रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका के 100 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क की धमकी के मद्देनजर अमेरिका को भारत से वार्ता के दौरान लाभ मिल सकता है। हालांकि विशेषज्ञों और उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि भारतीय निर्यातक अपने बाजारों में विविधता लेकर आए हैं और उन्हें नए मुक्त व्यापार समझौतों से अतिरिक्त फायदा मिला है। दरअसल, भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2025-26 में 30 प्रतिशत थी।
अमेरिका की संसद के उच्च सदन सीनेट ने शुक्रवार को रूस से प्रमुख तौर पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर शुल्क लगाने का विधेयक पारित किया है। अमेरिका ने भारत के उत्पादों पर 25 प्रतिशत का रूस संबंधित शुल्क छह महीने पहले हटाया था और अब यह विधेयक पारित हुआ है।
रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदारों पर शुल्क लगाने के लिए अमेरिकी सीनेट द्वारा शुक्रवार को एक विधेयक पारित किया गया है। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब छह महीने पहले ही अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत का रूस-संबंधित शुल्क हटाया था। यह उपाय अभी तक भारतीय वस्तुओं पर स्वचालित रूप से शुल्क नहीं लगाता है। अभी अमेरिका की संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा को इस विधेयक पर विचार करना है। फिर यह विधेयक ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जा सकता है। निर्यातकों को अधिक स्पष्टता का इंतजार है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा, ‘यह अभी भी अनिश्चित है।’ सहाय ने कहा, ‘यदि विधेयक पारित हो जाता है तो ट्रंप को शुल्क लगाने का अधिकार देगा। हालांकि यह निश्चित नहीं है कि ट्रंप वास्तव में शुल्क लगाएंगे या इसका उपयोग केवल बातचीत में एक लाभ के रूप में करेंगे।’
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड के प्रमुख व प्रोफेसर राम सिंह के अनुसार दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा समर्थित यह विधेयक व्यापार सौदे में तत्काल खतरे की तुलना में वार्ता को आगे बढा़ने का प्रतीक लगता है।
यदि यह कानून लागू होता है तो अमेरिका में कानून प्रभावी होने के 30 दिनों के बाद रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदना जारी रखने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। विधेयक में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी व अजरबैजान को रूसी कच्चे के पांच सबसे बड़े खरीदारों के रूप में पहचाना गया है।
सिंह ने कहा, ‘भले ही विधेयक पारित हो जाए और ट्रंप भारत पर अधिक शुल्क लगाने का निर्णय लें। इसका प्रभाव को संभाले जाने की संभावना है। यह 30 से 40 अरब डॉलर के निर्यात को प्रभावित कर सकता है और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि को 0.2 प्रतिशत अंकों तक प्रभावित कर सकता है।’