया। उनके बनाए गए उपायों से उद्योग तेजी से आगे बढ़ा और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो पाया।
कई बदलावों में से कुछ ने इस उद्योग का स्वरूप ही बदल दिया। पूंजी बाजार को उदार बनाना, सॉफ्टवेयर और टेक्नॉलजी के आयात पर शून्य शुल्क, सॉफ्टवेयर टेक्नॉलजी पार्क का ढांचा, इंजीनियरिंग शिक्षा का विस्तार और दूरसंचार क्षेत्र में उदारीकरण प्रमुख बदलाव थे। इन उपायों ने न केवल भारत के प्रौद्योगिकी उद्योग को वैश्विक महाशक्ति में बदल दिया बल्कि देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने के सबसे बड़े और कारगर स्रोत भी तैयार किए।
इन सुधारों का ही नतीजा रहा कि 1991 में महज 15 करोड़ डॉलर रहने वाला उद्योग का राजस्व वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर अनुमानित 283 अरब डॉलर हो गया है। आईटी उद्योग के निकाय नैसकॉम के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में उद्योग की आय 315 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।
उद्योग के दिग्गजों का कहना है कि यदि यह समझना है कि उदारीकरण क्यों महत्त्वपूर्ण था तो हमें 1980 के दशक के अंत में लौटना होगा, जब भारत से सॉफ्टवेयर निर्यात करना कठिन काम था।
मास्टेक के संस्थापक और नैसकॉम के संस्थापक सदस्यों में से एक अशंक देसाई पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘मुंबई में टेलीफोन कनेक्शन प्राप्त करने में 12 साल तक लग जाते थे।’
उन्होंने कहा कि पर्सनल कंप्यूटर दुर्लभ और अत्यधिक महंगे थे। सॉफ्टवेयर इंजीनियर बहुत कम थे, डेवलपमेंट टूल नहीं के बराबर थे, अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी खराब थी और नियामक वातावरण विदेशी मुद्रा को दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधन मानता था।
आज के उद्यमियों के उलट उस समय के संस्थापकों को विदेशी मुद्रा प्राप्त करने के लिए जूझना पड़ता था ताकि वे विदेश यात्रा कर सकें और संभावित ग्राहकों से मिल सकें।
देसाई कहते हैं, ‘मुझे आज भी वह दौर याद है जब हमें भारतीय रिजर्व बैंक में जाकर यह समझाना पड़ता था कि मुझे निर्यात के लिए विदेशी मुद्रा की आवश्यकता है।’
यह बात जगजाहिर है कि दुनिया भर के ग्राहक भारत को टेक्नॉलजी के बजाय हाथियों और सांपों से ज्यादा जोड़कर देखते थे। आईबीएम जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के देश से चले जाने के बाद कई विदेशी ग्राहक इसे लेकर संदेह जता रहे थे कि भारतीय कंपनियां एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर बनाने के काबिल भी हैं या नहीं।
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी और प्रबंध निदेशक तथा कर्मयोगी भारत के चेयरमैन एस रामदुरई कहते हैं, ‘उदारीकरण से पहले के वर्षों से मुझे सबसे ज्यादा यही याद है कि हर ग्राहक के साथ मीटिंग एक ऑडिशन की तरह लगती थी और यह न केवल टीसीएस के लिए था बल्कि भारत के लिए भी। हमें अक्सर टीसीएस को बढ़ावा देने से पहले भारत को बढ़ावा देना पड़ता था।’
इन बाधाओं के बावजूद भारतीय कंपनियों ने अपनी क्षमताएं बनाना जारी रखा, जिससे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योग की नींव रखी गई।
जैसा कि रामदुरई बताते हैं कि उदारीकरण ने निश्चित रूप से आईटी उद्योग की सफलता में बड़ी भूमिका निभाई। इसने बाजार खोले, टेक्नॉलजी तक पहुंच बढ़ाई, वैश्विक ग्राहकों के साथ संपर्क बेहतर किया और ऐसा माहौल बनाया जिसमें भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार कर सकें।
रामदुरई कहते हैं कि सुधार तो बस एक उत्प्रेरक थे, असल नींव तो आजादी के बाद उच्च शिक्षा, विज्ञान, इंजीनियरिंग और संस्थानों के निर्माण में भारत के निवेश से बहुत पहले ही रख दी गई थी।
हैप्पीएस्ट माइंड्स टेक्नॉलजीज के चेयरमैन और मुख्य संरक्षक अशोक सूटा कहते हैं कि उदारीकरण से पहले भारतीय कंपनियों को ऑफशोरिंग की अवधारणा बेचनी पड़ती थी। वे कहते हैं, ‘जब भारतीय उद्योग ने विदेश में अलग-अलग तरह की परियोजनाएं संभालने में अपनी काबिलियत दिखाई तो सौदे का तरीका बदल गया। इससे बुनियादी ढांचा सपोर्ट, सुरक्षा और कठिन परियोजनाओं जैसे कई नए सेगमेंट बने।’ सूटा कहते हैं कि बौद्धिक संपदा की सुरक्षा को लेकर भारत के नजरिये में बढ़ते भरोसे ने भी कई तकनीक को यहां लाने में अहम भूमिका निभाई।
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उद्योग जगत के नेताओं का कहना है कि सुधारों ने इस क्षेत्र के लगभग हर बाधा को दूर कर दिया। प्रमुख सुधारों में 2000 में विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) से विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) में संक्रमण महत्त्वपूर्ण था।
रामदुरई ने कहा, ‘इसने प्रतिबंधात्मक नियामक मानसिकता से एक अधिक सहायक और व्यवसाय-अनुकूल दृष्टिकोण की ओर बदलाव को चिह्नित किया। भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा का प्रबंधन करना, विदेशों में निवेश करना, अंतरराष्ट्रीय परिचालन स्थापित करना और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अधिक पूर्ण भागीदारी करना काफी आसान हो गया।’
जहां तक पूंजी बाजार के उदारीकरण की बात है तो सुधारों से पहले कंपनियां अपने शेयरों की कीमत अपनी मर्जी से तय नहीं कर सकती थीं और स्वेट इक्विटी को कोई मान्यता नहीं थी। कारोबार के विस्तार के लिए पूंजी जुटाना काफी कठिन था।
देसाई ने कहा, ‘अगर वे सुधार नहीं हुए होते, तो मस्टेक और इन्फोसिस जैसी कंपनियां पूंजी नहीं जुटा पातीं। पूंजी के बिना हम सेल्स एवं मार्केटिंग के लिए विदेशों में निवेश नहीं कर पाते थे। ऐसे निवेश के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते थे।’
दूसरा प्रमुख सुधार था सॉफ्टवेयर और प्रौद्योगिकी के आयात पर शुल्क में कटौती। देसाई ने तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह से एक असामान्य मांग के साथ संपर्क करने की याद दिलाई। अधिकतर उद्योग जब आयात संरक्षण की मांग कर रहे थे तो सॉफ्टवेयर उद्योग ने सॉफ्टवेयर पर शून्य शुल्क की मांग की। देसाई ने कहा, ‘उन्होंने हमसे पूछा कि क्या आप आश्वस्त हैं? हर कोई शुल्क बढ़ाने की मांग करता है। हमने उन्हें बताया कि हम हरसंभव कम लागत पर प्रौद्योगिकी चाहते हैं ताकि लोग सीख सकें। सरकार सहमत हो गई।’
सॉफ्टवेयर टेक्नॉलजी पार्क्स ऑफ इंडिया (एसटीपीआई) का निर्माण भी काफी परिवर्तनकारी था। इसने कंपनियों को निर्यात प्रॉसेसिंग क्षेत्रों तक सीमित रहने के बजाय अपनी इकाइयों से सॉफ्टवेयर बनाने में मदद की। कर प्रोत्साहन और समर्पित उपग्रह लिंक के साथ एसटीपीआई भारत के ऑफशोर डिलिवरी मॉडल की रीढ़ बन गया।
रामदुरई प्रमुख हस्तक्षेपों में दूरसंचार सुधारों को भी शामिल करते हैं। उन्होंने कहा, ‘दूरसंचार के उदारीकरण ने कनेक्टिविटी में सुधार किया, बैंडविड्थ लागत को कम किया और भारतीय कंपनियों के लिए दुनिया भर के ग्राहकों के साथ निर्बाध रूप से सहयोग को संभव बनाया।’
सुधारों से पहले दूरसंचार लागत एक बड़ी बाधा थी। उस दौरान पट्टे पर 64 केबी लाइन की लागत लगभग 20 लाख रुपये थी। मगर 1990 के दशक में कनेक्टिविटी में सुधार होने के साथ-साथ विदेश में सॉफ्टवेयर का विकास व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य हो गया और इसने उद्योग के गणित को मौलिक रूप से बदल दिया।
शिक्षा में सुधार भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं था। 1990 के दशक की शुरुआत में इंजीनियरिंग स्नातकों की संख्या सालाना लगभग 1,00,000 होती थी जो बढ़कर 2020 तक लगभग 15 लाख हो गई। इसका मुख्य कारण निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों का विस्तार था। वह प्रतिभा पाइपलाइन आज 60 लाख से अधिक लोगों को सीधे रोजगार देने वाले उद्योग की रीढ़ बन गई।
अगर वाई2के ने भारत की तकनीकी विश्वसनीयता स्थापित की तो सॉफ्टवेयर निर्यात ने चुपचाप भारत के बाहरी क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। भुगतान संतुलन संकट ने 1991 के सुधारों को प्रेरित किया था। उस समय भारत के पास महज 5.8 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। मगर वित्त वर्ष 2026 तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 691 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है।
इस वृद्धि में प्रेषण, विदेशी निवेश और पूंजी प्रवाह जैसे कई कारकों का योगदान रहा। मगर अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत के नेताओं का कहना है कि डॉलर अर्जित करने के मोर्चे पर सॉफ्टवेयर सेवाओं ने सबसे अधिक भरोसेमंद भूमिका निभाई।
येस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंद्रनील पान ने कहा, ‘सॉफ्टवेयर निर्यात भारत में डॉलर के प्रवाह का एक विश्वसनीय स्रोत बन गया और देश के बाहरी खातों की स्थिरता लाने में मदद की। यह खासकर ऐसे समय में हुआ जब वस्तुओं का निर्यात उम्मीदों के मुताबिक बढ़ नहीं पाया।’ आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2001 में सॉफ्टवेयर सेवा निर्यात लगभग 6.3 अरब डॉलर का था जो बढ़कर वित्त वर्ष 2026 तक 203 अरब डॉलर से अधिक हो गया। इसके मुकाबले सॉफ्टवेयर सेवाओं का आयात अपेक्षाकृत कम रहा। इसका मतलब साफ है कि निर्यात आय का एक बड़ा हिस्सा शुद्ध विदेशी मुद्रा प्रवाह में परिवर्तित हो गया।
रामदुरई का कहना है कि उद्योग के योगदान का महत्त्व उसके पैमाने और स्थिरता दोनों में निहित है। उन्होंने कहा, ‘आज भारत का प्रौद्योगिकी क्षेत्र सालाना 220 अरब डॉलर से अधिक का निर्यात करता है और सेवा व्यापार अधिशेष में उल्लेखनीय योगदान करता है। इस प्रकार स्थिर विदेशी मुद्रा आय ने देश के व्यापार घाटे को कम करने, भारत की बाहरी स्थिति को मजबूत करने और विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।’
इस प्रकार यह काफी महत्त्वपूर्ण योगदान है, खास तौर पर ऐसे समय में जब अन्य क्षेत्र जिंस चक्र या संसाधन किल्लत जैसी बाधाओं के प्रति काफी संवेदनशील हैं। देसाई ने कहा, ‘करीब तीन दशक के दौरान उद्योग ने कई लाख करोड़ डॉलर का निर्यात अवसर सृजित किया। यहां तक कि विदेशी खर्च को ध्यान में रखने के बाद भी शुद्ध विदेशी मुद्रा आय काफी अधिक रही है। आईटी उद्योग के बिना भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति बिल्कुल अलग दिखती।’
वस्तु निर्यात के विपरीत सॉफ्टवेयर सेवाओं में अपेक्षाकृत कम आयात होती है। ऐसे में भुगतान संतुलन के लिहाज से वह काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। धन प्रेषण के साथ मिलकर सॉफ्टवेयर निर्यात ने भी भारत के पुराने वस्ततु व्यापार घाटे को पाटने में मदद की और वृहद आर्थिक स्थिरता को मजबूत किया।
सॉफ्टवेयर उद्योग के संगठन नैसकॉम के अनुसार, आज भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस क्षेत्र का योगदान 7 से 7.5 फीसदी है। इतना ही नहीं यह क्षेत्र लाखों लोगों को रोजगार देता है और इसने भारत को दुनिया के सबसे बड़े प्रौद्योगिकी सेवा निर्यातकों में शामिल कर दिया।
रामदुरई का कहना है कि इस उद्योग की विरासत अर्थशास्त्र से परे है। उन्होंने कहा, ‘मैं एक कदम आगे बढ़कर भारतीय आईटी गाथा को औपनिवेशिक दौर के बाद उभरने वाली सबसे सफल विकास गाथा बताऊंगा।’ इसने भारत की वैश्विक छवि को बदल दिया, लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए और भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में एक भरोसेमंद रणनीतिक भागीदार के रूप में स्थापित किया।
बहरहाल यह क्षेत्र भी आलोचनाओं से परे नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि सॉफ्टवेयर उद्योग को हार्डवेयर और विनिर्माण श्रेणी की कीमत पर फायदा हुआ। आज सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के हर पहलू को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस बदल रहा है और ऐसे में सेवा क्षेत्र की स्थिरता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
पान ने कहा, ‘सबसे बड़ा सवाल यह है कि यहां से कितनी वृद्धि संभव है, खासकर एआई के साथ। मुझे ऐसा नहीं लग रहा है कि भारत एआई का उत्पादक बन जाएगा। हम काफी हद तक उपभोक्ता बने रहेंगे।’