1991 के भुगतान संकट के दौरान एन के सिंह भारत और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष-विश्व बैंक के बीच बातचीत करने वाले मुख्य व्यक्ति थे। 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन सिंह ने असित रंजन मिश्र के साथ बातचीत में उन परिस्थितियों को याद किया जिनके तहत भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाया था। उन्होंने इस पर भी प्रकाश डाला कि भारत किस तरह अपनी विकास की गति को बनाए रखते हुए आज की अनिश्चित दुनिया के साथ तालमेल बिठा सकता है। संपादित अंश:
पीवी नरसिंह राव सरकार ने 1991 में सुधार का कड़ा कदम उठाने के लिए किस बात ने प्रेरित किया?
आर्थिक क्षेत्र में आए सभी बड़े बदलाव की तरह 1991 के बदलाव की जड़ें भी अतीत में ही खोजी जानी चाहिए। 1980 के दशक में इंदिरा गांधी को यह समझाया गया था कि अगर कर्ज का सही मकसद से इस्तेमाल किया जाए तो इससे सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार होगा और विकास दर बढ़ेगी, जो उस समय 6 फीसदी से थोड़ी कम थी। जाहिर है, इसका नतीजा फिजूलखर्ची के रूप में सामने आया।
1985 में जब मैं जापान में भारतीय दूतावास में मंत्री (आर्थिक और वाणिज्य) के तौर पर काम कर रहा था तो मुझे वित्त मंत्रालय से एशियाई विकास बैंक से संसाधन जुटाने के निर्देश मिले। अप्रैल 1985 में एडीबी इसके लिए सहमत हो गया।
बहुपक्षीय एजेंसियों से कर्ज लेने का असली लाभ यह है कि यह लंबे समय के लिए मिलता है और अचानक से कोई शर्त लागू नहीं होती है लेकिन इसकी कुछ भी सीमाएं भी हैं। 1984 से 1989 तक राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.1 फीसदी से बढ़कर 2.4 फीसदी हो गया था। इसी हालात में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने औपचारिक फंड कार्यक्रम के बिना भी ‘सेफ्टी नेट’ (सुरक्षा कवच) का सुझाव दिया था। चुनावों की वजह से इसे लागू करने का काम 1989 के आखिर तक टाल दिया गया था।
यदि दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं नहीं होतीं तो शायद यह सफल हो सकता था। पहला, राजीव गांधी 1989 के चुनाव हार गए। इससे दिसंबर 1989 और जून 1991 के बीच शीर्ष नेतृत्व में तेजी से बदलाव आया। राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों के विश्वास को डिगा दिया और बहुपक्षीय और आधिकारिक सहायता पर निर्भरता और बढ़ गई।
दूसरा 2 अगस्त, 1990 को इराक के कुवैत पर आक्रमण ने तेल की कीमतों को 16 डॉलर से बढ़ाकर 41 डॉलर प्रति बैरल कर दिया और विदेशी से धनप्रेषण में भारी कमी आई, जिससे भुगतान संतुलन पर और दबाव पड़ा।
उस समय प्रशासन की इस पर कैसी प्रतिक्रिया थी?
उस समय तक वेंकटरमन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बन गए थे। वे कभी उद्देश्यपूर्ण उधार के प्रबल समर्थक थे और उन्हें भुगतान संतुलन संकट से निपटने का जिम्मा सौंपा गया था। लेकिन 1980 के दशक में बहुपक्षीय और द्विपक्षीय कर्ज हासिल करने में उनकी सफलता का चक्र तब पूरा हुआ, जब आरबीआई गवर्नर के तौर पर उन्हें देश के कर्ज के भुगतान में चूक को टालने के लिए अपनी पूरी सूझ-बूझ का इस्तेमाल करना पड़ा। पॉलिसी का चक्र पूरा हो चुका था। इससे मिला सबक हमेशा याद रखने वाला था- फिजूलखर्ची का कभी कोई फायदा नहीं होता और समझदारी से काम लेने पर कई तरह के फायदे मिलते हैं।
जून 1991 में जब मैं गृह मंत्रालय से वित्त मंत्रालय (आर्थिक मामलों के विभाग) में आईएमएफ और विश्व बैंक के साथ मुख्य बातचीत करने वाले अधिकारी के तौर पर आया तो एस पी शुक्ला वित्त सचिव और दीपक नैयर मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। जब दुनिया का भारत की राजनीतिक स्थिरता से भरोसा उठ गया था, तब इन दोनों ने देश को संभाले रखने में अहम भूमिका निभाई।
4 जुलाई, 1991 को पी चिदंबरम ने सुधार कार्यक्रम के तहत व्यापार से जुड़े बदलावों का ऐलान किया, जैसे आयात-निर्यात से नियंत्रण हटाना और नकद क्षतिपूर्ति सहायता को समाप्त करना आदि। यह सब तब हुआ जब 1991-92 में वृद्धि दर गिरकर 1.1 फीसदी रह गई थी लेकिन सुधारों के असर से यह तेजी से बढ़ी। यह सब मनमोहन सिंह के उस औपचारिक बजट से पहले ही हो गया था जिसमें लाइसेंस-परमिट राज को खत्म करने और उद्योग को लाइसेंस मुक्त करने की रूपरेखा पेश की गई थी।
तो 1991 का संकट कोई अचानक हुई घटना नहीं थी बल्कि यह 1980 के दशक में फिजूलखर्ची, अनदेखी की गई चेतावनियों और उस राजनीतिक अस्थिरता का नतीजा था जिसने निवेशकों का भरोसा तोड़ दिया था। इसका श्रेय चंद्रशेखर की टीम को भी जाता है, जिसने 1991 वाली टीम के आने से पहले देश को संभाले रखा।
क्या संकट पर प्रतिक्रिया दृढ़ विश्वास से प्रेरित थी या मजबूरी वजह थी?
मैं इस घटना को परिस्थितियां, मजबूरी और विश्वास का रूप मानता हूं। परिस्थितियां मजबूरियों को आकार देती हैं और जब मजबूरियों से अच्छे परिणाम मिलते हैं तो वे आपके विश्वास का हिस्सा बन जाते हैं। हमारी परिस्थितियां – राजनीतिक अस्थिरता, वित्तीय फिजूलखर्ची, निवेशकों का टूटा भरोसा, ऐसे थे कि हमारे पास वैसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। नतीजे अच्छे रहे, इसलिए वे हमारे यकीन का हिस्सा बन गए।
कुछ खास बातें सामने आती हैं। पहला, अईएमएफ और विश्व बैंक की कार्य-संस्कृति बदल चुकी थी, जिसका मतलब था कि आप संस्थान के संसाधनों तक तब तक नहीं पहुंच सकते जब तक कि आप दूसरे की शर्तों को पूरा न करें। दूसरा, प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की विवेकपूर्ण समझ। उन्होंने पहचाना कि इस पैमाने के सुधारों के लिए राजनीतिक स्तर पर समर्थन कायम करने की आवश्यकता है।
जैसा कि मनमोहन सिंह ने एक बार मुझसे कहा था, ‘वित्त मंत्री उतने ही मजबूत या कमजोर होते हैं जितना प्रधानमंत्री उन्हें बनाना चाहता है।’ और राव ने सिंह को वह ताकत देने के लिए अपनी राजनीतिक पूंजी दांव पर लगा दी।
तीसरा, निजी और विशेष रूप से विदेशी पूंजी के प्रति भारतीय अविश्वास गहरा था, जो स्वतंत्रता-पूर्व से चला आ रहा था। बॉम्बे क्लब को औद्योगीकरण के विनाश का डर था।
1993 तक हमने जो हासिल किया वह वृहद आर्थिक स्थिरता, निवेशकों में भरोसा बहाल करना, लाइसेंस मुक्त करना और बढ़ती विकास दर के साथ स्वीकार्य मुद्रास्फीति सीमा थी। आईएमएफ के एक वार्ताकार ने मुझसे कहा था कि भारत एक बाघ है जिसे दशकों तक पिंजरे में रखा गया है। वह घायल, लेकिन अब मुक्त घूम रहा है और लंबे समय से लंबित सुधार तलाश रहा है। उनकी चिंता यह थी कि एक बार जब इसके घाव भर जाएंगे, तो यह अपनी गुफा, अपने आत्मसंतोष में लौट सकता है। वह अनसुलझे एजेंडे का इशारा कर रहे थे- भूमि, श्रम और पूंजी।
वास्तव में, हमारी सफलता ऐसी थी कि हम दो साल पहले, जून 1993 में आईएमएफ कार्यक्रम से बाहर निकल गए, जिससे इन सुधारों पर और दबाव डालने की फंड की क्षमता सीमित हो गई। भारतीय वार्ताकारों की सफलता में हमारी विफलता भी निहित थी। कई लोगों ने कहा है कि हम बहुत हल्के में निकल गए क्योंकि हमने भूमि, श्रम और पूंजी जैसे अधिक बुनियादी सुधारों को टाल दिया था।
क्या ऐसा कुछ था जिसमें आईएमएफ या विश्व बैंक ने सरकार पर दबाव डाला लेकिन सरकार अडिग रही?
कई चीजें जैसे कि कृषि सुधार, श्रम सुधार, पूंजी खाते का तेजी से खुलना, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) व्यवस्था में व्यापक बदलाव और सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआी), नकद आरक्षी अनुपात (यीआरआर) और बैंकिंग क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा पर शुरुआती कदम।
उदारीकरण की रफ्तार को लेकर वित्त मंत्रालय के भीतर गंभीर मतभेद थे?
एक लोकतांत्रिक कैबिनेट प्रणाली में, ऐसा न हो तो यह असामान्य होगा। शुक्ला और नैयर दोनों ही पक्के राष्ट्रवादी और बौद्धिक रूप से ईमानदार थे। लेकिन नैयर को लगता था कि विश्व बैंक की संरचनात्मक शर्तें उन फैसलों में दखल देती हैं जो भारत के अधिकार क्षेत्र में होने चाहिए, भले ही वे राजकोषीय और चालू खाते के स्तर पर बड़े बदलावों को स्वीकार कर रहे थे। शुक्ला संतुलन बनाने का काम करते थे जबकि आखिरी फैसला सिंह का होता था। सिंह बहुत ही लोकतांत्रिक सोच वाले वित्त मंत्री थे।
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उदारीकरण की प्रक्रिया को कैसे बढ़ाया?
वाजपेयी 1991 के संकट से अच्छी तरह वाकिफ थे। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने आर्थिक सुधारों को नई गति दी, अपनी आगे की सोच वाले झुकाव को अपने दल के रूढ़िवादी तत्त्वों के साथ सामंजस्य बिठाया।
उनकी स्पष्ट विरासत दूरसंचार सुधार है। 1999 की नई दूरसंचार नीति ने क्षेत्र को अस्थिर निश्चित लाइसेंस-शुल्क व्यवस्था से राजस्व-साझाकरण में बदल दिया। इसने वित्तीय रूप से अव्यवहार्य क्षेत्र को बचाया और बुनियादी ढांचा तैयार किया जिस पर सूचना प्रौद्योगिकी और आईटी-आधारित सेवा फर्मों का विकास हुआ और इससे भारत की डिजिटल-सेवाओं का विस्तार हुआ।
दूसरा था राजमार्गों से संपर्क, जिसे ग्रामीण भारत के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से और बेहतर बनाया गया। तीसरा था राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 जिसने वित्तीय समझदारी को अलग-अलग सरकारों की मर्जी पर छोड़ने के बजाय कानून का हिस्सा बना दिया। यह एक ऐसा ढांचा था जिसे बाद में 12वें वित्त आयोग के जरिये राज्यों तक भी बढ़ाया गया और बाद में मुझे इसकी समीक्षा करने और उसमें जरूरी बदलाव करने का काम सौंपा गया।
चौथा, विनिवेश संस्थागत हो गया। 1999 में एक समर्पित विभाग जिसे बाद में मंत्रालय बना दिया गया, ने बीमा क्षेत्र में निजी भागीदारी की राह आसान की और कई महत्त्वपूर्ण विनिवेश किए। पांचवां, 2003 के बिजली अधिनियम के माध्यम से बिजली क्षेत्र का सुधार था, जिसने उत्पादन को लाइसेंस मुक्त किया, खुले पहुंच को सक्षम किया और राज्य बिजली बोर्डों को अलग-अलग उत्पादन, पारेषण और वितरण कंपनियों में बांटा।
बढ़ती अनिश्चित, अस्थिर दुनिया में भारत को वृहद आर्थिक लक्ष्य कैसे निर्धारित करने चाहिए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वृहद आर्थिक स्थिरता व्यक्तिगत रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है। फिजूलखर्ची के बजाय वित्तीय अनुशासन बनाए रखना उनकी प्राथमिकता रही है। वाजपेयी सरकार के समय का मूल 2003 का कानून और मोदी सरकार के समय मेरे नेतृत्व वाली समीक्षा समिति इसका प्रमाण है।
कोरोना महामारी ने उस दिशा को बाधित कर दिया। वित्त मंत्री ने तब से वित्त वर्ष 2031 तक केंद्र के लिए 1 फीसदी घटबढ़ के साथ 50 फीसदी प्रतिशत का नया, अधिक यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित किया है। सबसे अहम बात वृद्धि दर है। अगर यह 7 से 8 फीसदी रहती है तो कर्ज-जीडीपी अनुपात अपने आप तेजी से कम होगा। पिछली कुछ सरकारों के उलट इस सरकार ने कभी भी महंगाई बढ़ाकर कर्ज का बोझ कम करने की कोशिश नहीं की है।
वित्त मंत्रालय की हालिया मासिक आर्थिक रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और व्यापार को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने से पैदा हुई उथल-पुथल को देखते हुए भारत को खुद को नए सिरे से ढालने की जरूरत है। नए सिरे से ढालने का यह तरीका कैसा होगा?
तीन चीजें हैं। पहला, भारत अभी भी अपनी क्षमता से कम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करता है जो जीडीपी का लगभग 0.4-0.5 फीसदी है जबकि यथार्थवादी लक्ष्य 3 फीसदी के करीब है। दूसरा, कानून में सुधार- भारत के पास निष्पक्ष, पारदर्शी न्यायपालिका है लेकिन खाड़ी देशों, सिंगापुर या ब्रिटेन की तुलना में वाणिज्यिक विवाद समाधान के मामले में पिछड़ जाता है। कुशल वाणिज्यिक अदालतें भारत की विकास दर को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ाएंगी। तीसरा, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को उत्पादकता बढ़ाने वाले के रूप में एकीकृत करना और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर में भारत की भूमिका बढ़ाना।
भारत और चीन सहित मध्य शक्तियों में वास्तविक प्रतिद्वंद्विता है। क्या आर्थिक सहयोग अभी भी बढ़ सकता है?
दुनिया अब द्विध्रुवीय नहीं रही। यह बहुध्रुवीय है। गठबंधन ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, एआई जैसे विशिष्ट मुद्दों के आसपास बनते हैं न कि व्यापक गुटों के रूप में। भारत ने लंबे समय से ग्लोबल साउथ का पक्षधर रहा है और मध्य शक्तियों – ब्राजील, यूरोपीय देश जो अब महाशक्ति का दर्जा खो चुके हैं, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया – सभी को प्रतिद्वंद्विता को बढ़ाने के बजाय सहयोग में सुधार करने में भूमिका निभानी है।
उदाहरण के लिए जलवायु वित्त अमेरिका ने पेरिस समझौते से पीछे हट जाने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया अगली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गई है।
खासकर चीन के मामले में सुरक्षा को लेकर हमारी वाजिब चिंताएं हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम सारा कारोबार बंद कर दें। चीनी निवेश से निपटने के मामले में हमें जिम्मेदार रवैया अपनाना होगा और हर मामले को अलग-अलग देखना होगा। मौजूदा सरकार ने भू-राजनीतिक तनावों को जिम्मेदारी से संभाला है, जिससे भारत को कुल मिलाकर फायदा हुआ है।